fbpx Press "Enter" to skip to content

उल्कापिंडों को खाने वाले सुक्ष्म जीवन का भी पता चला

  • अंतरिक्ष में मौजूद है इस किस्म का अजीब जीवन
  • वैज्ञानिक तत्वों का भोजन कर बनाते हैं दूसरे यौगिक
  • माइक्रोस्कोप से देखा गया तो अंदर का हाल पता चला
  • अंतरिक्ष में जीवन के होने के जानकारी देना यह प्रयोग
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः उल्कापिंडों को खाने वाले सुक्ष्म जीवन का पहली बार पता
चल  पाया है। यह ऐसे सुक्ष्म जीव है तो इन पत्थरों पर मौजूद खनिजों
का भोजन  कर अपना जीवन बसर कर रहे हैं।

पृथ्वी के बाहर जीवन की संभावनाओं को तलाशने में जुटे वैज्ञानिकों ने
इसका  पता लगाया है। इसके आधार पर वैज्ञानिक यह मानते हैं कि
शायद पृथ्वी पर  भी जीवन की नींव इन्हीं सुक्ष्म जीवों से पड़ी होगी।

इन अजीब सुक्ष्म जीवों को कई तत्वों के जीवन का आधार भी माना
गया था। यह समझा जाता है कि पृथ्वी पर फॉस्फोरस के पैदा होने में
भी उनकी भूमिका है। लेकिन इनकी संरचना वर्तमान विज्ञान के
लिहाज से अत्यंत जटिल है।

इस किस्म की भोजन पद्धति पर आधारित जिन सुक्ष्म जीवनों के बारे
में पता चला है उनमें से कई की उत्पत्ति भी शायद कई खनिजों के
मिश्रण की रासायनिक प्रक्रिया से हुई होगी, ऐसा माना जाता है।

इनमें से तीन ऐसे हैं, जो उल्कापिंडों पर मौजूद लौह तत्व को बदलने
की क्षमता रखते हैं। इनमें से तीन के बारे में वैज्ञानिकों ने उल्लेख भी
किया है।

यह बैक्टेरिया है लैप्टोस्पाइरिलियम, फेरोऑक्सीडान और एसिडिथियो वैसिलस फेरोऑक्सीडान।

इस खोज की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने
थर्मोएसिडोफाइल नामक सुक्ष्म जीव का अध्ययन भी किया है। यह
सुक्ष्म जीवन कम पीएच और अधिक ताप में भी जिंदा रह सकता है।

एम सेडूला नामक सुक्ष्म जीवन कोयले से ऑयरन सल्फाइड अलग
कर लेता है। परीक्षण को वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित करने के लिए
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में अनुसंधान भी किये हैं।

उल्कापिंडों को खाने का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ

इसके तहत नार्थवैसेट अफ्रीका 1172 के खंडों को प्रयोगशाला में इन
सुक्ष्म जीवों के बीच रखा गया था। उल्कापिंड का यह टुकड़ा वर्ष 2000
में खोजा गया था। 120 किलोग्राम वजन वाले इस उल्कापिंड में कई
किस्म के तत्वों का समावेश होने की पुष्टि उसकी जांच से पहले ही हो
चुकी थी।

वियेना विश्वविद्यालय की शोधकर्ता टेटयाना मिलोजेविक ने इस बारे
में कहा कि इस एक परीक्षण से यह पता चल पाया कि सुक्ष्म जीवन का
ऐसे उल्कापिंडों पर क्या कुछ प्रभाव पड़ सकता है।

माइक्रोस्कोप से इस गतिविधि पर नजर रखी गयी थी। जिसमें पाया
गया कि उल्कापिंड के टुकड़ों से अपना भोजन हासिल कर यह सुक्ष्म
जीवन खुद को बढ़ाते चले गये।

शोधकर्ताओं ने इसके लिए सुक्ष्म जीवन को अलग अलग
परिस्थितियों में रखकर भी उनकी जांच की। यह पाया गया कि अलग
अलग भोजन के क्रम में उनका विकास भी अलग अलग हुआ।

माइक्रोस्कोप से नजर रखने की वजह से वैज्ञानिकों ने यह देखा कि इस
किस्म का भोजन ग्रहण करने के बाद इनके शरीर पर छोटे छोटे
बुलबुले बन आये थे।

इन बुलबुलों की वजह से उनके शरीर के अंदर उत्प्रेरक की प्रतिक्रिया
नहीं हुई। यह सारा काम काम शरीर के बाहर ही हुआ। इसके बाद
भोजन को पचा लिया गया।

इस प्रक्रिया को देखकर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि विषैली
तमाम प्रतिक्रियाओं को शरीर के बाहर अंजाम देने के बाद ही सुक्ष्म
जीवों ने अपने काम की चीज खा ली।

उनके भोजन के बाद जो कुछ बचा है, उसका नये सिरे से वैज्ञानिक
विश्लेषण किया जा रहा है।

प्रारंभिक विश्लेषण से पता चला कि उल्कापिंडों के संरचना का

इससे यह पता चला पायेगा कि भविष्य में किसी उल्कापिंड के
अध्ययन से यह बात समझ में आ जाएगी कि उनपर कोई सुक्ष्म
जीवन था अथवा नहीं। अगर सुक्ष्म जीवन उसमे मौजूद था तो उसके
भोजन के अवशेष के चिह्न वहां अवश्य मिलेंगे।

इस खोज से यह भी माना जा रहा है कि अगर उल्कापिंडों पर मौजूद
सुक्ष्म जीव अपने जीवन बसर कर सकते हैं तो वे निश्चित तौर पर
शून्य में भी जीवित रहते हैं।

इससे अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं की तलाश में नई कड़ी जुड़
जाएगी। इन उल्कापिंडों पर जीवन की मौजूदगी का पता चलने के बाद
यह जानना और भी रोचक होगी कि यह जीवन कैसे खुद के वंशवृद्धि
को अंतरिक्ष में अंजाम दिया करता है।

साथ ही वैज्ञानिक यह भी समझ पायेंगे कि किन परिस्थितियों में यह
सुक्ष्म जीव सिर्फ जीवित रहते हैं और किन परिस्थितियों के अनुकुल
होने पर वे अपनी तादात और शक्ति बढ़ा सकते हैं।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

2 Comments

Leave a Reply

Open chat
Powered by