fbpx Press "Enter" to skip to content

कैलाश पर्वत का नया राज वैज्ञानिक तकनीक से पहली बार उजागर

इस आलेख और फिल्म को खास तौर पर कंप्यूटर पर देखने के लिए तैयार किया गया है। 
अगर आप मोबाइल पर इसे देख रहे हैं तो डेस्टटॉप वर्सन में देखें अच्छा लगेगा। 

  • पहले से ही होती आयी है इस क्षेत्र की वैज्ञानिक चर्चा

  • ऊर्जा के स्रोत को पहले ही पहचान चुके हैं वैज्ञानिक

  • इस पर्वत के ऊपर तक कोई भी नहीं जाता है

  • गूगल अर्थ और शक्तिशाली कैमरा का उपयोग

पहले वह फिल्म देख लें जिसके लिए यह आलेख तैयार किया गया है

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः कैलाश पर्वत हिन्दी भाषा जानने वालों में से अधिकांश लोग जानते ही होंगे। हिंदू

धार्मिक मान्यता के मुताबिक यह भगवान शंकर का घर है। हिमालय के अत्यंत दुर्गम

इलाके में अवस्थित यह कैलाश पर्वत अभी चीन की सीमा में है। लेकिन पहले यह भारतीय

भौगोलिक सीमा का ही हिस्सा हुआ करता था। दरअसल तिब्बत पर चीनी हमले और

1962 के युद्ध ने यहां की भौगोलिक परिस्थितियों को बदल दिया है। खैर कैलाश पर्वत को

जानने वालों के अलावा अनेक लोग इसकी यात्रा के बारे में भी जानते होंगे। कुछ लोग ऐसे

भी होंगे, जो यहां की यात्रा कर आये हैं। यह यात्रा अत्यंत कठिन है और हाल के दिनों के

पहले तक तो उत्तराखंड से चीन की सीमा में प्रवेश कर ही इस कैलाश पर्वत की दर्शन

करने का अवसर प्राप्त हो पाता था। अब समय बदला है और धार्मिक पर्यटन से हो रही

कमाई की वजह से चीन ने भी इसके लिए नई सुविधाएं उपलब्ध करायी हैं। अब तो नेपाल

के रास्ते भी पर्यटक कैलाश पर्वत की यात्रा पर जा सकते हैं। लेकिन आप किसी भी रास्ते

से क्यों न जाएं आपको अंतिम चरण में पैदल ही चलना पड़ता है। काफी ऊंचाई पर होने की

वजह से यहां कई बार सांस की दिक्कत होने लगती है। पहले तो इस यात्रा पर जाने वालों

के लिए भारत सरकार की तरफ से ही अलग से चिकित्सा के सारे प्रबंध किये जाते थे। वहां

जाने वालों की पूरी जांच के बाद ही उन्हें जाने की इजाजत भी मिलती थी। अब चीन ने यहां

की यात्रा से होने वाली कमाई को ध्यान में रखते हुए वहां यात्रियों की सुविधा के लिए

ऑक्सीजन बार भी स्थापित कर दिये हैं। सांस की दिक्कत होने पर यात्री इन ऑक्सीजन

बारों में जाकर पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन लेकर खुद को स्वस्थ कर सकते हैं।

कैलाश पर्वत हिंदू धर्मावलंवियों की श्रद्धा का केंद्र है

कैलाश पर्वत पर जाने वालों के अलावा समय समय पर कई आध्यात्मिक गुरुओं ने भी

इसके बारे में इशारों ही इशारों में बहुत कुछ कहा है। पहली बार तकनीक तौर पर इस पर्वत

पर मौजूद कुछ खास साक्ष्य ऐसे सामने आये हैं, जिनसे यह लगता है कि वहां सब कुछ तो

प्राकृतिक वाकई नहीं रहा होगा। इस पर्वत पर कोई ऊपर तक नहीं जाता, यह सर्वविदित

है। कहा जाता है कि इस पर्वत के ऊपर से कोई हवाई जहाज भी नहीं गुजरता है। कैलाश

पर्वत के चारों छोर में से दो छोर ऐसे भी हैं, जहां से ऊपर चढ़ना संभव भी नहीं है। इन्हीं

इलाकों पर लगातार शोध करने के बाद एक वैज्ञानिक सह फोटोग्राफर ने वहां के चित्रों के

