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नये डीजीपी के नाम पर बिहार के चुनावी माहौल में अटकलबाजी शुरु

  • पुलिस और प्रशासनिक महकमें के समीकरण बदलेंगे

  • पूर्व डीजीपी गृह जिला से ही चुनाव लड़ेंगे

  • पुलिस विभाग के कई समीकरण बदलेंगे

  • सरकार और चुनाव आयोग के बीच कौन

दीपक नौरंगी

पटनाः नये डीजीपी के नाम पर अलग अलग दावे पेश होने लगे हैं। दरअसल चुनाव का

माहौल होने की वजह से हर बात को अब राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। यह भी

समझा जा रहा है कि गुप्तेश्वर पांडेय ने भी चुनाव लड़ने के इच्छा की वजह से ही अचानक

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली है। उन्होंने फेसबुक लाइव पर इस बात का आज एलान भी कर

दिया है।

वीडियो में समझिये पूरी रिपोर्ट

चर्चा यह भी है कि शीघ्र ही चुनाव आयोग बैठक कर आचार संहिता लागू करने का एलान

भी कर दे। इसी वजह से ठीक एक दिन पहले वह अपनी चुनावी योजना के तहत सरकारी

जिम्मेदारी से मुक्त हो गये हैं। अंदरखाने की माने तो श्री पांडेय अपने गृह जिला के ही

किसी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। भाजपा और जदयू में से वह किस दल के टिकट पर

चुनाव लड़ेगे, इस पर भी अटकलबाजी जारी है लेकिन पलड़ा जदयू का ही भारी है।

प्रभारी डीजीपी संजीव कुमार सिंगल के साथ अनेक अधिकारियों का समर्थन है क्योंकि वह

आम तौर पर मृदुभाषी माने जाते हैं। वर्तमान कई आईपीएस अधिकारी प्रभारी डीजीपी के

साथ है। एसके सिंघल सरकार के नजर में इनकी कार्यशैली अच्छी मानी जा रही है। फिर

भी वर्तमान मुख्य सचिव दीपक कुमार और पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह की क्या

राय है यह अभी कहना मुश्किल होगा।

प्रभारी डीजीपी एक मृदुभाषी अफसर माने जाते हैं

इसलिए श्री सिंघल को यह जिम्मेदारी मिलना भले ही राज्य सरकार का त्वरित फैसला हो

लेकिन इसे तुरंत ही अंतिम नहीं माना जा सकता है। बिहार के आईपीएस अधिकारियों के

वरीयताक्रम के आधार पर कुमार राजेश चंद्रा का नाम सबसे ऊपर है। वह वर्तमान में

सशस्त्र सीमा वल के महानिदेशक के पद पर हैं। अपनी खांटी ईमानदारी छवि की वजह से

वह अलग पहचान रखते हैं। मूल रुप से रांची के निवासी श्री चंद्रा वर्तमान सरकार की

पहली पसंद नहीं होंगे, यह सभी को मालूम है क्योंकि वह अपने तेवर की वजह से किसी के

दबाव में नहीं आते। लेकिन वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटना चाहेंगे अथवा नहीं,

अभी यह स्पष्ट नहीं हैं। इसके अलावा डीजी स्तर के अधिकारियों में दिनेश सिंह बिष्ट,

राजविंदर सिंह भट्टी अरविंद पांडेय और आलोक राज भी हैं।

नये डीजीपी को तय करने में कई समीकरण प्रभावी

राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो अरविंद पांडेय इस मामले में मजबूत दावेदारी के

साथ हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आरएसएस के साथ उनके पुराने और पुश्तैनी संबंध

बताये जाते हैं। साथ ही वह बिहार नहीं उत्तर प्रदेश के हैं। श्री पांडे की एक खासियत यह

मानी जाती है कि वह काफी बुद्धिमान है और सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव रहते हैं

बिहार में आम लोगों से उनका लगातार जुड़ाव बना हुआ है और एक अच्छे गायक के रूप

में भी आईपीएस अधिकारी अरविंद पांडे की एक अलग पहचान बनी हुई है।

बिहार में अभी सब कुछ चुनाव के हिसाब से तय होगा

लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी बिहार में चुनावी मौसम चल रहा है। बिहार के

