एशियाई इलाकों में ग्लेशियरों का गलना हुआ कम

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  • अंतरिक्ष के उपग्रहों से मिली अच्छी खबर
  • सैटेलाइट चित्रों से निकाला निष्कर्ष
  • अपेक्षाकृत सुधार से कुछ भरपाई होगी
  • गहराई में ग्लेशियरों की स्थिति सुधरी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः एशियाई क्षेत्र में बर्फ के ग्लेशियरों के पिघलने की गति कम हुई है। ग्लेशियरों की स्थिति में यह बदलाव भारत और चीन के अलावा पाकिस्तान में भी देखा गया है।

वाशिंगटन के एक शोध दल ने इस परिवर्तन की रिपोर्ट सार्वजनिक की है। दुनिया भर में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चिंता की बात बनी हुई है।

इस वजह से जहां जहां भी बर्फ है, वहां की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। शोध दल ने एशिया के ग्लेशियरों पर उपलब्ध लाखों सैटेलाइट चित्रों और आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर पिघलने की गति धीमी होने का निष्कर्ष निकाला है।

पिछले एक दशक से यहां के ग्लेशियरों के निरंतर अधिक पिघलने की वजह से उनकी मोटाई कम होती जा रही थी।

एशियाई ग्लेशियरों की मोटाई पहले से कुछ बढ़ी है

पहली बार उनकी मोटाई बढ़ने के संकेत मिले हैं, जिससे वैज्ञानिक इस बात से उत्साहित हैं कि पूर्व में हुए नुकसान की कुछ तो भरपाई हो सकेगी।

इस नतीजे तक पहुंचने के लिए इस क्षेत्र के करीब बीस लाख सैटेलाइट चित्रों का अध्ययन और विश्लेषण किया गया है।

इस स्थिति पर नासा के जेट प्रोपल्सन लैब के आमूरी डेहेक का मानना है कि यह विशाल बर्फखंड यानी ग्लेशियर निरंतर गर्म होती पृथ्वी के साथ कैसे तालमेल बैठा रहे हैं, इसे समझने की भी जरूरत है।

उत्तरी ध्रुव के इलाके में यह देखा जा रहा है कि जिन ग्लेशियरों को ऊपर से बड़ा माना जा रहा था, वे दरअसल अंदर से खोखले होकर समुद्र में पिघल गये थे।

हिमालय के क्षेत्र के ग्लेशियरों से ही चीन और भारत की महत्वपूर्ण नदियों का निर्माण हुआ है। इन नदियों में जल का प्रवाह भी ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से बना रहता है।

लेकिन इनके गलने की प्रक्रिया तेज होने से नदियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।

अत्यंत ठंडे इलाके से निकलने वाली नदियों का पानी अत्यंत गर्म इलाकों तक होते हुए समुद्र में जाता है। इसलिए ग्लेशियरों की स्थिति पर इन इलाकों का जनजीवन भी टिका हुआ है।

जब वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट चित्रों और नदियों के जल प्रवाह के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों की स्थिति में थोड़ी सुधार के तथ्य सामने आये हैं।

एशियाई ग्लेशियरों के गहरे इलाके के आंकड़े भी सामने आये

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अत्यंत कठिन इलाके में होने की वजह से इन ग्लेशियरों की मोटाई वहां जाकर नापना संभव नहीं था। इसी वजह से सैटेलाइट के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

इसी विश्लेषण का नतीजा निकला कि दरअसल यहां के ग्लेशियर इस बार पहले के मुकाबले अधिक मोटे हुए हैं। यानी यहां बर्फ की मात्रा बढ़ी है। यह स्थिति पिछले एक दशक में हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई कर सकती है।

वैज्ञानिक विश्लेषण से यह भी पाया गया है कि कई अवसरों पर गर्मी कम होने के बाद भी ग्लेशियर नीचे की तरफ खिसक जाते हैं।

इसकी जांच में पाया गया है कि आकार बहुत बड़ा होने की स्थिति में इन ग्लेशियरों पर गुरुत्वाकर्षण का दबाव बहुत बढ़ जाता है।

ऐसी स्थिति में वे अपने आप ही नीचे खिसक जाते हैं। इससे भी नदियों में जल प्रवाह बढ़ जाता है। लेकिन गहराई वाले इलाकों में इसी वजह से बर्फ का भंडारण भी बढ़ता है।

ग्लेशियरों के पहाड़ों के बीच छिपे इस गड्ड़ों में बर्फ की मात्रा भी बढ़ी हैं, जिससे हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का भंडारण पहले से कुछ बेहतर होने की उम्मीद की जा रही है।

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