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नासा के वैज्ञानिकों ने आंकड़ों और तस्वीरों के आधार पर निष्कर्ष निकाला, देखें वीडियो




  • मंगल पर हजारों विशाल ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे

  • उत्तरी हिस्से में ही हुए थे सारे विस्फोट

  • लावा और राख हजारों मील तक फैले थे

  • राख के नीचे मौजूद हैं अनेक खनिज भी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नासा के वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाया है कि मंगल ग्रह पर कभी हजारों अति विशाल ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे।




इस मंगल ग्रह पर यह विस्फोटों की श्रृंखला उत्तरी इलाके में हुए थे, जिसे अराबिया टेरा कहा जाता है। वैसे इन विस्फोटों का काल आज से करीब पांच सौ मिलियन वर्ष के पूर्व का है।

वीडियो में देखिये इसका वैज्ञानिक विश्लेषण

इनमें से कुछ विस्फोट इतने बड़े थे कि उनके निकले राख और धुआं ने कई दशकों तक सूर्य की रोशनी को ग्रह पर पड़ने से रोक दिया था।

जिससे वहां का मौसम भी बदलता चला गया। हाल के दिनों में इन घटनाओं के प्रमाणों की पुष्टि हुई है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि पानी के भाप, कॉर्बन डॉईऑक्साइड और सल्फर डॉईऑक्साइड वहां के वातावरण में घुल गये थे।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक पैट्रिक व्हीली कहते हैं कि इसमें से हर विस्फोट ने वहां का माहौल थोड़ा थोड़ा कर बदल डाला था।

पैट्रिक खुद नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर (ग्रीनबेल्ट) में काम करते हैं। उन्होंने ही मंगल ग्रह के अराबिया टेरा के इस शोध का नेतृत्व किया था। दरअसल शोधकर्ता वहां के माहौल में हुए बदलाव को समझने के क्रम को सजाने की कोशिश कर रहे हैं।

इनमें से कई भीषण विस्फोटों का दायरा इतना बड़ा था कि वह पृथ्वी के एक बड़े हिस्से के बराबर थे। इनसे निकला राख के अलावा लावा का प्रवाह हजारों मील दूर तक चला गया था। इसकी वजह से दूर तक उस लावा की एक चादर से बिछी हुई है।

इन बड़े विस्फोटों की वजह से विशाल गड्डा भी बन गया था। विज्ञान की भाषा में इन विशाल गड्डों को कैलडेरा कहते हैं। यह कैलडेरा पृथ्वी पर भी कई स्थानों पर मौजूद है।

नासा के वैज्ञानिकों ने अरबिया टेरा का अध्ययन किया

मंगल ग्रह के अरबिया टेरा में ऐसे कई विशाल गड्डे मौजूद हैं। इन गड्डों को देखकर ही पहली बार वहां ज्वालामुखी विस्फोट होने का पता लगाया गया था।

वर्ष 2013 में इस ग्रह की तस्वीरों में ऐसे गड्डे नजर आने के बाद यह समझा गया था कि यह दरअसल कैलडेरा है। इसी सोच के आधार पर इस अनुसंधान को आगे बढ़ाया गया था।

वैसे वहां के कैलडेरा और धरती पर मौजूद कैलडेरा के ढांचों में थोड़ा अंतर है क्योंकि वहां के इन विशाल गड्डे पूरी तरह गोल नहीं हैं और कई स्थानों पर वह टूटे हुए भी हैं।




इसके बाद वहां ज्वालामुखी विस्फोट से निकले राख की खोज प्रारंभ की गयी थी क्योंकि ज्वालामुखी विस्फोट होने के राख का निकलना एक स्वाभाविक बात है, जिसे छिपाया भी नहीं जा सकता है।

नासा के मार्स रिकॉंसिनेंस मिशन के ऑरबिटर से मिले आंकड़ों से इस राख का पता लगाया गया। साथ में यह भी देखा गया कि इसके दूसरे हिस्सों में भी यह राख मौजूद है अथवा नहीं। दरअसल राख पर शोध करने का यह विचार अलेकजेंड्रिया मैटियेला नोवाक ने दिया था जो इस पर शोध कर रही थीं।

क्रमवार आंकड़ों का विश्लेषण करने से एक एक कर इन घटनाक्रमों को समझा गया। अनुसंधान दल ने यह समझा कि ज्वालामुखी विस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा की वजह से यह राख भी उड़कर चारों तरफ फैल गये होंगे।

तब ढलान वाले पूर्वी दिशा में राख होने पर अधिक ध्यान दिया गया। मंगल ग्रह की तस्वीर और आंकड़ा संग्रह करने वाले अभियानों से जो कुछ आंकड़ा मिला था, उसके आधार पर राख के साथ साथ निकले खनिजों की भी जांच की गयी।

जांच में वहां राख के नीचे दबे खनिजों का भी पता चला

इस जांच का नतीजा यह निकला कि वहां मोंटोमोरिलोनाइट, इमोगोलाइट और एलोफेन होने का पता चला। इससे स्पष्ट हो गया कि यह सारे खनिज ज्वालामुखी विस्फोट की राख के नीचे मौजूद हैं।

खास कर वहां की गहराई वाले इलाके में इनकी प्रचुरता के बीच वे पानी वाले खनिजों को होने की वजह से कीचड़ मे तब्दील हो गये थे।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक जैकब रिचर्डसन कहते हैं कि इन आंकड़ों की जब दोबारा जांच की गयी तो इस बात की पुष्टि हो गयी कि उनकी खोज की गाड़ी सही दिशा में बढ़ रही है। वहां के इतने बड़े ज्वालामुखी विस्फोट से पृथ्वी पर मौजूद आंकड़ों का मिलान किया गया।

पृथ्वी पर इस किस्म का भीषण ज्वालामुखी विस्फोट 76 हजार वर्ष पूर्व सुमात्रा (इंडोनेशिया) में हुआ था। पृथ्वी के इस बड़े ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से पूरी पृथ्वी पर राख के बादल फैल गये थे। मंगल ग्रह पर ऐसे ही अनेक विस्फोट हुए थे।

धरती पर ज्वालामुखी विस्फोट के स्थान बदलते रहे हैं। मसलन धरती पर हवाई द्वीप के माउंट लोया में बी दूसरे किस्म का लेकिन बड़ा विस्फोट होने के प्रमाण है।

लेकिन मंगल ग्रह पर ऐसे विस्फोट सिर्फ उत्तरी छोर पर ही हुए हैं। आकार में यह विस्फोट पृथ्वी के किसी बड़े विस्फोट की तुलना में सौ गुणा अधिक शक्तिशाली थे।

लेकिन इस छोटे से ग्रह में इतने बड़े विस्फोट खास इलाके में क्यों हुए, इस सवाल का उत्तर अब तक वैज्ञानिक नहीं तलाश पाये हैं।



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