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बुध ग्रह पर सूर्य की भीषण गर्मी ही बर्फ बनने में सहायक

  • सबसे अधिक ताप झेलता है यही ग्रह

  • गर्मी की वजह से ही पैदा होता है पानी

  • कुछ इलाके अत्यधिक ठंडे हैं जहां बर्फ है

  • सूरज के ताप से आवेशित होते हैं ग्रह के कण

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बुध ग्रह के बारे में यह जानकार वैज्ञानिक हैरान हो गये हैं कि वहां भीषण गर्मी

की वजह से ही बर्फ एकत्रित होता है। आम तौर पर पृथ्वी की वैज्ञानिक धारणा है कि

अत्यधिक ठंड की वजह से वायुकण अथवा जल कण जमने लगते हैं। तब जाकर बर्फ

बनता है। आम तौर पर चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों पर मौजूद बर्फ के भंडार की कमोबेशी यही

स्थिति है। पहली बार यह पता चला है कि सूर्य की भीषण गर्मी का ताप भी कहीं बर्फ बनने

में मददगार हो सकता है।

यूं तो वर्ष 2012 में ही वैज्ञानिकों को यह पता चल गया था कि सूर्य के सबसे करीब रहने

वाले इस बुध ग्रह पर बर्फ है। अंतरिक्ष में भेजे गये मैसेंजर मिशन के तहत मिले आंकड़ों से

यह निष्कर्ष निकाला गया था। लेकिन इस बर्फ के बनने के बारे में यह नई जानकारी

वैज्ञानिकों को हैरान करने वाली साबित हुई है।

बुध ग्रह की संरचना भी अन्य ग्रहों जैसी ही है। इसमें भी कई गहरे गड्डे हैं, जहां बर्फ जमा

हुआ है। लेकिन सूर्य के इतना करीब होने के बाद भी इसमें बर्फ क्यों है, इसे समझने के

लिए लगातार अनुसंधान चल रहा था। अब जाकर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि

दरअसल सूर्य की भीषण गर्मी ही वहां बर्फ बनने में मददगार है।

बुध ग्रह पर बर्फ होने की पुष्टि पहले ही हो गयी थी

जॉर्जिया टेक्निकल स्कूल ऑफ केमिस्ट्री एंड बॉयोकेमिस्ट्री के शोधकर्ता ब्रांट जोंस कहते

हैं कि सुनने में यह बड़ा अजीब अवश्य लगता है। लेकिन तमाम आंकड़ों के विश्लेषण का

असली नतीजा यही है। उनके मुताबिक आम वैज्ञानिक परिभाषा के तहत यह पेचिदा है

लेकिन इसके भी मूल में केमिस्ट्री यानी रसायनशास्त्र ही है। दरअसल इस बुध ग्रह का

सर्वाधित गर्म इलाका और अत्यधिक ठंडे क्षेत्र की वजह से बर्फ बनने की प्रक्रिया होती है।

इस ग्रह पर अंधेरे इलाकों का तापमान सूर्य के इतना करीब होने के बाद भी करीब शून्य से

दो सौ डिग्री नीचे हैं। इसी वजह से वहां बर्फ बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। जोंस

के मुताबिक बुध ग्रह पर चांद से अधिक बर्फ मौजूद है।

यहां बर्फ कैसे बनता है, इस बारे में शोधकर्ताओं ने पाया है कि दरअसल वहां के वातावरण

में मौजूद ऑक्सीजन और कुछ धूल कण अत्यधिक गर्मी और सूरज की गर्मी से उत्पन्न

वेग की वजह से आवेशित हो जाते हैं। इस कणों के चार्ज होने की वजह से वहां रासायनिक

प्रतिक्रिया होने लगती है। इस पूरी प्रक्रिया से जैसे चांद पर हाइड्रोक्सील बनता है, वैसा ही

कुछ यहां भी होता है। दरअसल इस हाइड्रोक्सील में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के एक एक

अणु होते हैं। आम पानी में ऑक्सीजन का एक और हाईड्रोजन का दो अणु होता है। खगोल

वैज्ञानिकों ने पहले भी इस रासायनिक सिद्धांत पर काम किया था लेकिन तब इसके

पर्याप्त विज्ञान सम्मत प्रमाण नहीं मिले थे।

पहले से मिले आंकड़ों का दोबारा से विश्लेषण किया गया

इसी वजह से सूर्य के काफी करीब बुध ग्रह से मिलने वाले आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित किया

गया था। बुध को इसलिए भी प्रयोग के दायरे में रखा गया था क्योंकि पानी बनने के लिए

एक आवश्यकता गर्मी की भी होती है। बुध ग्रह की सतह पर मौजूद खनिजों में

हाइड्रोक्सील पाया गया। वे आपस में टकराकर भी पानी पैदा करते हैं। दूसरी तरफ इस

हाइड्रोक्सीन में मौजूद हाइड्रोजन ऊपर उड़ जाता है। ग्रह के ऊपरी वायुमंडल में हाइड्रोजन

के उड़ते रहने के दौरान ही नीचे पानी का स्वरुप दो हिस्सों में बंट जाता है। एक हिस्सा सूर्य

की गर्मी से भाप बन जाता है। यही भाप जब बुध ग्रह के ठंडे इलाके तक पहुंचता है तो

रासायनिक प्रतिक्रिया के तहत वे पहले पानी और बाद में बर्फ बनकर गहरी खाई में

एकत्रित होता जाता है। वहां के तापमान की वजह से वे बर्फ में तब्दील हो जाते हैं।

वैज्ञानिकों का आकलन है कि पिछले तीस लाख वर्षों के दौरान वहां जितना बर्फ एकत्रित

हुआ होगा वह जीवन की उत्पत्ति के लिए भी पर्याप्त है। वहां 11 खरब टन से अधिक बर्फ

एकत्रित होने का अनुमान है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि मैसेंजर अंतरिक्ष यान द्वारा

वर्ष 2011 से 2015 तक भेजे गये आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला

गया है। बाद में पृथ्वी पर स्थापित खगोल दूरबीनों से भी पहले के आंकड़ों का मिलान

करने के बाद ही इस बार में एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है।


 

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