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पिघले हुए लोहे की बारिश वाला इलाका भी है अंतरिक्ष में




  • अत्यधिक तापमान वाला इलाका सूर्य के अलावा भी

  • दस हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से आंधी

  • पृथ्वी से यह इलाका अनेक प्रकाश वर्ष दूर है

  • एक छोर हमेशा चांद की तरह अंधेरे में रहता

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पिघले हुए लोहे के करीब जाने तक में दिक्कत होती है। जिस किसी ने भी लोहे

की धमनभट्टी के पास जाकर महसूस किया होगा, वह इस बात को समझ सकता है। अपने

जमशेदपुर में भी रात के अंधेरे में बीच बीच में पूरे आसमान पर नारंगी रंग का बिखर जाना

इसी पिघले हुए लोहे की वजह से होता है। आप सोच सकते हैं कि अगर यही पिघले हुए

लोहे की बारिश वाला कोई इलाका हुआ तो उसका तापमान आखिर क्या होगा।

अंतरिक्ष में ऐसा एक इलाका है। इसे एक्स्ट्रो प्लानेट का नाम वैज्ञानिकों ने वास्प 76 बी

रखा है। इसके बारे में अनुमान है कि यहां का औसत तापमान चौबीस सौ डिग्री सेंटीग्रेड है।

बात यहीं समाप्त नहीं होती क्योंकि वहां दस हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार के आंधी भी

निरंतर चलती रहती है। इसी का नतीजा है कि वहां के अंदर मौजूद लोहा पिघलकर

आसमान में बादल बन जाता है। वहां ठंडा होने के बाद उस पिघले हुए लोहे की बारिश फिर

से उसके सतह तक आती है। यह क्रम निरंतर जारी रहता है।

चिली में स्थापित एक खास खगोल दूरबीन से पहली बार इसकी हालत का विश्लेषण

किया गया है। इसके बारे में जो सूचनाएं दी गयी हैं, उसके मुताबिक यह पृथ्वी से काफी

दूरी पर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह अंतरिक्ष में काफी दूरी पर अवस्थित

कंस्टेलेशन ऑफ पाइसेस नामक इलाके से भी करीब 640 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। सूर्य

के अलावा भी इतनी अधिक तापमान वाले किसी इलाके का पहली बार पता चला है।

कंस्टेलेशन ऑफ पाइसेस अपने आप में अत्यधिक गर्म गैसों वाला एक इलाका है। इसी

इलाके में पिघले हुए लोहे की बारिश का यह क्षेत्र मौजूद है।

पिघले हुए लोहे की बारिश का अर्थ जीवन के लिए खतरा

इसका पता चलने के बाद जेनेवा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक क्रिस्टोफी लोविस कहते हैं

कि गनीमत है कि यह हमारे सौर मंडल के करीब का इलाका नहीं है। वरना सूर्य के अलावा

भी इसकी गर्मी का प्रभाव पृथ्वी पर जीवन की संभावनाओं को और कठिन बना देता। इस

ग्रह जैसे इलाके के दो छोर हैं, जिन्हें दिन और रात के तौर पर आंका गया है। इसकी

स्थिति ठीक सूर्य और पृथ्वी के बीच घूमती चंद्रमा जैसी है। चांद का भी एक हिस्सा हमेशा

ही अंधेर में रहता है। इसके साथ भी बिल्कुल वैसी ही स्थिति है। रोशनी वाले इलाके में

तापमान करीब एक हजार डिग्री ज्याहा होता है। इस अत्यधिक तापमान की वजह से वहां

मौजूद हर किसी चीज का आणविक विखंडन होता रहता है। वहां की सतह पर मौजूद लौह

तत्व इसी विखंडन की वजह से बादल बनकर ऊपर चले जाते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि

इसी तरह अन्य खनिज तत्व भी पिघलने और विखंडन की वजह से आसमान पर उड़ जाते

हैं। उसके बाद आसमान पर एक खनिज अथवा वाष्प जैसे धातु के बादल बन जाते हैं। यह

आसमान पर काफी ऊंचाई तक पहुंचने के बाद ठंडा होते हैं और दोबारा से बारिश की तरह

बरसते रहते हैं।

सूरज में भी होती है प्लाज्मा किरणों की बारिश

सूर्य में इसी तरही के प्लाज्मा किरणों की बारिश का पता पार्कर सोलर प्रोव ने बताया है।

अनुमान है कि इसके दूसरे छोर पर जहां अंधेरा है वहां के आसमान पर पहुंचते ही बादल

ठंडे हो जाते हैं और उनकी बारिश होने लगती है। यानी बादल में मौजूद पिघले हुए लोहे

बरसने लगते हैं। अंधेरी छोर से यह बारिश फिर से रोशनी वाले इलाके में चली जाती है।

इससे यह पिघले हुए लोहे की बारिश का सिलसिला चला आ रहा है। दोनों छोर पर

तापमान का अंतर भी करीब डेढ़ हजार डिग्री का होने की वजह से यह निरंतरता बनी रहती

है और यह काम लगातार होता रहता है।

चांद जैसा एक छोर रौशन तो दूसरा हमेशा अंधेरे में

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक इसे सामान्य भाषा में समझाने के लिए बता चुके हैं कि ऐसा

माना जाना चाहिए कि दिन के उजाले में पानी भाप बनकर उड़ता है और आसमान पर

बादल बनता है। दूसरी तरफ रात के अंधेरे में ठंडक होने की वजह से यह बारिश बनकर

बरसता है। प्रोफेसर डेविन एहरेनरिच कहते हैं कि इसे पृथ्वी की समझ में इतनी आसानी

से कुछ इसी तरह से बताया जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां पिघले हुए लोहे की

बारिश होती है।

इस स्थिति का पता चलने के बाद वैज्ञानिक इसकी गैस की संरचना को भी समझना

चाहते हैं। ताकि यह पता चल सके कि लोहे के अलावा और कौन कौन से धातु यहां मौजूद

हैं। शोध के प्रारंभिक चरण में यह भी पता चला है कि दस हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार

से जो आंधी वहां चलती रहती है वह दिन के इलाके से रात के इलाके की तरफ की होती है।

समझा जा रहा है कि अपेक्षाकृत कम तापमान वाले अंधेरे इलाके का तापमान ही इस

आंधी को जन्म देने वाला है। तापमान का यह अंतर ही इसकी अत्यधिक तेज गति को

बनाये हुए भी है।


 



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