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मेडिकल साइंस में फिर से इंजीनियरिंग का दबदबा महामारी की वजह से

  • कोविड 19 से लड़ने के लिए मैदान में रोबोट उतारे

  • चीन के वुहान शहर में सबसे पहले हुआ प्रयोग

  • संक्रमण का मशीनों पर कोई असर नहीं पड़ता

  • खतरे का सारा काम मशीन खुद कर सकते हैं

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः मेडिकल साइंस धीरे धीरे इंजीनियरिंग में तब्दील होता जा रहा है। शरीर की

हड्डियों को प्लेट से जोड़ने से लेकर अंग प्रत्यारोपण में कृत्रिम अंगों का इस्तेमाल भी

इसकी कड़ी है। लेकिन अब वैश्विक महामारी कोविड 19 से लड़ने के लिए भी मैदान में

तेजी से रोबोट उतारे जा रहे हैं। दरअसल इसकी जरूरत सबसे पहले चीन के वुहान शहर में

महसूस की गयी थी। वहां ईलाज में जुटे स्वास्थ्यकर्मियों के संक्रमित होने की वजह से

यांत्रिक मदद लेने की पहल हुई थी। महज एक सप्ताह में चीन ने वहां जो अस्पताल खड़ा

किया था, वहां इन रोबोटों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया गया। दरअसल रोबोटों पर ऐसे

वायरस संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। साथ ही उन्हें अपने साथ आये वायरसों से

मुक्त करना भी आसान होता है। इसी वजह से रोबोट के इस्तेमाल से वहां स्वास्थ्यकर्मियों

के संक्रमण की घटनाएं कम होती चली गयी। अब वुहान शहर लगभग पूरी तरह स्थानीय

संक्रमण से मुक्त हो चुका है। चीन में भी अब जो संक्रमण पाये जा रहे हैं, वे विदेशों से आये

लोगों के ही हैं।

मेडिकल साइंस में इस फायदे को समझते हुए अब दुनिया के अन्य देश भी रोबोट का

इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं। इस भीषण संक्रमण के दौर में उनका बहुआयामी

इस्तेमाल किया जाने लगा है। कई देशों में अब तो रोबोट के जरिए सैनिटाइज करने का

काम लगातार चलाया जा रहा है। दरअसल इसके लिए दूसरी विधि का इस्तेमाल भी होने

लगा है। ऐसे रोबोट अपने पास के अल्ट्रावॉयोलेट किरणों से वायरस का सफाया कर रहे हैं।

इससे स्वास्थ्य और सफाई कर्मियों का खतरा भी तेजी से घट गया है। खास कर यह विधि

कई देशों के उन अस्पतालों में आजमायी जा रही है, जहां कोरोना के मरीजों का ईलाज चल

रहा है।

रोबोट का इस्तेमाल सबसे पहले वुहान के अस्पताल में हुआ

वुहान के सैन्य अस्पताल में जब मरीजों की संख्या बहुत अधिक थी जो उन्हें खाना और

दवा देने में भी रोबोट का इस्तेमाल किया जाने लगा था। इसके जरिए चिकित्सक रोबोट में

लगे कैमरों से मरीजों का हाल भी बिना करीब गये भी देख सकते थे। इसी क्रम में मरीजों

के शरीर का तापमान लेने के लिए भी रोबोट काम में लगाये गये थे। इन सभी विधियों का

अब दूसरे देशों में भी इस्तेमाल होने लगा है। इसी क्रम में रोबोट ड्रोन की मदद से सामानों

की आपूर्ति, कीटनाशकों का छिड़काव और थर्मल इमेजिंग का काम भी लिया जाने लगा

है। इस वजह से माना जा रहा है कि कोविड 19 के इस विश्वव्यापी प्रकोप ने मेडिकल

साइंस को इंजीनियिरंग का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की तरफ प्रेरित किया है।

इससे और कुछ नहीं तो त्वरित काम, संक्रमण से मुक्ति और मशीनों के लगातार काम

करने की क्षमता का लाभ मिल रहा है।

रोबोट पद्धति के इस्तेमाल की वजह से अब कई विकसित देशों में सुरक्षा के लिए सड़कों पर

तैनात पुलिसकर्मी भी स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका निभाने लगे हैं। उनके हेलमेट में लगा

खास कैमरा सामने वाले की तस्वीर की पहचान करने के साथ साथ अपने आप ही शरीर

का तापमान भी ले सकता है। यह कैमरे नियंत्रण कक्ष से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं।

इसलिए त्वरित विश्लेषण के बाद आवश्यक निर्देश भी प्राप्त होता रहता है। जिन इलाकों

में लगातार पुलिस को तैनात रखना संभव नहीं है, वहां रोबोट यह जिम्मेदारी बखूबी निभा

रहे हैं।

मेडिकल साइंस में तकनीक का इस्तेमाल काम आसान करता है

मेडिकल साइंस में इंजीनियरिंग के इस्तेमाल की प्रक्रियाओं को कोविड 19 के लायक भी

बनाया गया है। इसके तहत रोबोट ही पूर्व निर्धारित पद्धतियों के आधार पर सामने खड़े

व्यक्ति में सार्स सोव-2 के संक्रमण के लक्षण हैं अथवा नहीं, उसकी प्रारंभिक जांच कर लेते

हैं। कोरोना संक्रमण के पॉजिटिव संकेत मिलने पर मरीज का गहन परीक्षण किया जाता

है। इससे मशीनी भूल की आशंका को समाप्त किया जा सकता है लेकिन मशीन के निरंतर

सक्रिय होने की वजह से काम की गति बहुत तेज हो जाती है। मेडिकल साइंस में

इंजीनियरिंग का यह प्रयोग डाक्टरों के कीमती समय की बचत कर रहा है तथा खास तौर

पर कोरोना संक्रमण की पहचान और ईलाज की पद्धति को गति प्रदान करने वाला साबित

हुआ है।

विश्व विख्यात जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय ने इसी कंप्यूटर विश्लेषण की पद्धति से

पूरी दुनिया में कोरोना की स्थिति के लिए एक तकनीक बना डाली है। इसके माध्यम से

हम ऑन लाइन पूरी दुनिया में कोरोना के मरीजों की स्थिति का वास्तविक आंकड़ा देख पा

रहे हैं। इससे ईलाज और बीमारी की रोकथाम में फायदा हो रहा है।


 

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