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दवा के कारोबार का काला सच भी सामने आने लगा

  • वैज्ञानिकों ने जांच की तो और गड़बड़ी सामने आयी

  • एक छोटी सी कंपनी के आंकड़ों का हथियार बनाया

  • कंपनी के स्वामित्व भारतवंशी अमेरिकी के पास है

  • इन आंकड़ों पर वैज्ञानिकों को प्रारंभ से संदेह था

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दवा के कारोबार में बहुत सारी विसंगतियां हैं, यह तो भारत में जेनेटिक

दवाइयों के कारोबार को चालू करने की पहल के साथ साथ स्पष्ट हो गया था। खुद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए जनौषधि की दुकान

खोलने का नीतिगत फैसला लिया था। लेकिन इस काम के लिए जिस सरकारी एजेंसी को

जिम्मेदारी सौंपी गयी थी, उसके शीर्ष पर बैठे अधिकारी भी बड़ी दवा कंपनियों के प्रभाव में

आ गये। नतीजा है कि प्रधानमंत्री की योजना अब तक पूरे देश में सही तरीके से लागू नहीं

हो पायी है। जो नया खुलास हुआ है और जिसकी परतों को उधेड़ना वैज्ञानिकों ने जारी रखा

है, उसे आगे पढ़ने के पहले दवा कारोबार के इस सच को समझ लेना प्रासंगिक है। पूरी

दुनिया में दवा का कारोबार करीब 232 खबर अमेरिकी डॉलर का है। भारत का दवा

कारोबार का निर्यात ही 19 खरब रुपयों का है। इस दवा के कारोबार में जो बड़ी कंपनियां

पहले से बाजार में हैं, वे छोटी कंपनी अथवा सस्ती दवा को बाजार में चलने नहीं देती है।

जनौषधि को नियंत्रित करने वाली संस्था की गतिविधियों पर गौर करें तो वह भी जहां

जनौषधि की दुकानें खुली हैं, वहां छांट कर ऐसी दवाएं भेजती है, जिनसे आम मरीज को

कोई खास आर्थिक लाभ नहीं होता। जिन दवाइयां की कीमत अधिक है, उन पर अब भी

बहुराष्ट्रीय और बड़ी कंपनियों का कब्जा है। इसमें क्या कुछ खेल होता है, यह कोई छिपी

हुई बात नहीं है।

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के खिलाफ सक्रिय है एक बड़ी लॉबी ?

इसलिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के खिलाफ माहौल बनाने में जिन दो वैज्ञानिक

मान्यताप्राप्त पत्रिकाओं का उल्लेख हुआ है, उसके पर्दे के पीछे का सच भी सामने आने

लगा है। संदेह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रभाव में इस किस्म के फर्जी और अवैज्ञानिक

आंकड़ों को प्रमुखता के साथ प्रकाशित कर इस हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा को बाजार

से हटाने की साजिश रची गयी थी। इसके बारे में रिपोर्ट प्रकाशित होने के साथ साथ विश्व

स्वास्थ्य संगठन एवं कई अन्य देशों ने कोविड 19 के ईलाज संबंधी अपनी नीतियों में

बदलाव किया और इस हाईड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा को बेकार साबित कर दिया।

कोविड की जांच से जुटे वैज्ञानिकों को इन आंकड़ों पर संदेह था क्योंकि कई आंकड़े

सरकारी आंकड़ों से मेल नहीं खाते थे। इसी पर और जांच हुई तो इन आंकड़ों को उपलब्ध

कराने वाली कंपनी का नाम भी सामने आया है। लांसेट और न्यू इंग्लैंड जर्नल ने इसी

कंपनी के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए दवा को कोरोना के ईलाज में बेकार बताया है।

वैज्ञानिकों को संदेह होने पर इसकी जांच की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तो कड़ी से कड़ी जुड़ते चले

जा रहे हैं। जिस कंपनी के आंकड़ों पर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को बेकार बताया गया है, वह

एक अमेरिकी कंपनी है। इस कंपनी का नाम सर्जिस्फेयर है। लेकिन इस कंपनी के पास

कोई वैज्ञानिक नहीं है। कंपनी के कर्मचारियों की संख्या भी सीमित है और उनमें से चर्चित

चेहरा एक साइंस फिक्शन लेखक का है जबकि दूसरी एक मॉडल है जो वयस्क विषयों पर

अभिनय करती हैं। इस कंपनी ने ही कोरोना की जांच के आंकड़े उपलब्ध कराये हैं। लेकिन

जांच में यह कंपनी भी यह बता नहीं पा रही है कि उसने यह आंकड़े कहां से जुटाये हैं अथवा

उसका वैज्ञानिक विश्लेषण किस आधार पर किया है।

दवा के कारोबार में आंकड़ों की हेराफेरी फिर स्पष्ट हो गयी

सिर्फ इस आंकड़े में यह बताया गया है कि दुनिया भर के एक हजार से अधिक अस्पतालों

से यह आंकड़े एकत्रित किये गये हैं।

घटनाक्रमों से यह स्पष्ट हो गया है कि दवा के कारोबार की एक प्रभावशाली लॉबी ने यह

काम पर्दे के पीछे रहते हुए किया है। दरअसल दुनिया भर में इस पर शोध जारी होने की

वजह से ही आंकडों के गलत होने का संदेह तुरंत ही उत्पन्न हो गया था। वैज्ञानिक जगत

में इस पर अपनी तरफ से जांच प्रारंभ होते ही लांसेट और न्यू इंग्लैड जर्नल ने अपनी तरफ

से सफाई देते हुए यह कहा है कि कंपनी के आंकडों के आधार पर ही रिपोर्ट प्रकाशित की

गयी थी। इससे स्पष्ट हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विश्व स्वास्थ्य

संगठन के ऊपर लगाये गये आरोप बेबुनियाद नहीं हैं। वैसे इस पर जांच प्रारंभ होने के बाद

जांच का आंकड़ा पेश करने वाली कंपनी से भी कर्मचारियों का भागना प्रारंभ हो गया है।

वेबसाइट के मुताबिक अब कंपनी में सिर्फ तीन कर्मचारी बचे हुए हैं। दुर्भाग्य से इस कंपनी

के संपर्क करें का लिंक भी एक क्रिप्टोकरेंसी बेचने वाली वेबसाइट के साथ जुड़ा हुआ पाया

गया है। इस कंपनी का स्वामित्व एक भारतवंशी अमेरिकी के पास हैं। नाम सपन एस

देसाई हैं। वह खुद भी डाक्टर और वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं।


 

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