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मरीचझापी में वाममोर्चा राज में दलितों के नरसंहार के सबक

मोदी का आर्थिक पैकेज- हर किसी को राहतमरीचझापी का इतिहास वर्तमान पीढ़ी की जानकारी में शायद नहीं होगा। भारत विभाजन

के समय मुस्लिमों पर भरोसा करते हुए पाकिस्तान में अपनी जड़े जमाने के मकसद से

गए दलितों को वहां से पलायन के बाद देश वापस होने पर तमाम बार उजड़ने के बावजूद

न नागरिकता मिली और न ही अनुसूचित जाति का दर्जा। बांग्लादेशी मुस्लमानों को

अवैध रूप से देश में बसाने वाले कम्युनिस्टों और कांग्रेस के कारण 31 मई 1979 को हिन्दू

दलितों को सुंदरवन डेल्टा के मरीचझापी द्वीप में पुलिस फायरिंग में घेरकर मार डाला

गया। एक हजार से ज्यादा दलित हिन्दू मारे गए। बड़ी संख्या में शवों को समुंद्र में बहा

दिया। यह नरसंहार हुआ 31 जनवरी 1979 को। सौ से ज्यादा नावों में पश्चिम बंगाल

पुलिस और दो स्टीमर में सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने मरीचझापी द्वीप को 26 जनवरी

1979 को घेर लिया था। पूरे इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई थी। पीने के पानी में जहर

मिला दिया गया। भोजन,पानी और दवा के अभाव में हिन्दू दलितों को पाकिस्तान के बाद

भारत में भी अत्याचार और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा।

मरीचझापी द्वीप को वाम मोर्चा ने अभयारण्य का हिस्सा बनाया

26 जनवरी, 1979 को पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने मरीचझापी द्वीप को

टाइगर रिजर्व का हिस्सा बताते हुए अवैध तौर से बसे हिन्दू दलितों को भगाने का ऐलान

किया था। आर्थिक नाकेबंदी के कारण लोगों को पलायन के मजबूर होना पड़ा। उस समय

मीडिया में चर्चा थी 1500 लोग मारे गए थे। वाममोर्चा सरकार ने नरसंहार के समाचारों को

छिपाने के लिए पूरी इंतजाम किए थे। नरसंहार के तीन महीने बाद वाममोर्चा सरकार की

तरफ से 17 मई 1979 को पत्रकारों को बताया गया था कि कि मरीचझापी को खाली करा

लिया गया है। केंद्र में जनता पार्टी की सरकार के दौरान भेजे गए संसदीय प्रतिनिधिमंडल

के साथ बदसलूकी की गई थी। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में अत्याचार

और उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता

संशोधन कानून लागू किया है। दलितों का लगातार शोषण करने वाले कम्युनिस्ट, कांग्रेस

और इनसे टूट-टूट कर बने दल ही नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं। 1979

में मरीजझापी से भगाए गए 40,000 से ज्यादा दलितों ने विभाजन के समय पूर्व

पाकिस्तान में रहने का विकल्प चुना था। उस समय दलित-मुस्लिम दोस्ती के नाम पर

ऐसे लोगों को पाकिस्तान अच्छा लगा। दलितों ने बंटवारे के बाद भी पूर्वी बंगाल में रहने

का फैसला किया। दलितों के नेता जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने।

दलितों के नेता जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे

इसके बाद दलितों पर अत्याचार शुरु हुए तो उन्होंने भारत की तरफ रुख किया। कांग्रेस

सरकार इन लोगों को शरण देने के लिए तैयार नहीं थी। शेख मुजीबुर्रहमान की अगुवाई में

चले बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान एक करोड़ से ज्यादा हिन्दू दलितों को भारत में यह

सोचकर शरण दे दी गई कि इन्हें फिर से बांग्लादेश भेज दिया जाएगा। इन लोगों को

अंडमान द्वीप समूह, छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य जंगल, उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में

शरणार्थी शिविरों बसाया गया। लंबे समय से रहने के बावजूद हिन्दू दलितों को नागरिकता

नहीं मिल पाई है। शुरुआत में उत्पीड़न के शिकार हिन्दुओं को बसाने का लालच देकर

कम्युनिस्टों ने बड़ा राजनीतिक खेल खेला। सत्ता में आने के बाद कम्युनिस्टों ने

अत्याचार शुरु कर दिए थे। 1979 में दलदली सुंदरबन डेल्टा में मरीचझापी द्वीप पर

बांग्लादेश से पलायन करके आए 40,000 शरणार्थी से ज्यादा शरणार्थी रह रहे थे। इन

लोगों ने अपने दम पर पानी और दवाओं का इंतजाम किया था। इनमें दंडकारण्य से आए

ज्यादातर लोग थे। कम्युनिस्टों के अत्याचार के कारण कुछ लोग स्थान छोड़कर चले

गए। कम्युनिस्टों ने अपने कैडर और पुलिस के साथ मिलकर पांच दिन तक हजारों लोगों

तक बिना भोजन, पानी और दवा नहीं पहुंचने दी। तीन दिन तक फायरिंग होती रही। बचे

लोगों को जबरन दुधकुंडी शिविर में भेज दिया गया। कम्युनिस्ट सरकार की तरफ से

मरीचझापी को मुक्त कराने की घोषणा को एक बड़ी जीत बताया गया।

आजाद भारत का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था वाम शासन काल में 

मरीचझापी नरसंहार आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा नरसंहार है। बांग्लादेशी मुस्लिमों

और रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने की वकालत करने वाले राजनीतिक दल पाकिस्तान,

बांग्लादेश और अफगानिस्तान में अत्याचार का शिकार होने वाले दलित हिन्दुओं को

भारत की नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं। पाकिस्तान की मीडिया के साथ दुनियाभर

की मीडिया में वहां रहने वाले हिन्दुओं के साथ होने वाले अत्याचारों की चर्चा होती है।

पाकिस्तान में हिन्दू कन्याओं को जबरन उठाकर मुस्लमान बनने के लिए मजबूर किया

जाता है। उनके साथ बलात्कार होते हैं। बड़ी संख्या में लोग भागकर भारत आए हैं। उनकी

आर्थिक हालत भी ठीक नहीं है। एक समय अपनी राजनीति चमकाने के लिए बांग्लादेशी

मुस्लिम घुसपैठियों का विरोध करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

आज घुसपैठियों की सबसे बड़ी हिमायती बनी हुई है। सीमावर्ती इलाकों में मुस्लिम

घुसपैठियों के कारण बड़ी संख्या में हिन्दुओं को घऱ छोड़ने पड़े हैं। बड़ी संख्या में गांव

हिन्दुओं ने खाली किए हैं। अब समय है कि वोट के लिए मुस्लिमपरस्त राजनीति करने

वाले दलों को सबक सिखाया जाए और कम्युनिस्टों का दलित विरोधी चेहरा देश के सामने

उजागर हो

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