Press "Enter" to skip to content

विधानसभा चुनाव से पहले शह और मात का खेल हो गया तेज




चुनावी चकल्लस

  • मोदी को भी लगने लगा है योगी से अकेले ना होगा

  • उत्तरप्रदेश में अब अखिलेश और जयंत का जलवा

  • बनारस में जुटेंगे देश के सारे भाजपाई मुख्यमंत्री

  • किसान आंदोलन ने जनता को काट कर रख दिया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः विधानसभा चुनाव से पहले उत्तरप्रदेश के मैदान में लड़ाई का माहौल बदलता हुआ नजर आ रहा है। मेरठ में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी की संयुक्त रैली क्या हुई, भाजपा के चेहरों के रंग उड़ गये।




साफ है कि किसान आंदोलन में लगे 440 वोल्ट के झटके के बाद अब खुद नरेंद्र मोदी भी समझ चुके हैं कि अकेले योगी आदित्यनाथ के भरोसे इस मोर्चा को नहीं छोड़ा जा सकता है। अकेले योगी इस तूफान को झेल नहीं पायेंगे और इस प्रदेश से डेरा डंडा उखड़ा तो आगामी लोकसभा चुनाव में कोई भी ताल ठोंककर मैदान में चुनौती देने लगेगा।

इसी वजह से अब प्रधानमंत्री का लगातार उत्तरप्रदेश का दौरा हो रहा है। आज भी वह बलरामपुर में कई योजनाओं की शुरुआत करने वाले हैं। समझा जा सकता है कि चुनाव आयोग ने नेताओं को पहले ही सब कुछ घोषणा कर लेने की छूट दे रखी है ताकि आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले यह सारा काम निपट जाए।

इतना कुछ होने के बाद भी माहौल में क्या कुछ बदलाव होगा, यह तो दिल्ली की सीमा से किसानों के घर लौट जाने के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा। वरना इससे पहले किसान आंदोलन की ताप में जल जाने के भय से इलाके के भाजपा नेता मुंह छिपाये फिर रहे थे।

एक नेता जो लाठी लेकर किसानों को हटाने आये थे, वह खुद अभी सीन से गायब ही चल रहे हैं। उत्तरप्रदेश के भाजपा नेता केशव प्रसाद मौर्य भले ही अब यह कह रहे हैं कि किसान आंदोलन के फैसले को हार और जीत के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन वास्तव में स्थिति इसके उलट है।

विधानसभा चुनाव के पहले जोर आजमाइश का दौर

पूरे देश में यह संदेश एकदम स्पष्ट गया है कि 56 ईंच के सीना वाले अक्खड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी राजनीतिक पराजय से भय लगता है। यह भय किसानों ने पैदा कर दिखाया है।

धरती का सीना चीरकर फसल उगाने वालों ने फिर से अपने जिद से यह साबित कर दिया है कि अंतिम फैसला तो आम आदमी का ही होता है। अब इसकी सफाई में भाजपा के लोग चाहे जो कुछ कहते रहें जनता के बीच जो संदेश जाना था, वह पहुंच चुका है।




भाजपा की चर्चा हो रही है तो बेचारे अमित शाह की भी चर्चा कर लें। दरअसल पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद उनका रुतवा भी घट चुका है। इसलिए अब वह भी टीम के अगुवा या नंबर दो की हैसियत में नहीं रहे।

प्रदेश में कुछ न कुछ असर दिखाने वाले नेता इनदिनों साइड लाइन पर ही हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और आरएलडी के गठबंधन के बाद अन्य छोटे दल भी लाल टोपी की तरफ आकर्षित नजर आने लगे हैं।

कांग्रेस अब भी पूरी तरह अलग थलग

इनसे अलग कांग्रेस की तरफ से अब तक मैदान में अकेले प्रियंका गांधी नजर आयी हैं। जिन्होंने महिलाओं के लिए कुछ एलान कर भाजपा नेत्री रीता बहुगुणा जोशी को नाराज कर दिया है।

साफ है कि प्रियंका गांधी की चाल से भी महिलाओं के बीच होने वाले प्रभाव को भाजपा भांप रही है। लेकिन अब भी कांग्रेस प्रमुख चुनौती के तौर पर आगे ही नहीं आ पायी है।

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के अलावा भी पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में दोनों राष्ट्रीय दल लगभग एक जैसी हालत में हैं। जहां की क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें नजरअंदाज कर रखा है।

दूसरी तरफ देश की सबसे नई राजनीतिक पार्टी इन सभी राज्यो में कुछ न कुछ वोट प्रतिशत पाने में सफल होगी जबकि खुद पार्टी को इस बार पंजाब और उत्तराखंड से अधिक उम्मीदें हैं।

लिहाजा इन सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव में असली चुनौती तो भाजपा के लिए ही है क्योंकि इन चुनावों को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है।



More from HomeMore posts in Home »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from राजनीतिMore posts in राजनीति »

One Comment

Leave a Reply

Mission News Theme by Compete Themes.
%d bloggers like this: