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बाजार में अब चहल पहल कपड़ा दुकान खोलने पर चर्चा का बाजार गर्म

  • संघ का मानना है कि इस माह के बाद देखेंगे
  • अगले माह विचार कर फैसला लेंगे व्यापारी
  • अभी कपड़ा कारोबार में वैसे भी धीमी चाल
  • कारखानों में उत्पादन कम और नकदी की मांग
संवाददाता

रांचीः बाजार में अब चहल पहल होने के बाद भी रौनक नहीं लौटी है। जिन दुकानदारों ने

अपनी अपनी दुकान खोली है, वे भी मानते हैं कि अभी ग्राहकों की जबर्दस्त कमी है। इसके

बीच ही कपड़ा और जूता चप्पल की दुकान खोलने पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका है।

अंदरखाने से इस बारे में छनकर आने वाली सूचनाओं के मुताबिक ऐसे कारोबारियों के एक

वर्ग के भयादोहन के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। कपड़ा पट्टी में इस बात की

जोरदार चर्चा है कि जब गुटखा कारोबारियों को बचाने के लिए समय सीमा का विस्तार

चुपके से दिया गया, उसी वक्त कपड़ा कारोबारियों को भी माल डाउन करने का संकेत

दिया गया था। चंदा कर अनुमति हासिल करने के प्रस्ताव को कारोबारियों ने खारिज कर

दिया है। कपड़ा कारोबार से जुड़े कई लोगों का मानना है कि लॉक डाउन की वजह से जो

अच्छी बिक्री का समय था, वह तो बंदी में ही बीत चुका है। इसके तुरंत बाद बरसात के

मौसम में भी कारोबार में मंदी ही रहेगी। ऐसी स्थिति में कारोबार खोलने के लिए फिर से

पैसा देना गलत फैसला होगा। आपसी विचार विमर्श के बाद इस मुद्दे को फिलहाल टाल

दिया गया है। कपड़ा कारोबारी मानते हैं कि वैसे भी बाजार में पैसे की भारी तंगी के बीच

ग्राहकों की कमी रहेगी। जब तक बाजार में पर्याप्त पैसा नहीं आता, लोग खरीददारी से भी

बचना चाहेंगे। इस बीच ईद के मौके पर चोर दरवाजे से जो कुछ बिकना था, वह बिक चुका

है।

बाजार खोलने के लिए राजनीतिक चंदा नहीं देंगे व्यापारी

जिंदगी कैसी है पहेली हाय कभी यह हंसाये कभी यह रुलाये

लिहाजा अब इस परमिशन को हासिल करने के लिए धन देने की कोई आवश्यकता भी

नहीं है। दूसरी तरफ कारोबार में नया माल मंगाने के लिए भी अब कारखाना वाले नकद की

मांग कर रहे हैं। ऐसे में बाजार में नया माल मंगाने का भी कोई व्यापारिक फायदा नहीं

होने जा रहा है।

जानकार मानते हैं कि देश भर में कोरोना की स्थिति को देखने के बाद इस माह के बाद इस

पर विचार किया जाएगा। क्योंकि वर्तमान में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैलने की वजह

से भी खतरा बना हुआ है। इससे बचते हुए कारोबार को अभी चालू करना कारोबारी लिहाज

से फायदेमंद फैसला नहीं होगा। इसलिए इस महीने के बाद इस पर क्या कुछ किया जा

सकता है, इस पर राष्ट्रीय स्तर पर आपसी संवाद के जरिए ही फैसला किया जाएगा।

क्योंकि अभी अनेक कारखानों में मजदूरों की भीषण कमी होने की वजह से उनमें उत्पादन

भी ठीक से नहीं हो पा रहा है। कारखानों में भी कच्चा माल की कमी है। ऐसे में माल

मंगाकर डंप करने में पैसा फंसाने का भी कोई औचित्य नहीं है। दूसरी तरफ लोगों की जो

आर्थिक स्थिति है, उसमें लोग आम दिनों की तरह कपड़े खरीदेंगे, इसकी भी कोई संभावना

नहीं है। लिहाजा दुकान खोलने के एवज में अगर पैसे की मांग हुई भी है तो उसे पूरा नहीं

किया जाना चाहिए।

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