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मिथिलांचल में बाढ़ से सूख गये हजारों बेशकीमती पेड़

  • अनेक बेशकीमती लकड़ी के पेड़ सूख गये

  • फसल नुकसान का मुआवजा पर पेड़ पर नहीं

  • बाढ़ का स्थायी निदान चाहते हैं इलाके के लोग

दरभंगा: मिथिलांचल की राजधानी कहे जाने वाले दरभंगा जिले के हजारों एकड़ में करीब

दो माह से जमा बाढ़ के पानी से हजारों की संख्या में आम समेत अन्य फलदार एवं कीमतों

वृक्षों के सूख जाने से एक तरफ जहां किसानों की कमर टूट गई है वहीं पर्यावरण को भी

काफी नुकसान पहुंचा है। जिले में बाढ़ की परेशानियों से अभी किसान उबरे भी नहीं कि वे

फिर से अपनी तरह की नयी परेशानियों से घिर गये हैं। दरभंगा सदर अनुमंडल के हनुमान

नगर प्रखंड, बहादुरपुर प्रखंड, सिंहवाड़ा एवं हायाघाट प्रखंड के बड़ी संख्या में गांव में बाढ़

का पानी उतरने के बावजूद सैकड़ो एकड़ में लगे फलदार एवं अन्य वृक्षों के सूखने से

किसानों के समक्ष बड़ी आर्थिक समस्या खड़ी हो गयी है। बाढ़ से फसल तो पहले ही बर्बाद

हो चुकी है लेकिन अब हजारों की संख्या में वक्षों के सूख जाने से किसानों को दोहरी मार

पड़ी है। दरभंगा के हनुमाननगर प्रखंड में हालत बेहद खराब है। इलाके में 50 दिनों से

अधिक समय तक विनाशकारी बाढ़ के दौरान पानी जमे रहने के कारण पंचोभ गांव समेत

आस पास के कई गांवों के किसान पूरी तरह बर्बाद हो गये हैं। आठ से पंद्रह फुट तक पानी

जमा होने से आम समेत अन्य पेड़ का आधे से अधिक हिस्सा करीब दो माह तक डूबा रहा।

इलाके से पानी भले ही निकल गया हो लेकिन लंबे समय पानी में रहने के कारण पेड़ पूरी

तरह सूख गये हैं। हनुमाननगर प्रखंड के 14 पंचायत, बहादुरपुर और सिंहवाड़ा प्रखंड के

पांच-पांच पंचायत और हायाघाट के एक पंचायत के करीब 150 गांव में बाढ़ के जमे पानी

से सैकड़ों हेक्टेयर में लगे आम, कटहल, जामुन, सपाटू, बेर, नारियल समेत सागवान,

शीशम, और मोहगनी के पेड़ भी पूरी तरह सूखते जा रहे हैं।

मिथिलांचल के हजारों किसानों ने लगाये थे बेशकीमती पेड़

प्रभावित इलाकों के हजारों किसान अपनी आंखों के सामने वर्षों की मेहनत को बर्बाद होता

देखने को विवश हैं। किसानों को समझ नहीं आ रहा है कि कि इन पेड़ों को बचाये तो कैसे।

