आर्कटिक क्षेत्र ग्लेशियरों का गलना हुआ कम ग्लोबल वार्मिंग के बाद भी अच्छी खबर

आर्कटिक क्षेत्र ग्लेशियरों का गलना हुआ काम ग्लोबल वार्मिंग के बाद भी अच्छी खबर
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  • सैटेलाइट से रखी जा रही है नजर

  • तीस साल में पहली बार अधिक बर्फ

  • समुद्र के अंदर के हालात नहीं बदले हैं

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आर्कटिक समुद्र के इलाके में ग्लेशियरों के पिघलने का क्रम धीमा हो गया है।

ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में कोई सुधार नहीं होने के बाद भी

यह स्थिति वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए सुखद संकेत है।

वैसे ग्लेशियरों के गलने की प्रक्रिया धीमी होने की जानकारी देते हुए

नासा ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के साथ साथ प्रदूषण की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

नासा का एक वैज्ञानिक दल वहां की स्थिति पर पिछले तीन दशक से लगातार नजर रखे हुए हैं।

इसके तहत ही पाया गया है कि वहां के जमे बर्फ के पिघलने की गति अचानक धीमी हो गयी है।

इससे इलाके में ग्लेशियरों का आकार बढ़ रहा है।

इस इलाके में बर्फ की स्थिति बेहतर होने से दुनिया के मौसम पर भी इसका बेहतर प्रभाव पड़ता है।

नई जानकारी के मुताबिक इस क्षेत्र का बहुत बड़ा इलाका इस वजह से

फिर से बर्फ की चादर में ढकता चला जा रहा है।

यह चादर समुद्र में बहुत दूर तक फैल चुकी है।

आर्कटिक इलाके पर तीस सालों से रखी जा रही है नजर

वर्ष 1980 से इस क्षेत्र पर वैज्ञानिकों ने नजर रखना प्रारंभ किया था।

तब से अबतक यहां के ग्लेशियर पिघलकर करीब आधे रह गये हैं।

पहली बार उन्हें आयतन और आकार में बढ़ता हुआ देखा जा रहा है।

वैज्ञानिकों के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यह के बर्फ की मोटाई भी पहले के मुकाबले दो तिहाई कम हो चुकी थी।

लेकिन इससे स्थिति को बहुत अच्छा इसलिए नहीं माना जा सकता

क्योंकि समुद्र के पानी में गर्मी का प्रभाव यहां के ग्लेशियरों पर भी अपना असर छोड़ रहा है।

अनेक बड़े बड़े हिमखंड अंदर से गलकर खोखले हो चुके हैं और धीरे धीरे समुद्र के अंदर समाते जा रहे हैं।

मालूम हो कि पूरी दुनिया के पारिस्थितिकी पर यहां के ग्लेशियरों का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

यहां बर्फ के पिघलने की गति तेज होते ही पृथ्वी का मौसम चक्र भी बिगड़ने लगता है।

साथ ही समुद्र में भी बड़े किस्म का असंतुलन पैदा हो जाता है।

वैज्ञानिक पहले ही इस बात की चेतावनी दे चुके हैं कि ग्लेशियरों का ज्यादा हिस्सा गल जाने की स्थित में

समुद्र में जो अतिरिक्त जल चला जाएगा, उससे दुनिया के कई बड़े महानगर भी समुद्र के अंदर समा जाएंगे।

साथ ही पूरी दुनिया में मौसम का चक्र भी पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

अब पहले बार सैटेलाइट के चित्र यह बता रहे हैं कि इस मौसम में पूरे इलाके में

करीब साढ़े तीन से साढ़े छह फीट तक अतिरिक्त बर्फ जम चुकी है।

अक्टूबर से ही बर्फ जमने का यह सिलसिला प्रारंभ हो गया था।

जो मौसम के और ठंडा होन के साथ साथ और भी तेज होता जा रहा है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस गति से अगर बर्फ जमता रहा

तो पूर्व में हुए नुकसान की कुछ भरपाई तो अवश्य ही हो जाएगी।

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