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बंदर से इंसान बनने का इतिहास सुक्ष्म प्रोटिन उत्पादन से जुड़ा है

  • प्राचीन फॉसिल्स के अध्ययन से पता चला
  • एमिनो एसिड की संरचना से बने थे प्रोटिन

  • प्रोटिन की विविधता से प्रजातियां भी बदली

  • जेनेटिक संरचना से जुड़ा है क्रमिक विकास 

राष्ट्रीय खबर

रांचीः बंदर से इंसान तक के सफर की हमारी कहानी काफी रोचक है। इसके वैज्ञानिक

तथ्य अब एक एक कर सामने आ रहे हैं। इससे पता चल रहा है कि हम अपने पूर्वजों से

कैसे धीरे धीरे अलग होते चले गये हैं।  जेनेटिक संरचना में जैसे जैसे बदलाव आये, हम

बंदर और चिंपाजी से इंसान होने की तरफ अग्रसर होते गये।यहां तक की प्राचीन मानव

प्रजाति और आज के दौर के इंसान के बीच भी जो क्रमिक विकास का अंतर है, वह मुख्य

तौर पर प्रोटिन संरचना की वजह से ही है। एमिनो एसिड से तैयार होने वाले प्रोटिन की

विविधता ने इंसानों को थोड़ा थोड़ा बदलने का काम किया। यही कारण है कि हम आज

जिस स्वरुप में हैं, वह प्राचीन काल के इंसानों की प्रजातियों से काफी भिन्न है। ऐसा सिर्फ

शरीर के अंदर बनने वाले प्रोटिन की संरचना की वजह से हो पाया है। जेनेटिक संरचना की

वजह से होने वाले क्रमिक विकास का दौर हो सकता है अब भी जारी हो लेकिन इस बारे में

तुरंत जानकारी हासिल करना संभव नहीं है। वैसे भी यह बदलाव कैसे आये, इस बारे में

पता तो तब चला जब पचास हजार वर्ष पुराने मानव अवशेष सुरक्षित अवस्था में फॉसिल

के तौर पर मिले। उनकी जेनेटिक संरचना का जब अध्ययन किया गया तो यह बात

सामने आयी कि इसी वजह से शरीर के अंदर प्रोटिन निर्माण की प्रक्रिया जैसे जैसे बदलती

गयी, वैसे वैसे इंसान का स्वरुप भी बदलता गया है। इसलिए हम मान सकते हैं कि बंदर से

आदमी बनने के पीछे इन्हीं प्रोटिनों का असली हाथ है।

बंदर से इंसान बनने का इतिहास भी लाखों वर्षों का है

प्राचीन काल में भी इंसानों की कई प्रजातियां थी, यह वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित तथ्य है।

उस काल में पृथ्वी का भूभाग एक ही था और वर्तमान पृथ्वी के भौगोलिक स्वरुप से काफी

भिन्न था। पूरी जमीनी सतह एक साथ जुड़ी हुई थी। बाद में विभिन्न कारणों से पृथ्वी के

बड़े बड़े खंड टूटकर अलग हो गये, जिन्हें आज हम टेक्टोनिक प्लेट के तौर पर जानते हैं।

जिनके आपस में टकराने की वजह से भी प्राकृतिक आपदाएं आती है।

जो प्राचीन फॉसिल्स मिले तो उनके अध्ययन से शरीर के अंदर की प्रोटिन की संरचना का

पता पहली बार चल पाया है। एमिनो एसिड से तैयार होने वाले प्रोटिन के यह सुक्ष्म अंश ही

इंसान की शरीर में बहुत सारी तब्दीलियां लाते हैं। वर्तमान में पूरी दुनिया को परेशानी

करने वाला कोरोना वायरस भी अपने प्रोटिन के आवरण की वजह से ही शरीर के अंदर

प्रवेश करने के बाद लोगों को बीमार करता है। प्राचीन इंसानों के फॉसिल्स के डीएनए

परीक्षण से इसके बारे में जानकारी मिली है। इस तथ्य के आधार पर वैज्ञानिक इस नतीजे

पर पहुंचे हैं कि जेनेटिक संरचना के तौर पर पहले के इंसान और अभी के इंसान में काफी

कुछ बदल गया है। लिहाजा यह माना जा सकता है कि प्रोटिन में हुए परिवर्तनों की वजह

से ही हम बंदर से इंसान की वर्तमान प्रजाति तक का सफर तय कर पाये हैं।

पुराने फॉसिल्स सुरक्षित मिले तो शोध में रहस्य सुलझा

पुराने फॉसिल्स से प्रोटिन का यह अंश हासिल करने के बाद जब उनका विश्लेषण किया

गया तो धीरे धीरे एक से दूसरी कड़ी जुड़ती चली गयी। इसी वजह से ऐसा माना जा रहा है

कि अति प्राचीन काल में जब पृथ्वी पर एक कोष के एमिबा का जन्म हुआ था तो वहां से

आज तक का सफर भी इसी अंतर की वजह से हुए। जेनेटिक संरचना में जैसे जैसे बदलाव

हुए एक कोष वाले जीवन से अलग अलग प्रजातियों का अलग अलग तरीके से विकास

होता चला गया है। इसी तकनीक के आधार पर यह भी जाना जा सकता है कि प्राचीन

इंसान की कौन सी प्रजाति वर्तमान महाद्वीपों के कौन से हिस्से में रहती थी और कहां की

जमीन पूर्व में पृथ्वी के किस दूसरे इलाके से जुड़ी हुई थी। इंसान की जिन प्रजातियों के

अवशेष मिले हैं, उनमें से होमो सैपियंस के अलावा शेष सभी प्रजातियां अब विलुप्त हो

चुकी हैं। लेकिन इसके बीच भी एक प्रजाति का दूसरी प्रजाति से संपर्क रहा है और उससे

उत्पन्न इंसान की प्राचीन प्रजाति में जेनेटिक संरचना की विविधता देखी गयी है। प्रोटिन

के उन्नत और विकसित होने की यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल है और जेनेटिक संरचना पर

ही आधारित है। इसी वजह से ऐसा माना जा रहा है कि दरअसल बंदर से इंसान बनने की

लंबी प्रक्रिया में इनकी बड़ी प्रमुख भूमिका रही है। इसी अंतर की वजह से आज हम अपने

पूर्वजों की तुलना में अलग नजर भी आते हैं।


 

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