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नून-रोटी के भरोसे चल रहा मिड डे मील




अभिजीत राय

मिजार्पुर: नून-रोटी के भरोसे चल रहा मिड डे मील,कुछ दिनों पहले

उत्तर प्रदेश के मिजार्पुर जिले के एक प्राइमरी स्कूल का वीडियो सोशल मीडिया में बहुत वायरल हुआ था।

वीडियो में छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल के गलियारे में फर्श पर बैठकर

नमक के साथ रोटियां खाते देखे गये थे।

सोशल मीडिया में इस वीडियो के बारे में कहा गया कि ये मिड-डे मील में

होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर करता है।

वीडियो के बाद प्रशासनिक स्तर पर जो कार्रवाई की गई, वह चैंकाने वाली है।

दरअसल उस वीडियो को देश के सामने लाने वाले पत्रकार पर उत्तर प्रदेश सरकार ने केस दर्ज किया है।

मिजार्पुर के स्थानीय पत्रकार पवन जायसवाल पर राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए

साजिश रचने का आरोप लगाया गया है।

आरोप है कि पत्रकार ने फर्जी तरीके और गलत मंशा से ये वीडियो बनाया।

जो बोले, डंडा झेलेह्ण की तर्ज पर उस ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि को भी गिरफ्तार कर लिया गया है,

जिसने जमालपुर विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय सिऊर में मिड डे मील में धांधली की सूचना पत्रकार को दी थी।

पहले तो स्थानीय प्रशासन मामले को सामान्य घटना की तरह ले रहा था

मगर जब सोशल मीडिया में बच्चों द्वारा नमक से रोटी खाये जाने का

वीडियो वायरल हुआ तो शासन-प्रशासन के कान खड़े हुए।

आनन -फानन में प्रधानाध्यापिका के निलंबन, शिक्षा मित्र का मानदेय रोकने,

खंड शिक्षा अधिकारी के निलंबन, बेसिक शिक्षा अधिकारी के तबादले के बाद

नून-रोटी के वीडियो बनाने वाले पत्रकार के खिलाफ

आपराधिक साजिश रचने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई।

गाहे-बगाहे विवादों में रहने वाली मिड डे मील योजना को लेकर शासन-प्रशासन की

छवि खराब करने का आरोप पत्रकार पर मढ़ा गया है।

जबकि पत्रकार की दलील है कि वह क्षेत्र के शिक्षा अधिकारी को सूचित करके सिऊर स्कूल गये थे।

अभिभावकों द्वारा आये दिन चावल-नमक, रोटी-नमक और अन्य अनियमितताओं की

शिकायत मिलने पर उन्होंने वीडियो बनाया।

खबर करना उनका दायित्व है, उसकी मंशा पर सवाल उठाना अनुचित है।

दरअसल, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के ट्वीट के बाद राज्य सरकार हरकत में आई और फिर आनन-फानन में कार्रवाई होने लगी।

विगत में भी मीडियाकर्मियों के खिलाफ आक्रामक रवैया दिखाने वाली

सरकार को आखिर यह अधिकार किसने दिया कि सच सामने लाने

वाले पत्रकार को प्रताड़ित करने के प्रयास हों।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार को इस बाबत नोटिस दिया है।

इस मामले को उजागर करने वाले स्थानीय पत्रकार पर शिकंजा कसे जाने के

खिलाफ मीडिया जगत में देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई है।

एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया ने उत्तरप्रदेश सरकार के इस कदम की आलोचना की है

और सरकार से मांग की है कि पत्रकार पर से सारे मामले वापस लिए जाएं।

गिल्ड ने बयान जारी करते हुए कहा कि इस प्रकार की घटना निंदनीय है और सरकार का ये कदम चैंकाने वाला है।

गिल्ड ने ये भी कहा, ह्यसरकार को यह जांच करनी चाहिए कि

मिड डे मिल में इस तरह की बात कहां सामने आ रही है।

कहा जा रहा है कि अधिकारी अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिये पत्रकार को मोहरा बना रहे हैं।

लोकतंत्र में मीडिया के प्रति ऐसी असहिष्णुता निश्चय ही हमारी चिंता का विषय होना चाहिए।

जो राज्य की योगी सरकार पर भी सवाल उठाता है, जिसके शासनकाल में पहले भी कुछ

पत्रकारों को पुलिस की मनमानी कार्रवाई का शिकार होना पड़ा था।

वहीं दूसरी ओर प्रशासन द्वारा दर्ज प्राथमिकी में कहा गया है कि मिड डे मील की

व्यवस्था करना ग्राम प्रधान का दायित्व है।

जब उनके प्रतिनिधि को सब्जी न होने की जानकारी मिली थी तो उन्हें पत्रकार को

बुलाने के बजाय प्रधान को जानकारी देनी थी और रसोइये को सब्जी उपलब्ध करानी चाहिए थी।

निस्संदेह महत्वाकांक्षी मध्याह्न भोजन योजना अपनी उपलब्धियों से कम

बल्कि विसंगतियों व भ्रष्टाचार की वजह से ज्यादा चर्चित रही है।

कभी खाने की गुणवत्ता, कभी खाना बनाने में लापरवाही तथा कभी मिड डे मील के धन की बंदरबांट को लेकर।

कभी खाना बनाने वाले तथा कभी छात्रों के साथ सामाजिक भेदभाव की खबरें भी

हमारे समाज के काले सच को बयां करती रही हैं।

दरअसल, मिड डे मील योजना केंद्र व राज्य सरकारों के सहयोग से 15 अगस्त, 1995 को लागू की गई।

पहले इस योजना के अंतर्गत अभिभावकों को अनाज उपलब्ध कराया जाता था

मगर फिर सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर वर्ष 2004 से विद्यालयों में तैयार खाना उपलब्ध कराना शुरू किया गया।

उ.प्र. में 1,68,786 विद्यालयों में मिड डे मील देने की व्यवस्था है,

जिसके अंतर्गत राज्य के एक करोड़ अस्सी लाख बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है।

मगर, ग्राम प्रधान, प्रधानाध्यापक व रसोइए की तिकड़ी इसके क्रियान्वयन में चूकती नजर आती है।

शहरों में निगरानी तंत्र की सक्रियता से स्थिति ठीक है, मगर ग्रामीण इलाकों में व्यवस्था भगवान भरोसे ही है।

निर्धारित मेन्यू के लिये पर्याप्त धन उपलब्ध न होने की भी अक्सर शिकायत की जाती है।

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