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मिडिल क्लास को भी भूख लगती है जनाब

मिडिल क्लास अपनी राजनीतिक मुर्खता की वजह से फिर से ठगा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र

मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिनलोगों को मुफ्त में राशन देने का एलान किया

है, उसमें यह मिडिल क्लास का नाम नहीं आया। देश का यह मध्यमवर्ग अपनी कमाई से

आयकर भी भरता है। विभिन्न सामानों की खरीद में अन्य कर के साथ साथ जीएसटी के

भुगतान में बड़ी भूमिका अदा करता है। फिर राजनीतिक दल इस आय वर्ग की उपेक्षा क्यों

करते हैं, यह एक कम चर्चित सवाल है। घटनाक्रम यही दर्शाते हैं कि खुद को वोट बैंक के

तौर पर बनाये रखने अथवा लीक से नहीं हटने की आदतों की वजह से यह मिडिल क्लास

अपनी राजनीतिक ताकत को स्थापित ही नहीं कर पाया है। जिस तरीके से अन्य वर्गों से

खुद को वोट की ताकत के तौर पर स्थापित कर लिया है, वैसी स्थिति इस मिडिल क्लास

की कभी नहीं बनी है। आजादी की लड़ाई के दौरान भले ही यह वर्ग आगे बढ़कर अपनी

जिम्मेदारी निभा रहा था लेकिन समय बदलने के साथ साथ खुद ही मोह में फंसकर इस

आय वर्ग ने अपनी मोल भाव की ताकत ही समाप्त कर ली है। नतीजा है कि राजनीतिक

दल और सरकार उसे दो कौड़ी का समझकर उसके लिए विशेष योजनाओं की घोषणा भी

नहीं करते। कोरोना का संकट प्रारंभ होने के बाद से लॉक डाउन में मुफ्त भोजन बांटने का

बेहतर काम तो हुआ है।

मिडिल क्लास लोगों को राशन भी बांटे गये हैं

लेकिन इस मध्यमवर्ग का क्या,जिसके पास अपनी आमदनी की वजह से अब राशन कार्ड

भी नहीं बचे हैं। प्रधानमंत्री ने अपने करीब 17 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री गरीब

कल्याण अन्न योजना का नवंबर तक अवधि विस्तार, गरीबों एवं श्रमिकों को और पांच

महीनों तक फ्री अनाज, फिर बिहार का सबसे पावन पर्व छठ का जिक्र भी किया। इस

लिहाज से माना जा रहा है कोरोना संकट में अपने को चुनावी बढ़त दिलाने की सोच

प्रधानमंत्री के भाषण में रही थी। इससे पहले ही भाजपा यह साफ कर चुकी है कि बिहार में

मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे। यहां तक कि खुद उप मुख्यमंत्री और वरिष्ठ

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी भी इसे साफ कर चुके हैं। लेकिन बाढ़ का प्रकोप अभी

आना बाकी है। पूरे देश की तरह बिहार का भी मध्यमवर्ग इस आर्थिक संकट से जूझ रहा

है। गरीबों के लिए भी स्थिति अच्छी नहीं है क्योंकि भागलपुर विधायक अजीत शर्मा ने

एक नहीं कई बार यह कहा है कि सिर्फ घोषणा से लोगों के पेट में अन्न का दाना नहीं

पहुंचेगा। इनलोगों को त्वरित कार्रवाई के तहत राशन कार्ड पहले दिया जाना चाहिए।

जिनके पास राशन कार्ड ही नहीं उनका कार्ड तो बने

उनके भाषण का सार यही है कि अब भी मुफ्त भोजन की सोच में देश का गरीब ही

प्राथमिकता सूची में है। प्रधानमंत्री ने इन योजनाओं पर होने वाले खर्च का उल्लेख भी

किया है। लेकिन पूरे भाषण में मिडिल क्लास को राहत देने का कोई उल्लेख तक नहीं है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पीएम मोदी के गरीब कल्याण अन्न योजना के विस्तार

का एलान बिहार में साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव का समीकरण साधने

में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे कहीं न कहीं नीतीश कुमार के नेतृत्व में

एनडीए को फायदा मिलेगा। लेकिन इससे अलग हटकर अगर सोचे और यह मिडिल

क्लास अपनी सोच को बदलने की तैयारी कर ले तो सारे समीकरण रातों रात बदल भी

सकते हैं। जिन्हें मुफ्त में भोजन दिया जा रहा है, उन्हें भोजन दिया जाना चाहिए लेकिन

जो आयकर और अन्य करों के जरिए सरकार का पेट पाल रहे हैं, उनके हाथ में झूनझूना

थमाने की इस सोच को कहीं न कहीं तो अब रोकना पड़ेगा। मध्यम वर्ग के लोग अपने

परिवार के जीवन यापन के लिए जिस जद्दोजहद से गुजर रहे हैं, उसे सरकारें तब तक नहीं

समझेंगी जबतक कि यह वर्ग जाति और अन्य किस्म के समीकरणों को तोड़कर वोट की

मोर्चाबंदी नहीं कर लेता।

मध्यमवर्ग में ऐसी मोर्चाबंदी की सख्त जरूरत

एक बार ऐसी मोर्चाबंदी हुई तो आने वाले दिनों के हर चुनाव में हर दल को मध्यम वर्ग के

हित में फैसला लेने की मजबूरी होगी। दरअसल इस बात को भी समझना होगा कि पुरानी

कहावत यहां भी सच साबित हो रही है कि जो बच्चा नहीं रोता, मां उसे दूध नहीं देती। अब

मिडिल क्लास को दहाड़ मारकर रोने की नौबत है। अपने जीवन के दैनंदिन संघर्ष से

अलग हटकर अगर वह खुद को राजनीतिक ताकत के तौर पर स्थापित करना चाहता है तो

उसे सबसे पहले अपनी सोच बदलनी बड़ेगी। जहां इस आय वर्ग की अपनी सोच बदली तो

आने वाले दिनों में हर राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में भी मिडिल क्लास का कल्याण

अपने आप ही शामिल होता चला जाएगा।


 

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