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मोदी भक्ति और राहुल प्रेम में गौण हो गये हैं असली मुद्देः प्रशांत किशोर




नईदिल्लीः मोदी भक्ति एक तरफ है तो दूसरी तरफ राहुल प्रेम। यह दोनों ही दरअसल भारतीय राजनीति को सिर्फ दो खेमों तक बांटकर रखना चाहते हैं। इसी दो तरफा प्रयासों की वजह से देश में असली मुद्दे हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।




यह टिप्पणी चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने व्यक्त किये हैं। श्री किशोर ने कहा कि दरअसल देश के असली मुद्दे इन दोनों के व्यक्तित्व की लड़ाई नहीं है। फिर भी दोनों नेताओं के समर्थकों की फौज सोशल मीडिया के जरिए अपने नेता के समर्थन में तूफान खड़ा करना चाहती है।

इसी वजह से कई बार सिर्फ एक मुद्दे पर दोनों पक्षों की लड़ाई की वजह से असली मुद्दा ही पीछे छूट जाता है। वैसे श्री किशोर ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इसी लड़ाई को जारी रखने में भाजपा को फायदा है क्योंकि इसमें उलझने की वजह से विपक्ष मजबूत नहीं हो पा रहा है।

सिर्फ नरेंद्र मोदी भक्ति और राहुल गांधी की भक्ति से देश की राजनीति की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती, इस बात को अब विपक्ष को भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। इन दोनों के समर्थकों की जंग से खुद को अलग रखकर ही विपक्ष मजबूती के साथ उभर सकता है।

उन्होंने इसी क्रम में स्पष्ट कर दिया है कि देश की राजनीति में तुरंत का कोई समाधान संभव नहीं है। निरंतर प्रयास के बाद ही विपक्ष की राजनीति एक सही आकार ले पायेगी। तब जाकर भाजपा को अपने खिलाफ खड़े विपक्ष की ताकत का एहसास हो पायेगा लेकिन यह काम रातों रात तो नहीं हो सकता है।




मोदी भक्ति कीजिए या राहुल की तारीफ इससे राजनीति नहीं चलती

चुनावी मसलों पर प्रशांत किशोर की बातों को अब काफी गंभीरता से लिया जाता है। दरअसल पश्चिम बंगाल चुनाव के काफी पहले वह एकमात्र व्यक्ति थे, जिन्होंने ममता बनर्जी के पक्ष में काम करते हुए यह कहा था कि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक सौ सीटें भी नहीं जीत पायेगी।

धुआंधार प्रचार के दौर में अन्य बड़े मीडिया घराने वहां भाजपा को दो सौ से अधिक सीट मिलने की उम्मीद जताने लगे थे। चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि प्रशांत किशोर का वहां की चुनावी राजनीति का आकलन बिल्कुल सही था।

अब वह मोदी भक्ति की बीमारी से विपक्ष को दूर हटने तथा असली मुद्दों पर बात करने की सलाह दे चुके हैं। उन्होंने आगाह किया है कि दरअसल देश की राजनीति को इस तरफ जबरन धकेला जा रहा है कि या तो आप मोदी भक्ति में हैं अथवा राहुल गांधी के समर्थक हैं।

दरअसल देश की राजनीति इन दोनों से कोई ताल्लुकात नहीं रखती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महत्वपूर्ण राजनीतिक सवालों का उत्तर सिर्फ हां या ना में नहीं हो सकता। वर्तमान में मोदी भक्ति और राहुल प्रेम इसी हां और ना जैसी उलझन है, इससे अन्य विपक्षी दलों को मुक्त होकर अपना रास्ता खुद तलाशना होगा।



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