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मोइरांगथेम लोइया भी दशरथ मांझी जैसा दृढ़ संकल्प पूरा कर चुके हैं




  • 17 सालों के निजी प्रयास से तैयार किया तीन सौ एकड़ जंगल
  • निजी प्रयास के जंगल में अब वन्य प्राणियों का बसेरा भी
  • असली काम तो वहां हुआ जहां एक भी पेड़ नहीं था
  • पढ़कर लौटे तो वीरानी देखकर हैरान रह गये

प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः मोइरांगथेम लोइया आम तौर पर एक अपरिचित सा नाम है।

वैसे दशरथ मांझी का नाम हर कोई जानता है। उनकी जीवनी पर एक फिल्म भी बनी है।

इस फिल्म में दशरथ मांझी की भूमिका नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभायी है।

इस फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद अधिकाधिक लोगों को यह पता चला है कि कैसे दशरथ मांझी ने एक चुनौती स्वीकार कर पहाड़ को काटकर गांव के लोगों के लिए रास्ता बना दिया।

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अब लगभग यही कहानी मणिपुर के मोइरांगथेम लोइया का है।

लोइया ने भी सामाजिक सोच को आगे बढ़ाते हुए अपनी तरफ से पहल की।

इसी पहल का नतीजा है कि दशरथ मांझी की तरह लोइया ने 17 वर्षों के अथक परिश्रम के बाद तीन सौ एकड़ का शानदार जंगल तैयार कर दिया है।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि लोइया ने जिस जमीन को हर भरा बनाने का काम प्रारंभ किया था,

वह प्रारंभ में पूरी तरह बंजर जमीन थी। अब वहां घना जंगल है।

45 वर्षीय लोइया ने 17 साल पहले यह काम इलाके के पर्यावरण को बचाने के लिए प्रारंभ किया था।

अब यही जंगल अनेक किस्म के वन्य प्राणियों का बसेरा बन चुका है।

इस जंगल में सारे पेड़ उनके द्वारा ही लगाये गये हैं।


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इसलिए उन्हें पता है कि उनके इस जंगल में 250 प्रजाति के पेड़ तथा 25 प्रजाति के बांस हैं।

अब तो जंगल खुद से भी बढ़ने लगे हैं क्योंकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

जंगल की स्थिति बेहतर होने की वजह से यह जंगल अब अपने पैरों पर खड़ा है।

लेकिन लोइया अब भी इसकी नियमित देखभाल करते रहते हैं ताकि फिर से कोई इसे नुकसान ना पहुंचाये।

मोइरांगथेम लोइया वर्ष 2000 में कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लौटे




वर्ष 2000 में अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अचानक कोउब्रू इलाके में पहुंचे थे।

बचपन में उन्होंने इस इलाके को पूरी तरह हरा भरा देखा था।

लेकिन कॉलेज के बाद जब वह दोबारा यहां पहुंचे तो यह पूरी तरह बंजर हो चुका था।

दरअसल पर्यावरण के नष्ट होने के साथ साथ लोगों द्वारा पेड़ काट दिये जाने की वजह से यह पूरा का पूरा इलाका वीरान हो चुका था।

इस हालत को देखकर ही अचानक लोइया के मन में इसे फिर से हरा भरा बनाने का विचार उत्पन्न हुआ।

उन्होंने फिर से वहां पेड़ लगाने का निश्चय किया और काम में जुट गये।

अगले दो वर्षों के बाद स्थानीय लोग भी इस प्रयास की न सिर्फ सराहना करने लगे बल्कि वे भी अपने अपने स्तर पर लोइया की मदद करने लगे।

लेकिन असली कहानी इसके बाद से प्रारंभ हुई। वर्ष 2002 में जब मोइरांगथेम लोइया मारू लांगोल के पहाड़ी इलाके में पहुंचे तो हैरान रह गये।

इस इलाके में एक भी पेड़ नहीं बचा था।

इसी इलाके को नये सिरे से हरा भरा बनाने का काम उनके लिए ज्यादा चुनौती पूर्ण था।

इस काम को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी भी छोड़ दी

क्योंकि वह समझ गये थे कि इतनी बड़ी चुनौती को पूरा करने के लिए निरंतर काम करना पड़ेगा।

एक कुटिया बनाकर लगातार छह साल तक रहे

लोइया ने पास में ही पुनशिलोक में एक कुटिया बनायी और वहीं रहना प्रारंभ कर दिया।

वह अगले छह वर्षों तक इसी कुटिया में रहते हुए इलाके में बांस एवं अन्य जंगली पेड़ों के साथ साथ फलदार पेड़ भी लगाते चले गये।

इसका नतीजा है कि अब इलाका पूरी तरह से जंगल से घिर चुका है।


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इस बात की जानकारी मिलने के बाद मणिपुर के प्रधान मुख्य वन संरक्षक के. अंगानी ने भी लोइया के इस प्रयास की सराहना की है।

अब स्थानीय लोगों के माध्यम से यह जानकारी सोशल मीडिया के जरिए देश विदेश तक फैल चुकी है।

लोगों ने लोइया के प्रयास को इसी माध्यम से न सिर्फ देखा है बल्कि उसकी सराहना भी की है।

अनेक लोगों को मानना है कि तेजी से बिगड़ते पर्यावरण के बीच अब लोइया जैसे एकल प्रयास करने वालों को भी

प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत है ताकि जिस तेजी से पेड़ कट रहे हैं, उसके अधिक तेजी से पेड़ लगाये जा सके।

तभी दुनिया की स्थिति बिगड़ने से बची रहेगी।


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