जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में मातृभाषा दिवस मनाया गया

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रांची : जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग रांची में अन्तर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस मनाया गया।

इस मौके पर मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय रांची के कुलपति डा. रमेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि

मातृ भाषाओं के उत्थान हेतु संख्या बल की आवश्यकता नहीं,

बल्कि इसे संरक्षित करना है तो एक व्यक्ति ही काफी है।

उन्होंने कहा कि हमारी मातृ भाषाओं को सामाजिक संरक्षण प्राप्त नहीं होगा तो हमारा सब कुछ समाप्त हो जायेगा।

पूरी दुनिया में झारखंडी संस्कृति एक मॉडल है।

चूंकि सामूहिकता ही यहां के आदिवासी संस्कृति की पहचान है।

उन्होंने कहा कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के माध्यम से ही

आज पूरी दूनिया में रांची विश्वविद्यालय की पहचान है।

विदेशों में भी हमारी मातृ भाषाओं पर शोध हो रहे हैं।

हमें भी अपनी मातृ भाषाओं की उन्नति के लिये कार्य करना होगा।

अतिथियों का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष डा. त्रिवेणी नाथ साहु ने आदिवासी और सदानी भाषाओं के विकास क्रम को रेखांकित करते हुए कहा कि मातृ भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जो सर्वांगीण विकास का रास्ता खोलता है। यह विचार विनिमय का साधन है।

उन्होंने कहा कि मातृ भाषाओं के संवर्द्धन और संरक्षण के लिये हमें अधिक से अधिक साहित्यिक रचना करना होगा, जिससे की हमारी मातृ भाषा और साहित्य समृद्ध होगी।

विषय प्रवेश कराते हुये प्राध्यापक डा. उमेश नन्द तिवारी ने कहा कि मातृ भाषा किसी भी समुदाय का प्राण तत्व होता है।

यही भाषा तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शिक्षा का माध्यम यदि अपनी मातृ भाषाओं में दी जाय तो यह हमारे जीवन में बहुत ही प्रभावशाली होता है।

नागपुरी भाषा की सहायक प्राध्यापिका डॉण् पूनम सिंह चौहान ने

नागपुरी भाषा के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुये कहा कि

मातृ भाषा माता के दूध के समान मीठा और दुर्लभ है।

मातृ भाषाओं के माध्यम से हम अपनी भावनाओं का आदान प्रदान करते हैं।

खोरठा भाषा के सहायक प्राध्यापक डा. दिनेश कुमार दिनमणि ने कहा कि

मातृ भाषाओं के आगे मातृ विशेषण लगा हुआ है इस कारण मातृ भाषा अपने आप में भावनापूर्ण व महत्वपूर्ण है।

मातृ भाषाएं हमारे सामान्य जन बचा के रखे हुये हैं। साहित्यकार उसे आज परिष्कार कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि झारखंड की मातृ भाषाओं को संरक्षित व संवर्द्धित करने में

सजग भाषाकर्मियों एवं साहित्यकारों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पंचपरगनिया भाषा के सहायक प्राध्यापक रमाकांत महतो ने समाज में मातृ भाषा की

प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुये कहा कि मातृ भाषाओं में हमारा संस्कृति और संस्कार का समावेश होता है।

हमें अपनी भाषा का ज्यादा से ज्यादा प्रचार.प्रसार करने की आवश्यकता है।

कुरमाली भाषा के सहायक प्राध्यापक डा. उपेन्द्र कुमार ने कहा कि मांय-माटी बचेगा तभी हम और हमारा अस्तित्व बचेगा।

भाषा खत्म हो जाने से भाषा के साथ साथ संस्कृति भी खत्म हो जायेगी।

इस लिये हम सबों का दायित्व होना चाहिये कि कैसे मातृ भाषाओं का संरक्षण और संवर्द्धन हो।

खड़िया भाषा के सहायक प्राध्यापक अबनेजर टेटे ने कहा कि

अपनी मातृ भाषाओं को बचाने के लिये हमें एकजुट होना होगा।

मातृ भाषाओं में अधिक से अधिक लेखन कार्य करना होगा।

हो भाषा के सहायक प्राध्यापक गुरुचरण पूर्ति ने हो भाषा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुये कहा कि चलना ही नृत्य और बोलना ही गीत है।

मानव की उत्पत्ति के साथ ही भाषा अस्तित्व में आया। यह हमारी मां है, वात्सल्य है।

इसके बिना हमारा विकास संभव नहीं। मुंडारी भाषा के सहायक प्राध्यापक करम सिंह मुंडा ने कहा कि वर्तमान में हमारा साहित्य काफी समृद्ध अवस्था में है।

इसे और अधिक समृद्ध करने की आवश्यकता है।

कुड़ुख भाषा के सहायक प्राध्यापक विकास उरांव ने कहा कि हमारी मातृ भाषाओं के विकास में ईसाई मिशनरियों व अंग्रेजों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

उनकी वजह से भी हमारी भाषाओं का काफी विकास संभव हो पाया है।

संताली भाषा के सहायक प्राध्यापिका शकुंतला बेसरा ने कहा कि मातृ भाषाएं हमारी आत्मा है।

हमें अपनी भाषा में बातचीत करनी चाहिये।

क्योंकि जैसे ही हम अपनी भाषा खो देंगे हमारा अस्तित्व हमेशा के लिये समाप्त हो जायेगा।

कार्यक्रम में विभाग के सहायक प्रध्यापक डा. राकेश किरण द्वारा संपादित पुस्तक कुरमाली भाषा की गीतों व कविताओं पर केन्द्रित जीवन फूल का लोकार्पण किया गया।

मौके पर डा. अशोक कुमार बड़ाईक ने स्वागत गान तथा नरेन्द्र कुमार दास ने ओजपूर्ण कविता का पाठ किया।

मंच संचालन डा. राकेश किरण और डा. सरस्वती गागराई ने की।

जबकि धन्यवाद ज्ञापन डा. दमयंती सिंकु ने किया।

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