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माउंट एवरेस्ट के आकार का उल्कापिंड गुजरेगा अगले माह

  • इसके गिरने की फिलहाल कोई आशंका ही नहीं 

  • पृथ्वी पर जब आयेगा तो लाखों लोग मारे जाएंगे

  • चार किलोमीटर से ज्यादा बड़ा है यह उल्कापिंड

  • जिस इलाके में गिरेगा वहां जीवन तबाह होना निश्चित

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः माउंट एवरेस्ट के आकार का उल्कापिंड यानी एक विशाल पत्थर, यह जहां

कहीं भी गिरा वहां तबाही तो वैसे ही आयेगी। लेकिन अगर यह कई हजार किलोमीटर प्रति

घंटे की रफ्तार से आकर पृथ्वी पर गिरे तो इसका झटका पूरी पृथ्वी में महसूस किया

जाएगा। साथ ही यह भी समझ लेना होगा कि अंतरिक्ष से यह जब पृथ्वी की तरफ आयेगा

तो यह आग का गोला बनकर गिरेगा। वैसे अगले महीने यह पृथ्वी के बगल से गुजर

जाएगा। खगोल वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी और उसकी धुरी के बीच भविष्य में कभी

टकराव जैसी स्थिति पैदा भी हो सकती है।

जिस उल्कापिंड के बारे में अप्रैल में नजदीक आने की चर्चा हो रही है, उसका नाम एस्ट्रोयड

52768 या 1998 ओआर 2 है। इसे हाल ही में इटली में स्थापित वर्चुयल टेलीस्कोप प्रोजेक्ट

के तहत देखा गया है। इस दूरबीन केंद्र से जुड़े डॉ गियानलुका मासी कहते हैं कि यह पृथ्वी

से अभी करीब 36 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर है। इसका आकार ही चिंता बढ़ाने के

लिए पर्याप्त है। आम तौर पर जब छोटे आकार के उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरते हैं तो

वायुमंडल में प्रवेश करते ही घर्षण की वजह से उनका अधिकांश भाग जलकर राख हो

जाता है। यह उल्कापिंड आकार में चार किलोमीटर के व्यास का है। यानी यह आकार में

माउंट एवरेस्ट के जितना बड़ा है। इसलिए इसे पृथ्वी के लिहाज से खतरा माना जाता है।

स्पष्ट है कि इतने बड़े आकार का उल्कापिंड जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करेगा तो

आग का गोला बन जाने के बाद भी उसका ढेर सारा हिस्सा जलता हुआ ही पृथ्वी से आ

टकरायेगा। नासा की गणना के मुताबिक इस बड़े उल्कापिंड के पृथ्वी के करीब आने की

अनुमानित तिथि 29 अप्रैल है।

माउंट एवरेस्ट आकार का उल्कापिंड 29 अप्रैल को सबसे करीब

किसी विशाल आकार के उल्कापिंड के करीब आने की वजह से वैज्ञानिक ऐसे आकार के

उल्कापिंडों के टक्कर से पृथ्वी पर होने वाले नुकसान को और बेहतर तरीके से समझ लेना

चाहते हैं। यह सभी को पता है कि इतने बड़े आकार का पत्थर भी अगर पृथ्वी पर आ गिरे

तो उससे हलचल पैदा होगा। इस उल्कापिंड के टकराने से भूकंप और सूनामी का आना तय

है। साथ ही पृथ्वी के अंदर अचानक के दबाव बढ़ने की वजह से कई ज्वालामुखी भी

अचानक से सक्रिय हो जाएंगे। इससे पहले एक दस किलोमीटर व्यास का उल्कापिंड जब

पृथ्वी पर आ गिरा था तो पृथ्वी पर उस वक्त राज करने वाली डायनासोर की प्रजाति एक

झटके में समाप्त हो गयी थी।

देखें कैसे समाप्त हुई थी डायनासोर की प्रजाति

इस उल्कापिंड के बारे में अनुमान है कि यह पृथ्वी से करीब सवा छह लाख किलोमीटर की

दूरी से गुजर जाएगी। अंतरिक्ष के लिहाज से यह काफी कम दूरी है। अप्रैल में इसके पृथ्वी

से टकराने की कोई आशंका नहीं है। एक बार गुजर जाने के बाद वह अपने रास्ते पर आगे

बढ़ जाएगा। वैसे अंतरिक्ष में छोटे बड़े आकार के अनेक ऐसे उल्कापिंड मंडरा रहे हैं,

जिनका कोई स्थिर ठिकाना नहीं है। ऐसे आवार किस्म के उल्कापिंडों से ही पृथ्वी को

ज्यादा खतरा है क्योंकि वे कभी भी किसी भी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर अपना

रास्ता और चाल बदल लिया करते हैं।

उल्कापिंडों की दिशा बदलने पर नासा में चल रहा है काम

नासा ने इस किस्म की चुनौती से निपटने के लिए एक खास मिशन पर काम करना प्रारंभ

किया है। इसके तहत पृथ्वी से काफी दूरी पर ही खास अंतरिक्ष यान की मदद से प्रक्षेपास्त्र

भेजकर ऐसे उल्कापिंडों को तोड़ कर दूसरी तरफ भेज देना है। इस पर काफी काम हो चुका

है और अनुमान है कि शीघ्र ही इसका वैज्ञानिक परीक्षण भी किया जाएगा। इसी वजह से

अनेक उल्कापिंडों तक अंतरिक्ष यान भेजकर उसके नमूने एकत्रित किये जा रहे हैं। इन

नमूनों से पता चल पायेगा कि उल्कापिंडों की बनावट कितनी मजबूत है और उन्हें किसी

रास्ते से हटाने के लिए कितनी ऊर्जा की जरूरत होगी।

पृथ्वी पर मंडराते इस खतरे के बारे में प्रोफसर एलन फिटसिमंस कहते हैं कि घोषित तौर

पर तो अभी कोई खतरा नहीं है। किसी बड़े आकार के उल्कापिंड का कभी भी पृथ्वी पर आ

टकराने की संभावना हमेशा बनी रहती है। उनके मुताबिक अगर कोई बड़े आकार का

उल्कापिंड वाकई पृथ्वी पर आ गिरा तो यह तय है कि पृथ्वी की बहुत बड़ी आबादी एक ही

झटके में समाप्त हो जाएगी। जिस इलाके में यह गिरेगा वहां का जीवन की नष्ट हो

जाएगा और हो सकता है कि पूरी पृथ्वी की भौगोलिक संरचना फिर से बदल जाए


 

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