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मनरेगा ने देश को बड़े संकट से बचाया है

मनरेगा के बारे में वर्तमान प्रधानमंत्री और अभी देश के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी ने

कभी आलोचनासूचक बातें कही थी। आज भी सोशल मीडिया में मनरेगा के खिलाफ उनके

बयान का प्रसारण यदा कदा नजर आ जाता है। लेकिन कोरोना संकट काल में प्रवासी

मजदूरों के अचानक अपने गांव लौट आने के बाद मनरेगा बनाये जाने और उसके महत्व

को अब बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है

कि भारतीय अर्थव्यवस्था भीषण संकट में हैं और फिलहाल केंद्र सरकार के पास ऐसी कोई

योजना भी नहीं है जिससे गाड़ी पटरी पर लौटने की स्थिति बने। हमारे आपके जैसे शायद

केंद्र सरका भी कृषि उपज के बाजार में आने की प्रतीक्षा कर रही है। इतनी बात तो समझ

में आ रही है कि इस बार गांवों मे कृषि उपज अधिक होने की उम्मीद हरेक को है। लेकिन

इसके बीच गांव में खेती के अलावा भी मनरेगा की योजनाओं ने लोगों की जो मदद की है,

उसे समझने की जरूरत है। कोरोना महामारी के इस अंधेरे दौर में नौकरी एवं अर्थव्यवस्था

की बदहाली के बीच 5.6 करोड़ परिवारों को बीते तीन महीनों में काम मिला जिससे उन्हें

राहत मिली। उन्हें यह काम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना

(मनरेगा) के तहत प्राप्त हुआ जो सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने वाली शायद सबसे बड़ी

योजना है। इस कार्यक्रम ने लोगों को भले ही अकुशल काम दिए लेकिन उससे लोगों को

दिहाड़ी मजदूरी मिली जिससे वे अपने परिवारों का पेट भर सके। सवाल यह है कि रोजगार

सृजन के इस वृहद कार्यक्रम को किस तरह टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए

इस्तेमाल किया जा सकता है।

मनरेगा के जरिए ही लौटने वाले मजदूरों को सहारा

यह कार्यक्रम आज की तारीख में राहत मुहैया करा रहा है लेकिन भविष्य में यह किस तरह

से आजीविका को सुरक्षित रखने का आधार बन सकता है? हमारा ध्यान इसी बिंदु पर

रहने की जरूरत है। कोरोना संकट के समय लाखों लोगों के अपने गांव लौटने के बीच

अप्रैल से जून में इस योजना के तहत छह लाख से अधिक जलाशय एवं जल-भराव स्थलों

का निर्माण एवं मरम्मत की गई। इस तरह लोगों को अपने घरों के पास ही तालाब खोदने

या छोटे बांध बनाने या बदहाल पोखरों की मरम्मत का काम मिला। मॉनसून की बारिश ने

इन जल-भंडारण स्थलों को लबालब भरकर न केवल भूजल को रिचार्ज करने एवं बाढ़ को

रोकने में अहम भूमिका निभाई होगी बल्कि आने वाले सूखे दिनों के लिए पानी को भी

जमा रखने का काम किया होगा। इससे कृषि की भी हालत सुधरी। हमें याद रखना होगा

कि भारत के अधिकांश खेतों की सिंचाई नहरों से नहीं बल्कि भूजल से होती है। बारिश का

पानी इक_ा करने एवं उसके संरक्षण की हमारी हर कोशिश आर्थिक वृद्धि का रास्ता

तैयार करती है। मेरे सहकर्मियों ने पाया कि इस अवधि में कई पोखर-तालाब बनाए गए हैं।

इसका मतलब है कि जमीन पर काम हुआ है। अब सवाल इन जलाशयों के टिकाऊपन को

परखने का है। क्या ये टिकाऊ हैं? क्या इससे जल उपलब्धता में भी सुधार होगा? यह

मसला भी उतना ही अहम है लेकिन अभी तक थोड़े साक्ष्य ही हैं जो बताएं कि इन

जलाशयों के टिकाऊपन को भी परखा जा रहा है। मनरेगा संबंधी सरकारी आंकड़े बताते हैं

कि 2017 से लेकर 2018 के दौरान 13 लाख कार्य जल संरक्षण एवं भूजल रिचार्ज में किए

गए।

अभी भी इससे प्राकृतिक आधारभूत संरचना का विकास फायदेमंद

अगर आप खेतों में बनाए गए करीब 3.5 लाख छोटे तालाबों को भी जोड़ लें तो फिर हमें

देश में जल संरक्षण के लिए एक बड़ी क्षमता का निर्माण कर देना चाहिए था। इस मामले

को अब सरल अंकगणित से देखते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में

करीब 6.5 लाख गांव हैं और इनमें से हरेक गांव में हर साल जल-भंडारण के कम-से-कम

चार कार्य जरूर होने चाहिए। जलस्रोतों की संख्या में हर साल होने वाली वृद्धि को ध्यान में

रखें तो समय बीतने के साथ देश में किसी भी तरह का जल संकट नहीं होना चाहिए लेकिन

वास्त व में जल संकट की स्थिति है। हमारे गांवों में पानी की भारी कमी है और साफ

पेयजल की कमी का खमियाजा तो खराब सेहत के रूप में चुकाना पड़ता है। ऐसे में मनरेगा

के तहत निर्मित लाखों जल-भंडारण इकाइयों को नजदीकी आबादी से जोडऩे की जरूरत है

ताकि उनकी निगरानी के अलावा उन्हें चालू हालत में भी रखा जा सके। इस तरह ये

इकाइयां टिकाऊ परिसंपत्ति बन सकेंगी। इस मुद्दे पर झारखंड में भी पूर्व में तैयार की गयी

आधारभूत संरचना का नये सिरे से मूल्यांकन कर लिया जाना चाहिए। झारखंड में इसके

पहले तालाब और डोभा बने हैं, उनकी भी समीक्षा कर आवश्यकतानुसार इसी मनरेगा

योजना के तहत उनका सुधार कर हम बेहतर आधारभूत संरचना का निर्माण कर सकते

हैं। जो बाद में हमारे ही काम आने वाला है।


 

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