पृथ्वी के गर्भ में हिमालय से भी बड़े पहाड़ दबे पड़े हैं

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  • वैज्ञानिकों ने 410 मील लंबे पर्वत श्रृंखला का पता लगाया

  • बोलिविया के भूकंप के आंकड़ों से शोध में तेजी

  • बीच के हिस्से में अनेक किस्म की वनावट

  • क्या कुछ बदला है, इसकी जानकारी भी मिलेगी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी के अंदर हिमालय से भी बड़े पर्वत दबे हुए हैं।

पृथ्वी के अंदर की स्थिति पर चल रहे अनुसंधान के क्रम में इस बात का पता चला है।

प्रिंसेटन विश्वविद्यालय के एक शोध दल के मुताबिक पृथ्वी के ऊपर नजर आने वाले पर्वतों के मुकाबले

अधिक बड़े और लंबे पहाड़ अंदर दबे पड़े हैं।

हाल ही में इस क्रम में एक ऐसी पर्वत श्रृंखला का पता चला है, जो 410 मील की दूरी तर फैला हुआ है।

वर्ष 1994 में बोलिविया में आये एक बड़े भूकंप के बाद अंदर की स्थितियों के अध्ययन पर शोध तेज किया गया है।

बोलिविया में 8.2 स्केल का बड़ा भूकंप आया था।

उस भूकंप के आंकड़ों के आधार पर पृथ्वी के अंदर की वनावट पर गहन शोध में मदद मिली है।

वैज्ञानिक तौर पर पृथ्वी को तीन हिस्सों में बांटा जाता है।

इसके सबसे ऊपर का हिस्सा, जिसमें हम रहते हैं, को क्रस्ट कहा जाता है।

इसके नीचे मैंटल होता है जबकि पृथ्वी के ठीक केंद्र को कोर कहा जाता है।

पृथ्वी के ठीक मध्य में अब भी उबल रहा है लावा

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी के ठीक केंद्र में कोर के भीतर लावा अब भी ऊबल रहा है।

उसके एक मोटे पर्त ने ढक रखा है।

जब कभी यह पर्त किसी कारण से टूटता है तो उबलता हुआ लावा बाहर आ जाता है।

इसे हम ज्वालामुखी विस्फोट के नाम से जानते हैं।

लेकिन अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इन तीन प्रमुख हिस्सों के भी ढेर सारे

अलग अलग हिस्से हैं, जिनकी संरचना भी अलग अलग है।

पृथ्वी के बीच में स्थित मेंटल की परत करीब 660 किलोमीटर मोटी है।

इसी ने कोर और क्रस्ट को एक दूसरे से अलग रखा है।

इसी मोटी पर्त के बीच झांकने का अवसर बोलिविया के भूकंप ने वैज्ञानिकों को प्रदान किया था।

इस शोध से जुड़े दल की नेता जेसिका इरविंग ने कहा कि वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से

पृथ्वी के अंदर की संरचना का मॉडल तैयार करने में उन्हें मदद मिली है।

इसी से अंदर मौजूद विशाल पर्वतों का पता चला है।

इसमें अलग अलग पर्त से परावर्तित होकर आने वाली रोशनी एवं तरंगों से अंदर की स्थिति को समझ पाना आसान हुआ है।

शोध से जुड़े वैज्ञानिक वेंगवो यू कहते हैं कि प्रयोग के दौरान तरंगों को किसी खास दिशा में नहीं

बल्कि अलग अलग तरीके अलग अलग दिशाओं में छोड़ा गया।

उनके आंकड़े दर्ज किये गये। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर जो मॉडल तैयार हुआ

वह पृथ्वी के अंदर की स्थिति को समझने में मददगार साबित हुआ है।

पृथ्वी के अंदर की स्थिति का एक मॉडल भी तैयार किया

बोलिविया के भूकंप की वजह से पृथ्वी के अंदर जो हलचल मची थी, उससे अंदर सारा कुछ अस्तव्यस्त हो गया था।

प्रकाश तरंगों ने इन्हें समझने में मदद की।

तब जाकर यह बात समझ में आयी कि पृथ्वी की गहराई में हिमालय से भी बड़े बड़े पहाड़ दबे पड़े हैं

और लंबी लंबी पर्वत श्रृंखलाएं भी अंदर मौजूद हैं।

वैसे शोध दल ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मॉडल से पहाड़ों की ऊंचाई तय कर पाना संभव नहीं था,

इसके अलावा उसकी पूरी संरचना को भी अब तक नहीं समझा जा सका है।

शोध के आगे बढ़ने के बाद वैज्ञानिक भूकंप के दौरान पृथ्वी के अंदर पैदा होने वाली हलचल के

आंकड़ों के आधार पर ही अपनी शोध को और विकसित करना चाहते हैं।

उन्हें उम्मीद है कि इसके माध्यम से यह समझने में आसानी होगी कि

पिछले साढ़े चार खरब वर्षों में हमारी पृथ्वी अंदर और बाहर से कितनी बदली है।

इसकी मदद से कोर पर मौजूद टेक्टोनिक प्लेटों की वास्तविक संरचना में कितना कुछ बदला है, यह भी समझ पाना संभव होगा।

साथ ही यह पता चलेगा कि प्राचीन पृथ्वी के कौन कौन से हिस्से उथल पुथल की वजह से अंदर समा गये हैं

और कौन कौन सा हिस्सा पृथ्वी के अंदर से ऊपर निकला है।

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