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मां के दूध में अद्भूत वैज्ञानिक शक्तियां शामिल हैं परीक्षण हुआ







  • गहन शोध के बाद अति सुक्ष्म तत्वों का पता चला
  • मान्यताओं का वैज्ञानिक परीक्षण का नतीजा
  • जीएमएल अवस्था में विश्लेषण के नतीजे मिले
  • विकास और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः मां के दूध में अनेकों दवा जैसी वैज्ञानिक शक्तियां हैं।

इनका क्रमिक शोध से पता चला है।

इसी वजह से मां के दूध को पारंपरिक तौर पर सबसे बेहतर माना गया है।

अब वैज्ञानिक शोध में इसमें जो तत्व शामिल हैं, उनकी क्रमिक पहचान हो रही है।

शायद इन्हीं तत्वों की मौजूदगी की वजह से बच्चा मां के दूध से पूरी तरह सुरक्षित और अच्छी तरह विकसित हो पाता है।

वैज्ञानिक शोध के मुताबिक इसमें इम्युनेग्लोबूलिन, एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड्स, फैटी एसिड होते हैं।

इस बार में परसों प्रकाशित एक वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में जानकारी दी गयी है।

इस दूध में सर्वाधिक पौष्टिकता होने के पारंपरिक और सामाजिक कथन को जांचने के लिए ही यह अनुसंधान प्रारंभ किया गया था।

शोधकर्ताओं ने मां के दूध का छोटा सा हिस्सा प्राप्त कर उस पर यह शोध किया है।

शोध के लिए इस शारीरिक उत्पाद को अत्यंत सुक्ष्म अवस्था में विखंडित किया गया था।

यह क्षुद्र अणु वैज्ञानिक परिभाषा में ग्लाइसिरोल मोनोलाउरेट (जीएमएल) कहा जाता है।

इस अवस्था में मां के दूध और गाय के दूध का विश्लेषण एक साथ किया गया।

ऐसा कर वैज्ञानिक दोनों के अति सुक्ष्म अंतर को समझना चाहते थे।

जैसे जैसे दोनों का विश्लेषण होता गया एक एक कर दोनों के अंतर भी स्पष्ट होते चले गये।

मां के दूध की चर्चा सुनकर प्रारंभ किया था परीक्षण

वैज्ञानिक शोध के निष्कर्ष है कि इसमें एंटीमाइक्रोबायल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुण एक जीएमएल

में 3000 माइक्रोग्राम होता है जबकि गाय के दूध में यह मात्र 150 माइक्रोग्राम ही पाया गया।

इस क्रम में बाजार में मिलने वाले डब्बाबंद दूध इस शोध में पूरी तरह फेल हो गये

क्योंकि उनमें यह गुण मौजूद ही नहीं था।

इस एक अंतर से ही मां के दूध के असली गुणों का प्रारंभिक पता चला

और यह बात प्रमाणित हुआ कि शिशु के विकास में मां के दूध का सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है।

इसी गुण की वजह से उसके अंदर बीमारी की प्रतिरोधक शक्तियों का तेजी से विकास होता है।

साथ ही वह अंदर से मजबूत भी बनता चला जाता है।

वैज्ञानिकों ने इसके बाद इनमें मौजूद बैक्टेरिया की क्रमिक जांच की।

इसके तहत कई प्रकार की बैक्टेरिया की जांच की गयी।

जांच के दायरे में स्ट्राफाइलोकूकस आउरस, बासिलस सबटिल्स, क्लोस्टिडियम पेर्फरिंजेंस और

इसीरिचिया कोली को जांचा गया था।

इस परीक्षण में भी मां के दूध को सबसे अधिक नंबर मिले।

वैसे डब्बाबंद दूध में भी यह गुण पाये गये लेकिन दोनों यानी गाय के दूध और डब्बाबंद दूध दोनों

में इसकी मात्रा मां के दूध से बहुत कम पायी गयी।

जिसके आधार पर वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इंसानी मां के दूध में पैथोजेनिक

बैक्टेरिया के मामले में ज्यादा पोषक तत्व हैं, जो बच्चे के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।

डब्बाबंद दूध में इसके मुकाबले कुछ भी नहीं

इस शोध प्रबंध के प्रथम लेखक और वोवा विश्वविद्यालय के प्रोफसर पैट्रिक शिलीवर्ट ने इसके बारे में जानकारी दी है।

दूसरी तरफ नेशनल जुइस हेल्थ प्रो डोनाल्ड लियेंग ने भी अपने विचार रखे हैं, जो इस शोध से जुड़े हुए थे।

प्रो. पैट्रिक कहते हैं कि इस इंसानी दूध में वे सारे प्राकृतिक तत्व मौजूद हैं जो किसी किस्म के बैक्टेरिया के हमले को विफल कर सकते हैं।

इस दौरान अगर बच्चो को किसी बीमारी की वजह से एंटीबॉयोटिक्स दिये जाए

तो यह दवा बुरे बैक्टेरिया के साथ साथ अच्छे बैक्टेरिया का भी सफाया कर देती है,

जो शिशु के विकास के लिहाज से गलत है।

प्रो. डोनाल्ड कहते हैं कि दूध में जो तत्व हैं वे कई मायनों में अन्य सारे दूधों से पूरी तरह अलग हैं और शिशु के लिए सर्वश्रेष्ठ भी हैं।

वैसे वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि शरीर के लिए बेहतर समझे गये एंट्रोकूकस फेसिलीस

बैक्टेरिया के विकास का कोई गुण मां के दूध में मौजूद नहीं होता है।

जिस जीएमएल के आधार पर यह परीक्षण किया गया था, जब उसे दूध से अलग कर दिया गया

तो उस दूध के अनेक पोषक तत्व अपने आप ही समाप्त हो गये।

दूसरी तरफ इसी जीएमएल को जब गाय के दूध में जोड़ दिया गया तो उसमें ढेर सारे नये गुण विकसित हो गये।

इस आधार पर इसी जीएमएल को दूध की प्रकृति को विकसित करने का मुख्य कारण माना जा रहा है।

इसी आधार पर वैज्ञानिकों के शोध का निष्कर्ष यही है कि हर हालत में मां के दूध में ही बच्चों का सबसे अधिक भला होता है।



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