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पेड़ पौधों को अदृश्य जीवाणुओं से भी मिलता है संरक्षण







  • संक्रमण रोकने में वनस्पति बैक्टेरिया निभाते हैं भूमिका
  • फंगस का हमले में जबावी हमला करता है जीवाणु
  • जड़ों में हमला होने के पहले दूसरा काम करता है
  • फसल उत्पादन में काफी मदद मिलने की उम्मीद
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पेड़ पौधों को अपने अदृश्य साथियों का भी पूरा सहयोग प्राप्त

होता है। इस क्रम में नई शोध से उन बैक्टेरिया समूहों की पहचान की जा

रही है जो वनस्पतियों पर होने वाले संक्रमण के हमलों को रोक देते हैं।

नेदरलैंड के इंस्टिट्यूट ऑफ इकोलॉजी (एऩआइओओ-केएमएडब्ल्यू)

और वेजिनजेन इंटरनेशनल रिसर्च टीम ने इसे खोज निकाला है। इसके

बारे में वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिक जर्नल में जानकारी प्रकाशित की गयी है।


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शोध के क्रम में कुछ वैसी किस्म की बैक्टेरिया प्रजातियों की पहचान की

गयी है जो किसी भी पेड़ पौधे के जड़ पर होने वाले हमलों को रोक देते हैं।

दरअसल वनस्पति के जड़ों पर फंगस संक्रमण की वजह से ही वे मरने

लगते हैं। लेकिन इस किस्म के बैक्टेरिया ऐसे फंगस को अपना असर

फैलाने से रोक देते हैं। इस शोध की विशेषता यह है कि इसके परीक्षण

सिर्फ नेदरलैंड नहीं बल्कि ब्राजिल, कोलंबिया और अमेरिका में भी

किये गये हैं। इन तमाम परीक्षणों का एक ही नतीजा निकला है।

माइक्रोवियल यानी अत्यंत सुक्ष्म स्तर पर होने वाली इन गतिविधियों

पर पहले नजर नहीं जा पायी थी। बैक्टेरिया के सक्रिय होने का पता

होने के बाद भी वैज्ञानिक इस गुण को नहीं खोज पाये थे। इसका पता

पेड़ों की डीएनए श्रृंखला के गहन विश्लेषण की वजह से ही हो पाया है।

पेड़ पौधों पर पहली बार इस किस्म की सूचना सामने आयी

इस खास विशेषता को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने क्रमवार तरीके से

बैक्टेरिया के गुण दोष का अध्ययन किया। एक एक कर इनकी विशेषताओं

और कार्यों का जब विश्लेषण किया गया तो यह निष्कर्ष निकला है पेड़ के

जड़ों पर होने वाले फंगस आक्रमण को वे ही रोक देते हैं।


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अब इस विधि के विकसित होने के बाद ऐसी उम्मीद की जा रही है कि

दुनिया में फसल उत्पादन को नष्ट होने से बचाने में यह विधि

भविष्य में कारगर सिद्ध होने जा रही है।

इस विधि में खास बात यह है कि इसके सफल होने पर खेतों में

कीटनाशकों का प्रयोग भी कम हो जाएगा।


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यह बैक्टेरिया कैसे काम करते हैं, उस पर जब शोध किया गया तो यह

पता चला कि जब फंगस का हमला होता है तो यह बैक्टेरिया एक

प्रतिरोधक बनकर हमलावर फंगस की कोशिकाओं पर जवाबी हमला

करते हैं। इस हमले से फंगस की कोशिकाएं टूट जाती हैं। फंगस की

संरचना टूट जाने के बाद वह पेड़ पौधों को वह नुकसान नहीं पहुंचा पाता,

जिससे वनस्पति जीवन को खतरा हो सकता है। पेड़ पौधों की जड़ों में

रहने वाले इन जीवाणुओं की सक्रियता निरंतर बनी रहती है, इसके

बारे में पहले से ही जानकारी दी। लेकिन फंगस के हमले के दौरान

इनकी अलग भूमिका के बारे में पहली बार जानकारी मिल पायी है।

इस बारे में पहली बार जानकारी मिलने के बाद वैज्ञानिकों ने इस शोध

को और आगे बढ़ाते हुए सात सौ से अधिक वैसे जीवाणुओं का पता लगाया

है जो अपने आप में कारगर भूमिका निभाते रहते हैं।

पहले इस किस्म की भूमिका निभाने वाले सिर्फ 12 ऐसी प्रजातियों को

वैज्ञानिक सूची में दर्ज किया गया था। लेकिन शोध से जुड़े विज्ञानी यह

मान रहे हैं कि यह जानकारी सिर्फ किसी विशाल बर्फखंड के ऊपरी

हिस्से का पता चलने जैसा है।

वैज्ञानिक मानते हैं अभी बहुत कुछ और जानना शेष है

अभी इस बारे में बहुत कुछ नई जानकारी आना शेष है। उनका मानना

है कि जैसे जैसे इस विज्ञान में प्रगति होगी, नई नई जानकारी इसमें

जुड़ती चली जाएगी। इससे वनस्पति विज्ञान और फसल उत्पादन के

क्षेत्र में बहुत कुछ बदलाव भी नजर आने वाला है। इसी शोध के तहत

ऐसा पाया गया है कि अति प्राचीन प्रजाति और उसी वनस्पति की वर्तमान

प्रजाति में ही सुक्ष्म स्तर पर कुछ समानताएं हैं। इन समानताओं के बीच

वे कौन से गुण है जो उन्हें संक्रमण अथवा बाहरी हमलों से बचाते रहते हैं,

इसकी भी जांच अब की जा रही है। जांच का असली लक्ष्य इस विधि को

पूर्ण रुप से विकसित कर कीटनाशकों पर किसानों की निर्भरता को कम

करना है। ताकि कीटनाशकों की वजह से पर्यावरण को जो नुकसान हो

रहा है, उसे स्थायी तौर पर रोका जा सके।


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