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अधिकांश मरीजों में प्रारंभिक अवस्था के लक्षण नहीं नजर आ रहे

  • संक्रमण के प्रारंभिक लक्षण नहीं दिख रहे हैं

  • गंभीर अवस्था में आने वालों की ईलाज कठिन

  • पैंगोलिन अथवा चमगादड़ पर यहां भी शोध जारी

  • भारत में चेहरा बदल रहा है कोविड 19 वायरस

प्रतिनिधि

नईदिल्ली: अधिकांश मरीजों में कोविड 19 के प्रारंभिक लक्षण ही नजर नहीं

आ रहे हैं। दूसरी अथवा तीसरी जांच में उनमें वायरस होने की पुष्टि हो पा रही

है। इससे स्थिति थोड़ी विकट हो रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत में

इस वायरस का चेहरा बदलने के बारे में यह जानकारी दी है।

दूसरी तरफ दुनिया के कई अन्य देशों में भी यही सब कुछ दिखने लगा है।

इन सभी मरीजों में कोविड 19 का संक्रमण होने के प्रारंभिक लक्षण नहीं होने

के बाद भी अचानक सारा कुछ बिगड़ने लगता है। प्रारंभिक जांच में भी यह

पकड़ में नहीं आने की वजह से अब वैज्ञानिक इसकी जांच के लिए कोई

और पुख्ता तकनीक बनाने की वकालत करने लगे हैं। ताकि एक की बार

में ही वायरस का हमला होने की पुष्टि हो सके।

वर्तमान में ऐसी कोई तकनीक उपलब्ध नहीं होने की वजह से पारंपरिक

तरीके से ही इस कोरोना वायरस की जांच का काम चल रहा है। भारत में

इस जांच विधि को बदलने की वकालत इस वजह से भी की जा रही है

क्योंकि इसमें समय अधिक लगता है। अभी की जरूरत और भारत की

आबादी को ध्यान में रखते हुए संक्रमण के रेड जोन वाले इलाकों में

त्वरित और पुख्ता जांच रिपोर्ट की आवश्यकता अब काफी तेजी से

महसूस की जा रही है।

अधिकांश मरीजों में पहले संक्रमण में लक्षण दिखते थे

अधिकांश मरीजों को चीन में जब इस वायरस का संक्रमण होता

था तो उसके लक्षण निर्धारित किये गये थे। सरदर्द, सर्दी-खांसी, गले

में खराश और तेज बुखार के बाद ही संक्रमण की वजह से सांस लेने में

दिक्कत होने लगती थी। लेकिन अब अधिकांश मरीजों प्रारंभिक लक्षण

नजर नहीं आने  की वजह से अधिकांश मरीजों में जब बीमारी बहुत

अधिक बढ़ जा रही है तो मरीज संकट पूर्ण अवस्था में अस्पताल तक

पहुंच रहा है।

अभी देश में पिछले दिसंबर माह के चल रहे काम की बदौलत चिकित्सा

सुविधा काफी बेहतर हुई है। फिर भी यह कोरोना के अधिकांश मरीजों

अथवा संक्रमण की आशंका से अलग थलग किये गये लोगों के लिए

भले ही पर्याप्त हों पर संकटपूर्ण अवस्था के कोरोना के अधिकांश

मरीजों के लिहाज से पर्याप्त नहीं है। सिर्फ चिकित्सीय इंतजाम

ही नहीं बल्कि हमारे पास ऐसे कुशल स्वास्थ्यकर्मियों का भी

घोर अभाव है जो इस बीमारी के और फैल जाने की स्थिति में

इसका मुकाबला कर सकें।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि अब अस्सी

प्रतिशत कोरोना के अधिकांश मरीज पाये जा रहे हैं, जिन्हें प्रारंभिक

लक्षण नहीं नजर आ रहे हैं। इस वजह से जब उनकी स्थिति अधिक

बिगड़ रही है तब जाकर उनकी गंभीर स्थिति का पता चल पा रहा है।

यह अपने आप में कठिन चुनौती बनती जा रही है।

यह जांचना जरूरी कि क्या वाकई जानवरों से आया वायरसपैंगोलिन जीव से चीन के वुहान में फैला कोरोना वायरस

वैसे भारतीय वैज्ञानिक इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना

चाह रहे हैं कि दरअसल यह वायरस किस प्राणी से इंसानी शरीर

तक पहुंचा है। इस बात के प्रमाण पहले से ही मौजूद हैं कि कई

गंभीर किस्म की इंसानी बीमारियां अन्य प्राणियों से ही आयी है।

अन्य जंगली जानवरों पर जिस वायरस का असर नगण्य होता है,

वे इंसानी शरीर पर मारक प्रभाव पैदा करते हैं। इसके पहले टीबी,

रैबिज, मलेरिया, टोकोप्लासमोसिस जैसी बीमारियों अन्य प्राणियों

से ही इंसानों तक पहुंचती है, यह वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित तथ्य

है। इसी तरह इबोला, एचआइवी, एवियन फ्लू, जिका और सार्स के

हमले का स्रोत भी यही रहा है।

अभी इस बात की चर्चा हो रही है कि कोरोना वायरस भी चीन के वुहान

शहर के समुद्री मछली के बाजार से फैला है। इसके लिए पैंगोलिन और

चमगादड़ को जिम्मेदार माना गया है। लेकिन भारतीय वैज्ञानिक इस

तथ्य को भी अपने तरीके से परखने के अनुसंधान में जुटे हुए हैं ताकि

सच्चाई का पता लगाया जा सके।

शोध से भविष्य के लिए भी तैयारी संभव होगी

जानवरों से इंसान तक पहुंचने वाले इस वायरस पर शोध इस वजह

से भी किया जा रहा है ताकि भविष्य में होने वाले ऐसे किसी हमले

की पूर्व तैयारी की जा सके। साथ ही यह भी परखा जा सके कि क्रमिक

विकास के दौर में क्या अन्य जानवरों ने भी कोई नई सुरक्षा पद्धति

अपने अंदर विकसित की है ताकि इंसान उनसे दूर रह सके।

भारत में बिना पूर्व लक्षण के गंभीर रुप से बीमार होकर अस्पतालों

में भर्ती होने वाले मरीजों में से 15 फीसद लोगों की हालत तुरंत ही

संकटपूर्ण हो जाती है। यानी हमले के अंतिम चरण में पहुंचने के बाद

ही उनके बीमार होने का पता चल पाता है। इनमे से भी पांच प्रतिशत

लोग अति गंभीर अवस्था में पहुंच रहे हैं। लगातार मरीजों की संख्या

बढ़ने के बीच ऐसे गंभीर प्रकृति के पांच प्रतिशत मरीजों का ईलाज भी

देश में कठिन चुनौती बनता चला जा रहा है क्योंकि हमारे पास पर्याप्त

इंतजाम अब भी पूरे नहीं हो पाये हैं।


 

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