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मोदी के विकास मॉडल की परख अब बिहार में

मोदी के विकास की अवधारणा पर हम बहुत कुछ सुनते समझते आये हैं। कोरोना संकट

के पूर्व इन बातों पर बहुत अधिक गौर नहीं किया जाता था। लेकिन वैश्विक संकट कोरोना

ने सारी पूर्व अवधारणाओं को ही बदल दिया है। इसलिए आम जनता को यह आस लगी

रहती है कि सरकारें उसे कब और कैसे लाभ पहुंचाने जा रही हैं। तेजस्वी यादव की दस

लाख नौकरी के मुकाबले भाजपा के 19 लाख रोजगार की अग्निपरीक्षा भी यहां होने जा

रही है। भले ही इस बार भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री हैं लेकिन बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र

मोदी के ऊपर ही सारा दारोमदार है। वैसे भी बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे और तीसरे

चरण में श्री मोदी के प्रयासों से ही भाजपा के उम्मीद से अधिक सफलता मिली है। जिसके

परिणाम स्वरुप अब उसके कोटा से दो दो उप मुख्यमंत्री हैं। इतना भी स्पष्ट है कि मोदी के

दावों की परख के साथ साथ भाजपा अब बिहार में सब कुछ नीतीश कुमार के भरोसे नहीं

छोड़ने जा रही है। इसी वजह से नीतीश कुमार के प्रिय रहे सुशील कुमार मोदी का भी पत्ता

साफ हो गया है। इतना तो स्पष्ट हो गया कि आज भी विरोधियों के पास मोदी के मुकाबले

का कोई नेता नहीं हैं। लेकिन भाजपा को भी यह चिंता कर लेना चाहिए कि मोदी के बाद

अथवा उनके विकल्प के तौर पर उसका पास भी कहीं नेतृत्व की शून्यता तो नहीं हो रही

है। पार्टी में कई अन्य नेता तो हैं लेकिन वे जनमानस को कितना प्रभावित कर पाते हैं,

उसके प्रमाण पूर्व के कई चुनावों में मिल चुका है।

नीतीश कुमार का काम बोलता है अब मोदी की परीक्षा

बिहार राज्य विकास के मार्ग पर आगे बढऩे की प्रधानमंत्री की चर्चित क्षमता का असली

इम्तिहान भी बन सकता है। कंपनियां अरबों के निवेश से विनिर्माण इकाइयां लगाएं,

हजारों की संख्या में बढिय़ा वेतन वाले रोजगार पैदा हों और संपन्नता का एक पनाहगाह

बनकर उभरे, ताकि यह पिछड़ा राज्य आगे बढ़ सके। वर्तमान में कोरोना संकट की वजह

से यह सबसे बड़ी चुनौती भी है।

मोदी के विकास मॉडल को गुजरात कहकर प्रचारित किया

आलोचकों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियों पर जो सवाल उठाए

उसका मुख्य आधार यही रहा है कि उन्होंने इस राज्य में दशकों से कायम संपन्नता एवं

सक्षमता का फायदा उठाया। भारत के नेता के तौर पर मोदी आर्थिक एवं बदलावकारी

प्रतिभा दर्शाने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं और कोविड-19 महामारी के समय उनके कमजोर

प्रदर्शन से पहले ही यह बात उजागर हो चुकी थी। अब बिहार की परिस्थितियां न तो

गुजरात है और न ही दिल्ली है। इसलिए श्री मोदी के विकास मॉडल की परख का इससे

बेहतर मैदान भी नहीं हो सकता था। दरअसल मोदी ने बिहारी मतदाताओं की आकांक्षाओं

के बारे में अच्छी समझ दिखाई और इसके बीमारू दर्जे का जिक्र करते हुए वहां के लोगों को

गरीबी के दंश का अहसास दिलाने में सफल रहे। उन्होंने लालू प्रसाद और उनकी पार्टी

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के शासन को बिहार के ‘बीमारू’ दर्जे के लिए जिम्मेदार

बताया। उनके राजनीतिक सहयोगी एवं फिर मुख्यमंत्री चुने गए नीतीश कुमार का

पिछला रिकॉर्ड भी इस समस्या की भयावहता की वजह हो सकता है। बिजली, सड़क, पानी

देने और कानून व्यवस्था की हालत सुधारने से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के लिए तीन बार

से मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश को सुशासन का खिताब दिया जाता रहा है। अगर

बिजली देने के मामले में ही उनकी उपलब्धियां देखें तो पता चल जाता है कि उनका काम

किस कदर चुनौतीपूर्ण रहा है? नीतीश के दौर में बिहार में बिजली खपत 700 मेगावॉट से

बढ़कर 6,000 मेगावॉट हो गई और ‘लालटेन युग’ का खात्मा हो गया।

लालू के लालटेन की आलोचना की परख अब आने वाले दिनों में

नीतीश अक्सर लालू की पार्टी राजद के चुनाव चिह्न लालटेन को उस शासन के प्रतीक के 

तौर पर पेश करते रहे हैं। पहली बार बिहार जाने वाले बाहरी लोगों को यह बात थोड़ी खटक

सकती है कि नीतीश की उपलब्धियों को लेकर होने वाली चर्चाओं में कितना दम है?

लेकिन निश्चित रूप से बिहार के लोगों ने इस बदलाव को खुद महसूस किया है। फिर भी

यह विडंबना ही है कि सुशासन के बावजूद बिहार अब भी बीमारू राज्यों में बना हुआ है और

विकास के तमाम मानदंडों पर होने वाली रैंकिंग में अक्सर निचले पायदानों पर मौजूद

रहता है। सीएजी के पूर्व महानिदेशक गोविंद भट्टाचार्य ने ‘इकनॉमिक सर्वे ऑफ बिहार’ का

हवाला देते हुए कई विसंगतियों को रेखांकित किया है। इसलिए अब मोदी के विकास

मॉडल का कितना लाभ बिहार को मिल पाता है, उसकी परख हो जाएगी क्योंकि इस

मामले में मोदी के समर्थकों के पास भी नया कुछ दलील देने को बचा नहीं है। कोरोना

संकट की वजह से पूरा मैदान साफ है और उस मैदान में नये सिरे से खेती करने और उसमें

फसल उगाने की चुनौती है


 

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