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मोनार्क प्रजाति की तितलियां पूरे दुनिया में फैली है

मोनार्क प्रजाति की तितलियां पूरे दुनिया में फैली है
  • अमेरिकी महाद्वीप की मूल निवासी हैं वे

  • अब ऑस्ट्रेलिया तक में मौजूद हैं तितली

  • कई कारणों से अब आबादी घट रही है

  • नन्ही सी जान ने पूरी दुनिया तय की है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मोनार्क प्रजाति की तितली अब पूरी दुनिया में पायी जाती है। दरअसल इस प्रजाति

की तितलियां मूल तौर पर दो किस्म की होती हैं। उनके पूरी दुनिया के अनेक देशों तक

पहुंच जाने से यह प्रमाणित हो जाता है कि नन्हें पंखों और बहुत कम जीवन अवधि के बीच

उसने लंबा फासला तय किया है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका की मूल निवासी यह

मोनार्क तितलियां अब दुनिया के अनेक देशों में हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कई

पीढ़ियों से लगातार उड़कर सफर करते हुए इनलोगों ने लगभग पूरी दुनिया को भी नाप

लिया है। दुनिया के कई हिस्सों में फैल चुकी इस प्रजाति के फिलहाल विलुप्ति का खतरा

भी है। कई कारणों से इस प्रजाति के तितलियों की संख्या पूर्व के मुकाबले कम हो रही हैं।

इस पर अब विस्तार से शोध भी किया गया है। जिससे उनके जीवन चक्र का पता चलता

है। मोनार्क ज्वाइंट वेंचर नामक एक स्वयंसेवी संस्थान ने इस पर आंकड़े एकत्रित करने के

बाद दुनिया को उनके सैर करने की क्षमता से परिचित कराया है। इसी शोध से पता चलता

है कि यह तितलियां कहां से कहां तक की दूरी तय करने में कामयाब रही हैं। वर्तमान में

मोनार्क प्रजाति की तितलियां दो किस्म की हैं। इनमें से एक डी एरिपपुस सिर्फ दक्षिण

अमेरिका में ही रहता हैं। दूसरी तरफ इसी प्रजाति की दूसरी किस्म, जिसे डी प्लेक्सिपूस

कहा जाता है अब ऑस्ट्रेलिया में भी मौजूद हैं। इसके अलावा यह प्रजाति इंडोनेशिया,

पुर्तगाल, स्पेन और हवाई द्वीप तक पहुंच चुकी हैं। अनुमान है कि समुद्री नाव पर किसी

कारण से सवार होने के बाद यह प्रजाति समुद्र लांघकर अन्य इलाकों में पहुंची है।

मोनार्क प्रजाति की तितलियों अपने साथ जहर भी रखती हैं

इस प्रजाति पर हुए शोध के मुताबिक एक मादा तितली एक बार में तीन सौ से पांच सौ अंडे

देती है। लेकिन इनमें से सिर्फ दस प्रतिशत ही बच जाते हैं। शेष को अन्य मकोड़े और कीटे

ही खा जाते हैं। वैसे शोध में यह भी देखा गया है कि जब प्रयोगशाला के सुरक्षित माहौल में

इन तितलियों के अंडे देने का क्रम हुआ तो एक तितली ने ग्यारह सौ अंडे भी दिये हैं।

मोनार्क प्रजाति की तितलियों के अंडों को तीन से पांच दिन लगता है। उसके बाद वे अंडे से

बाहर निकलकर एक कैटरपीलर की शक्ल में किसी पत्ते पर लटक जाते हैं। यह उनके

जीवन का दूसरा चक्र होता है, जिसे लार्वा भी कहा जाता है। इस अवस्था में होने के बाद वह

खुद को मजबूत बनाते हुए अपने इस कवच से मुक्त करने का काम प्रारंभ करता है। किसी

पत्ते पर लटके होने के दौरान यह किसी कोकून को तरह नजर आता है, जिसका आकार

बहुत छोटा होने के बाद समय के साथ बढ़ता चला जाता है। इसी निरंतर बढ़ने की वजह से

ही अंदर के दबाव में उसका खोल धीरे धीरे फटता है और मोनार्क तितली बाहर आती है।

आम तौर पर इस प्रक्रिया को पूरी होने में आठ से पंद्रह दिन का समय लगता है। वैज्ञानिकों

ने पाया है कि कैटरपीलर के बाद उनके शरीर के ऊपर चढ़ा आवरण सिल्क जैसा नहीं होता

है। आम तौर पर दूसरे मथ प्रजाति के ऐसे ही खोल सिल्क से बने होते हैं। इस खोल से

बाहर आने के बाद ही तितली पंख फैलाकर उड़ने के लिए तैयार हो जाती है। रंग बिरंगे पंखों

वाली इस तितली को दूर से ही पहचाना जा सकता है।

पंखों के रंग और उनपर धब्बों के कारण अलग पहचान

उनके पंख श्वेत और श्याम वर्ण के होते हैं, जिनपर भूरे और पीले रंग के धब्बे होते हैं।

आकार में उनके पंखों का फैलाव सात से दस सेंटीमीटर तक हो सकता है। वैसे शोध में

पहली बार यह भी जानकारी मिली है कि तितलियों को अपना भोजन बनाने वाली जीवों के

लिए यह तितली अपने साथ जहर भी रखती है। इसी जहर की वजह से उनपर दूसरे कीट

हमला नहीं करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ विंसकॉंसिन– मेडिसन एरोबोरेटूम के वैज्ञानिकों ने

पाया है कि उनके शरीर में मौजूद यह जहर उनके भोजन ग्रहण करने की वजह से पैदा

होता है। इस जहर की वजह से ही पक्षी, मेंढक और अन्य सरीसृप उनपर हमला करने से

बचते हैं क्योंकि यह जहर ऐसे हमलावरों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला होता है। अलग

अलग देशों में पायी गयी इस मोनार्क प्रजाति की तितलियों का डीएनए भी एक ही है।

इससे स्पष्ट होता है कि वे किसी माध्यम से उड़ते हुए दूसरे महाद्वीपों तक अपना सफर

तय करने के बाद वहां भी सही तरीके से जीवन बसर कर रही हैं। सिर्फ हाल के दिनों में

पर्यावरण असंतुलन और पेड़ काटे जाने की वजह से मोनार्क प्रजाति के साथ साथ अन्य

प्रजाति की तितलियों की आबादी से तेजी से कम हो रही है।

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