फलदार पेड़ सूखने से किसानो के लिए आमदनी का एक बड़ा जरिया अचानक खत्म हो

गया वहीं भविष्य की पूंजी के रूप में लगाए सागवान, महोगनी, शीशम कीमती पेड़ों के

सूखने से किसानों के समक्ष कई तरह की परेशानियां हो गई है। राज्य सरकार के पास

फसल क्षति के लिए तो मुआवजा देने का प्रावधान है लेकिन पेड़ों की क्षति का मुआवजा

देने का कोई प्रावधान नहीं होने से किसान अधिक परेशान हैं। किसानों को भले ही फसल

का मुआवजा मिल जाये लेकिन किसी भी परिस्थिति में सूखे पेड़ का मुआवजा नहीं

मिलेगा। किसान भी अब मुआवजा नहीं बल्कि अपने इलाके में बाढ़ का स्थाई निदान

चाहते हैं। हनुमान नगर प्रखंड के पंचोभ पंचायत के मुखिया सह प्रखंड मुखिया संघ के

अध्यक्ष राजीव चौधरी बताते हैं कि यह बाढ़ प्राकृतिक आपदा कम और सरकारी आपदा

ज्यादा है। पहले यहां के लोगो के लिए बाढ़ वरदान होता था लेकिन अब सरकार की गलत

नीतियों के कारण अभिशाप बन गया है। पूरे इलाके को बांध से बांधा जा चुका है, जिस

कारण यहां बाढ़ का पानी कई इलाके से यहां आता है लेकिन समुचित निकासी नहीं होने के

कारण पानी यहां जम जाता है। श्री चौधरी ने कहा कि मिथिलांचल में किसानों के लिए

आम का पेड़ आमदनी का बड़ा साधन माना जाता है और यही कारण है कि यहां किसान

अपने बच्चे की तरह आम के पेड़ों को पालते हैं। यहां बाढ़ के पानी से हजारो पेड़ सूख गए,

जिससे इलाके के किसानों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है।

इन पेड़ों के नुकसान पर सरकार कोई हर्जाना नहीं देगी

सरकार फसल क्षति में कुछ हर्जाना तो देती है लेकिन पेड़ का हर्जाना कभी नहीं मिला और

न ही इसे कोई देखने वाला है। अब किसानों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है।

सिंघवारा प्रखंड के तलवाड़ा गांव निवासी किसान विजय कुमार झा ने कहा कि करीब एक

हेक्टेयर में लगे कई फलदार वृक्ष बाढ़ के पानी के जमे रहने के कारण सूख गए हैं। इलाके

में बड़ी संख्या में पेड़ों के सूखने का सिलसिला अभी भी जारी है। लेकिन, सरकार के स्तर

पर अब तक इसे देखने के लिए कोई भी अधिकारी या कर्मी नहीं आए हैं, जिससे लोगों में

निराशा है। बिहार सरकार ने राज्य में हरित आवरण क्षेत्र को बढ़ाने के लिए 24 करोड़ पौधे

लगाने का लक्ष्य रखा है। इन 24 करोड़ पौधे में 19 करोड़ पौधे लगाये गये हैं। एक अनुमान

के मुताबिक, इस समय राज्य का हरित आवरण क्षेत्र 9.7 प्रतिशत है। कृषि विज्ञान केंद्र,

जाले के प्रभारी कृषि वैज्ञानिक दिव्यांशु शेखर ने बताया कि जिले में इस वर्ष आई बाढ़ का

पानी दो महीने से भी ज्यादा अवधि तक जल जमाव का कारण बना। इस वजह से नवजात

पौधे, खासकर पांच से सात साल तक पुराने वृक्ष जल की अधिकता के कारण सूख गए हैं।

अधिक पानी भी ऐसे पेड़ों के लिए जानलेवा साबित

उन्होंने बताया कि बाढ़ के पूर्व बरसात के कारण भी पानी पहले से जमा था और लगभग

दो महीने से अधिक तक बाढ़ का पानी रहने के कारण जड़ों की नमी समाप्त नहीं हो पाई।

नवजात पौधों की जड़ का विकास समुचित ढ़ंग से नहीं होने के कारण बाढ़ का असर इन

पौधों पर ज्यादा पड़ा है। सात वर्ष से अधिक आयु वाले पौधों के सूखने के संदर्भ में उन्होंने

बताया कि जलजमाव ही इसका मुख्य कारण है। वहीं, दरभंगा के सहायक निदेशक

(उद्यान) आभा कुमारी ने बताया कि जिले में बाढ़ के कारण बड़ी मात्रा में साग- सब्जी,

मखाना, पान एवं वृक्षों को नुकसान पहुंचने की सूचना मिली है। राज्य उद्यान निदेशालय

के निर्देश पर बाढ़ से हुए नुकसान का सर्वे किया जा रहा है। इसके तहत आच्छादित रकबा

एवं प्रभावित रकबा का अलग-अलग विवरण तैयार किया जा रहा है। बाढ़ से हुए नुकसान

का आकलन कर मिथिलांचल के इस इलाके का प्रतिवेदन एक सप्ताह के अंदर ऊपर तक

भेज दिया जाएगा।


 

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