चुनाव में जातिगत समीकरणों पर ध्यान देना राजनीतिक दलों की मजबूरी भी होती है।

इससे पहले ब्राह्मण जाति के 3 डीजीपी बिहार में रहे हैं। पहले पीके ठाकुर जो तीन साल से

भी अधिक समय तक बिहार के डीजी रहे। उसके बाद के एस दिवेदी भागलपुर दंगे के

कारण काफी विवादों में रहे लेकिन उन्हें बिहार का डीजीपी भाजपा और आरएसएस के

दबाव में बनाया गया ऐसा बताया जाता है। गुप्तेश्वर पांडे भी ब्राह्मण जाति से आते हैं

उन्हें भी डीजीपी बनाया गया क्या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चुनाव के बाद

ब्राह्मण जाति के व्यक्ति को डीजी बनाना पसंद करेंगे या नहीं यह भी अपने आप में एक

बड़ा सवाल है।

दूसरी तरफ गुप्तेश्वर पांडेय के रिटायर होने के उनके करीबी रहे एडीजी लॉ एंड आर्डर,

अमित कुमार के मुद्दे पर नया मोर्चा भी खुलता दिख रहा है। विभाग के अधिकारी मानते हैं

कि कई अधिकारियों पर कार्रवाई की प्रक्रिया अमित कुमार की निजी रंजिश का परिणाम

था। वह पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय के प्रियपात्र रहे हैं। लेकिन अब सारे समीकरण बदल

चुके हैं। लिहाजा उनकी कार्यशैली से नाराज चल रहे लोगों में कई सीनियर अफसरों को भी

बदला सधाने का मौका मिलने की पूरी उम्मीद है। लेकिन यह सारा कुछ नये डीजीपी के

तय होने पर निर्भर है।

चुनाव के दौरान प्रभारी डीजीपी नहीं चलेगा

वैसे जानकार मानते हैं कि  बिहार में स्थायी तौर पर डीजीपी की पोस्टिंग करनी पड़ेगी

क्योंकि विधानसभा चुनाव के दौरान कई महत्वपूर्ण निर्णय डीजीपी को लेने पड़ते हैं।

इसीलिए प्रभारी डीजीपी एसके सिंघल से जरूरी ही नहीं कि बिहार का विधानसभा चुनाव

सरकार कराएं या फिर स्थायी तौर पर डीजीपी की नई जिम्मेदारी एस के सिंघल को दिए

जाने की बात भी काफी सुर्खियों में है क्योंकि बिहार सरकार से एसके सिंघल के संबंध

मधुर माने जाते हैं।

इसके बीच यह स्पष्ट है कि बिहार पुलिस की अपनी राजनीति अब करवट लेगी। इस

करवट के साथ साथ चुनाव सर पर होने की वजह से कई समीकरण एक दूसरे से गूथे हुए

नजर आ रहे हैं। डीजीपी के पद पर बैठा व्यक्ति चुनाव में कैसी भूमिका निभायेगा, यह भी

बड़ा सवाल बनकर उभरा है क्योंकि चर्चा इस बात की भी है कि वर्तमान प्रभारी डीजीपी श्री

सिंघल मृदुभाषी होने के बाद भी अफसरों की एक लॉबी उनके खिलाफ रही है।

पुलिस महकमे की बात करें तो बिहार में आईपीएस अधिकारी में एडीजी कुंदन कृष्णन का

दबदबा दोबारा बढ़ने की पूरी संभावना है। स्पेशल ब्रांच के एडीजी जितेंद्र सिंह गंगवार

काफी प्रभाव कहीं ना कहीं पुलिस मुख्यालय में ज्यादा बढ़ेगा और सीआईडी के एडीजी

विनय कुमार का भी रोल काफी महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में इन अधिकारियों को

नजरअंदाज कहीं ना कहीं रखा गया था। इसलिए बिहार के चुनाव के अलावा राज्य के

पुलिस महकमे में भी श्री पांडेय के चले जाने के बाद नये डीजीपी के बहाने ही काफी कुछ

उथल पुथल देखने को मिल सकता है।


 

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