माध्यम से कैलाश पर्वत के बारे में नई जानकारी दी है।

वैज्ञानिक सह फोटोग्राफर ने किया है यह विश्लेषण

उन्होंने इसके लिए काफी लंबे समय तक शोध किया है। एक लंबी प्रतीक्षा के बाद उन्हें

कैलाश पर्वत के वे हिस्से खुले हुए नजर आये हैं, जो आम तौर पर हमेशा ही बर्फ की चादरों

से ढके रहते हैं। इन्हीं खुले हुए हिस्सों की तस्वीर खींचकर उन्होंने दुनिया के सामने एक

नया रहस्य ही उजागर कर दिया है।

फेसबुक पर आरके चिन्नम ने एक अमेरिकी शोधकर्ता सह फोटोग्राफर का यह खोज शेयर

किया है। इसमें उक्त व्यक्ति ने कैलाश पर्वत की वे तस्वीरें पोस्ट की हैं, जो आम तौर पर

लोगों को देखने को नहीं मिलती अथवा वहां जाने वालों को भी यह देखना नसीब नहीं होता

क्योंकि वे इलाके बर्फ से ढके ही रहते हैं। इन तस्वीरों के जरिए कैलाश पर्वत के निचले

इलाके में पत्थरों पर हुई खुदाई को उन्होंने अपने तरीके से परिभाषित किया है। आम तौर

पर यहां के बारे में अनेक अप्रमाणित वैज्ञानिक तर्क पहले से ही चलते आये हैं। लेकिन हिंदू

धार्मिक मान्यता के मुताबिक यह भगवान शिव का घर है। इस घर के अंदर आधुनिक

तकनीक के जरिए झांकने और उसके बारे में जानकारी पहली बार मिल पायी है।

तस्वीरों में जो कुछ नजर आया है, उसमें खुले हुए इलाकों में पत्थरों के बीच काफी ऊंची

ऊंची मूर्तियां स्थापित हैं। अनुमान है कि इनकी रचना शायद इंसानों की वर्तमान प्रजाति

के धरती पर विकसित होने के पहले ही हो चुकी थी। यानी यह रचनाएं लाखों वर्ष पुरानी है।

रचनाकार ने बताया है कि कैलाश पर्वत हिंदुओं के अलावा बौद्ध, जैन और सीमित दायरे में

सक्रिय बोन धर्म के अनुयायियों के लिए भी तीर्थ के जैसा ही है। कुछ लोग इसे पृथ्वी से

स्वर्ग का द्वार भी मानते हैं।

यहां की असीमित ऊर्जा पर पहले से ही चर्चा होती रही है

कुछ लोग इसे ऊर्जा का असीमित भंडार मानते हैं। तो वैज्ञानिक बहस इसके पिरामिड

स्वरुप में होने को लेकर भी है। लेकिन कैलाश पर्वत के निचली सतह पर खींची गयी

तस्वीरों में विशाल प्रस्तर चित्र एक नया तथ्य प्रस्तु करने में सफल रहा है। हाई

रेजोल्यूशन तस्वीरों में दूर से यह हिस्सा कुछ ऐसा नजर आता है मानों लगातार बर्फ

जमने और गलने की वजह से वे प्राकृतिक तौर पर निशान छोड़ गये हों। लेकिन नजदीक

से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि उन्हें बहुत ध्यान से और पूरी बारिकी के साथ बनाया

गया है। नजदीक से देखने पर इन प्रस्तर की बनी आकृतियों की ऊंचाई दो सौ से ढाई सौ

फीट तक की नजर आती है। ऐसा खुद गूगल अर्थ के तकनीकी उपकरण ही बताते हैं।

इसमें बायीं तरफ से तीसरी आकृति में एक पुरुष और एक नारी नजर आती है। सबसे

दाहिनी तरफ सबसे लंबे व्यक्ति के साथ एक टोपी पहना हुआ शख्स बात चीत करता हुआ

नजर आता है। इनके नीचे भी अनेक सारी आकृतियां हैं, जो आकार में छोटी हैं। इन छोटी

आकृतियों का आकार भी तीस से चालीस फीट तक का है। इसलिए अब कैलाश के बारे में

इन तकनीकी विश्लेषणों के बाद जाहिर तौर पर नये सिरे से अध्ययन और शोध का काम

प्रारंभ होगा।

आभार

इस फिल्म के तैयार करने के लिए गूगल अर्थ के अलावा उसमें नजर आने वाली तस्वीरों

को जीवंत रिकार्ड करने के लिए बैंडीकैम डॉट कम के साफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया

है।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »

3 Comments

Leave a Reply

error: Content is protected !!
Open chat