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एमआइटी के वैज्ञानिकों ने जारी कर दी अपनी नई रिपोर्ट

  • सोशल डिस्टेंसिंग में सिर्फ छह फीट की दूरी पर्याप्त नहीं
  • अत्याधुनिक उपकरणों से नापा सुक्ष्म कणों की दूरी
  • एक मीटर का पैमाना वर्ष 1930 का सर्वेक्षण है
  • चीन के अस्पताल के कमरों का भी किया अध्ययन

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः एमआइटी के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के बारे में अपनी नई शोध की

रिपोर्ट जारी कर दी है। इस शोध का निष्कर्ष है कि कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के

लिए एक दूसरे से सिर्फ छह फीट की दूरी पर्याप्त नहीं है। उनकी सोच है कि छींक अथवा

खांसी के निकलने वाले अति सुक्ष्म कणों का सारा हिस्सा तुरंत ही जमीन पर नहीं गिरता

बल्कि यह हवा में काफी दूर तक तैरता रहता है। उनका निष्कर्ष है कि इन संक्रमण वायरस

को दूसरों तक पहुंचने से रोकने के लिए 27 फीट तक की दूरी ही सुरक्षित है। इससे कम की

दूरी से संक्रमण का असर दूसरे तक हो सकता है। इस संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने

कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए एक दूसरे से कमसे कम एक मीटर की दूरी हमेशा

बनाये रखने की हिदायत दी थी। वैसे एमआइटी के वैज्ञानिकों का अति सुक्ष्म गतिविधियों

को रिकार्ड करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल कर अपनी निष्कर्ष निकाला है। जिसमें यह

देखा गया है कि किसी की छींक अथवा खांसी से हवा में जो सुक्ष्म कण (ड्रापलेट) निकलते

हैं उनका अधिकांश हिस्सा एक मीटर के पहले ही जमीन पर अथवा वहां मौजूद किसी भी

सतह पर गिर जाता है। लेकिन इसी शोध का नतीजा है कि जो कण हवा में तैरते रह जाते

हैं वे 23 से 27 फीट तक की दूरी भी तय कर सकते हैं।

एमआइटी के वैज्ञानिकों ने इन सुक्ष्म कणों की गणना की है

इस दूरी को तय करने के बीच ही यह सारे कण नीचे आ जाते हैं। अब पूरी दुनिया में

कोरोना से प्रसार का बढ़ते जाने की वजह से लोगों को एक दूसरे से दूरी बनाये रखने के

लिए बार बार सख्त हिदायत दी जा रही है। कोरोना से बचाव के लिए दुनिया भर में शोध

का विज्ञान सम्मत नतीजा जब तक नहीं आ जाता तब तक संक्रमण को दूसरों तक

पहुंचाने का एकमात्र तरीका ही सोशल डिस्टेंसिंग हैं। एमआइटी मैसेच्युट्स के शोधकर्ता

दल के नेता प्रोफसर लिडिया बोउरुबिया  ने कहा कि जो नतीजे निकले हैं, उसके मुताबिक

एक दूसरे से दूरी बनाने की न्यूनतम सीमा अब बीस फीट तक कर दिया जाना चाहिए।

लेकिन कई देशों ने इस शोध निष्कर्ष की सिफारिशों को मानने से इंकार कर दिया है।

लेकिन यह शोध निष्कर्ष जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसियेशन में प्रकाशित भी

किया गया है। इससे पहले ही यह पाया जा सकता है कि कोरोना के विषाणु हवा अथवा

किसी अन्य सतह पर भी रहने के बाद समय के साथ साथ अपनी मारक क्षमता खोते चले

जाते हैं। लेकिन हवा में तैरने वाले विषाणुओँ को यदि हवा का रुख हासिल हो तो वे अधिक

दूरी तक फैलते चले जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टीवी संक्रमण को पैमाना माना है

इस क्रम में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जिस दूरी को सोशल डिस्टेंसिंग का पैमाना माना

गया है, वह वर्ष 1930 के एक शोध का परिणाम है। यह सर्वेक्षण में टीवी के विषाणु के

इतनी दूरी तक जाने का परीक्षण निष्कर्ष निकाला गया था। एमआइटी का शोध दल यह

मानता है कि नये किस्म के इस विषाणु की क्षमता को आंकते हुए एक दूसरे से दूरी के 

मापदंड को संशोधित किया जाना चाहिए। शोध दल यह मानता है कि यह पैथोजन नये

किस्म की दूरी तय करने का नतीजा दे रहा है। वर्जिनिया टेक के वैज्ञानिक लिनसे मार ने

कहा कि अब तक जो कुछ नतीजे सामने आया है उसके मुताबिक कोरोना वायरस के प्रसार

को किसी गैस अथवा सिगरेट के धुएं के जैसा समझा जाना चाहिए। यह नतीजा चीन में

बीमारों का ईलाज करने वाले अस्पतालों की स्थिति का अध्ययन करने के बाद ही निकाला

गया है। शोध दल ने अस्पताल के कमरों में ईलाजरत कोरोना वायरस के प्रभाव को इन

कमरों के हवा निकासी के आधार पर निकाला गया है। वैज्ञानिक यह मानते हैं कि किसी

कोरोना पीड़ित मरीज की छींक अथवा खांसी का सर्वाधिक संक्रमण एक मीटर की दूरी तक

ही जाता है। इसलिए वर्तमान में कोरोना के संक्रमण को और अधिक फैलने से रोकने के

लिए एक दूसरे से दूरी बनाये रखना ही फिलहाल बचाव का सबसे आसान और कारगर

तरीका है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने इस काम में जुटे स्वास्थ्यकर्मियों को बचाव के

लिए पर्याप्त पोशाक और मास्क पहनने के प्रावधान का सख्ती से पालन करने अनुरोध

किया है। इस सुरक्षा नियम का पालन करने से कमसे कम वे खुद को तथा अपने आस

पास के लोगों को कोरोना से बचाने में कारगर भूमिका अदा करेंगे।


 

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