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आधुनिकता के दौर में मिट्टी के दीयों की बिक्री हुई कम




  • अब नहीं दिखती चाक, झालर ने धंधे को किया खत्म

कोडरमाः आधुनिकता के दौर मे कुम्हारों के धंधे पर जहां ग्रहण लग गया हैं

वही दूसरी और चायनीज इलेक्ट्रॉनिक दीयो और झालर की जगमगाहट ने लोगों को मिट्टी से बने दीयों से

कोसो दूर कर दिया है।

दूसरो के घरो को रोशन करने वाले कुम्हारों के घर आज खुद अंधेरा नजर आ रहा हैं

कुम्हार मिट्टी का दीया बना दीपावली मे बेचकर अपना और अपना परिवार का पालन पोषण करते थे।

लेकिन चायनीज दीया बाजार मे आने से इनका धंधा चौपट हो गया हैं

और वो कुम्हार आज बेरोजगारी की कगार पर खड़ा हो गया है।

आधुनिकता में चीनी माल लोगों को ज्यादा भा रहा है

इलेक्ट्रॉनिक दीयो की बाजार मे चकाचौध से लोगो के दिलो से मिट्टी के दीयो से अहमियत को खत्म कर दिया है

वही महीनो से मेहनत कर मिट्टी के दीये बनाकर बेचने वाले कुम्हार ग्राहको के इन्तजार मे टकटकी लगाये बैठे हैं कि

कब उनका दीया बिके और वो अपना परिवार का दो वक्त की रोटी का इन्तेजाम कर सके।

आज भी घर के आँगन मे परापरागत चाक पर दीया का निर्माण हो रहा रहा है।

पुश्तैनी काम मे लगे रामेश्वर पंडित, युगल पंडित, एतवारी पंडित ने बताया कि

देश हित व जागरूकता के कारण

मिट्टी दीया का माँग बढ़ा है, पर पहले वाली स्थिति अब भी नहीं है।

दीपावली पर्व मे हमलोग लगभग दस हजार दीया बनाते हैं

अभी 80 से 100 रुपये सैकडा की दर से बेचा जाता है।



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