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मोलनुपिरावीर नाम की दवा का कृत्रिम फेफड़े पर किया गया है इस्तेमाल

  • इंसानी फेफड़े की नकल पर हुआ है यह प्रयोग

  • थाईलैंड के चमगादड़ो में भी वायरस पाया गया

  • दो दिनों में संक्रमण को कम करने में कामयाब

  • दवा का प्रयोग प्रयोगशाला में कोरोना पर सफल रहा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मोलनुपिरावीर नाम की एक नई दवा पर प्रयोग चल रहा है। प्रयोगशाल में तैयार

किये गये इंसानी फेफड़े की नकल पर कोरोना वायरस का प्रभाव होने के बाद यह दवा तेजी

से काम करती हुई पायी गयी है। मेर्क एंड कंपनी तथा रिजबैक थिरापुटिक्स के संयुक्त

प्रयास पर यह काम चल रहा है। प्रयोगशाला में सफल होने के बाद इस दवा का दूसरे और

तीसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल भी चल रहा है। लेकिन यह भी अभी प्रयोगशाला के

स्तर पर ही है।

वीडियो में समझिये क्या है यह वायरस और क्यों जरूरी है इसकी दवा

सब कुछ जांच और समझ लेने के बाद वैज्ञानिक इस नई दवा का इंसानी क्लीनिकल

ट्रायल प्रारंभ करेंगे। इस दवा के महत्व को खास तौर पर ब्रिटेन में पाये गये नये स्वरुप के

कोरोना वायरस की वजह से अधिक माना जा रहा है। प्रयोगशाला में जब इंसानी फेफड़े के

प्रतिकृति पर कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद यह दवा आजमायी गयी तो दो दिनों के

भीतर उसके उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिले हैं, ऐसा शोधकर्ता दावा कर रहे हैं अपनी

दावा के संबंध में उन्होंने एक वैज्ञानिक शोध प्रबंध भी जारी किया है। इस दवा की विशेषता

यह है कि यह मरीज के अधिक संक्रमित होने के दौर को रोक सकता है। ऐसे में मरीज को

गंभीर अवस्था में पहुंचने के बाद अस्पताल में भर्ती होने की परेशानियों से भी मुक्ति मिल

जाती है। इस किस्म की दवा की जरूरत इसलिए भी अधिक महसूस की गयी है क्योंकि

थाईलैंड के जंगलो में भी चमगादड़ों से लिये गये वायरस के नमूने कोरोना वायरस से मेल

खाते हैं। ऐसे में फिर किसी माध्यम से कोरोना वायरस का और किसी नये स्वरुप में इसके

फैलने की आशंका से इंकार नही किया जा सकता है। दवा पर काम उस दौर में युद्धस्तर पर

चल रहा है जबकि पूरी दुनिया में वैक्सिन टीकाकरण का काम भी जारी है।

मोलनुपिरावीर की जरूरत बदलते कोरोना वायरस की वजह से भी

पूर्वी थाईलैंड के एक अभयारण्य में बने कृत्रिम गुफा में पाये गये चमगादड़ों से जब वायरस

के नमूने एकत्रित किये गये तो यह पता चला कि उनमें भी आरएसीसीएस 203 नाम का

वायरस है।यह दरअसल कोरोना के मूल वायरस के स्वरुप के काफी मिलता जुलता है। इस

वायरस की जेनेटिक संरचना का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं

कि यह असली सार्सकोव 2 के वायरस से 91.5 प्रतिशत जेनेटिक मेल खाता है। लेकिन

अच्छी बात यह भी है कि थाईलैंड के चमगादड़ों मे जो वायरस पाया गया है वह अपने इस

स्वरुप में इंसानी शरीर पर हमला नहीं कर सकता है। दूसरी तरफ चमगादड़ और पैंगोलिन

जैसे जानवरों में प्राकृतिक तौर पर इस वायरस का प्रतिरोधक मौजूद होता है। लेकिन

वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह वायरस अलग अलग स्वरुप में एशिया के अनेक

इलाकों में फैला हुआ है। सिंगापुर विश्वविद्यालय के प्रोफसर लीन फा वांग ने कहा कि

इसके मूल केंद्र को जानने के लिए अभी जांच को जारी रखना होगा।

इधर ब्रिटेन के नये कोरोना वायरस की वजह से भी यह जरूरत महसूस की जा रही है कि

लोगों को अस्पताल जाने की परेशानियों के बचाया जा सके। इसी वजह से यूएनसी ने

अपनी दवा मोलनुपिरावीर का ऐसा परीक्षण किया है। यह एक्सपेरिमेंटल दवा है जिसे

प्रयोग के लिए इआईडीडी 2801 भी कहा जाता है। जो जांच अभी दूसरे और तीसरे चरण में

जारी हैं, उसके भी परिणाम मार्च के प्रारंभ में ही हमारे सामने आ सकते हैं। यदि सब कुछ

सही रहा तो उसके बाद ही इसका इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ किया जाएगा।

सब कुछ जांच लेने के बाद ही क्लीनिकल ट्रायल प्रारंभ होगा

मोलनुपिरावीर दवा के असर के बारे में बताया गया है कि जब कोरोना वायरस इस दवा के

संपर्क में आया तो दो दिनों के भीतर दवा के प्रभाव की वजह से कोरोना संक्रमण 25

हजारवां भाग रह गया था। इंसानी फेफड़े को ही अभी यह वायरस सबसे अधिक प्रभावित

करता है, जिसकी वजह से अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीज को वेंटीलेटर से ऑक्सीजन

भी देना पड़ जाता है। यह दवा फेफड़े में कोरोना वायरसों की आबादी को तेज से कम करने

में कामयाब पायी गयी है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर एडवांसमेंट ऑफ ट्रांसलेशन सर्विसेज के

प्रोफसर और निदेशक डॉ जे विक्टर ग्रासिया कहते हैं कि 48 घंटे के भीतर वायरस का

इतनी तेजी से कम होना उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह फेफड़े में कोरोना की वजह से होने

वाली परेशानियों को तेजी से कम करती चली जाती है।

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