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बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी मेरी जिंदगी में हुजूर आप आये

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बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी भाई जी, बहुत बहुत शुक्रिया वरना अब तो हमारे हथियारों में




भी जंग पड़ने लगी थी। कारगिल को छोड़ दें तो 1971 के बाद से हमलोगों ने कोई मोर्चा ही

नहीं संभाला था। जी नहीं मैं कश्मीर को गिनती में नहीं रखता क्योंकि चांदमारी को होती

रहती है। अपने अभ्यास के दौरान भारतीय सैनिक स्थिर निशाने पर गोलियां दागते हैं

और कश्मीर में चलते फिरते निशाना पर अपनी क्षमता जांची जाती है। बात को उत्तरी

सीमा की है। अब तो आपकी तकनीक भी हमारी नजर में साफ हो गयी है। हर बार आप

चार कदम आगे आने के बाद जब हंगामा होता है तो दो कदम पीछे चले जाते हैं। इसी तरह

दो कदम जमीन आपके कब्जे में आ जाती है। लेकिन इसका भी कहीं न कहीं तो अंत होना

ही था। वैसे ही पूरी दुनिया आपसे खार खाये बैठी है। अधिकांश लोगों को लगता है कि

कोरोना वायरस आपकी उपज है। आपको तो अपने यहां दस बीस हजार मर भी जाएं तो

उसकी चिंता नहीं होती। यह तो आपके देश का इतिहास ही कहता है। भले ही आप इस

घटना की चर्चा नहीं करते हों लेकिन ब्रिटिश पुरालेख के मुताबिक शहर के थियानमेन

चौक पर जून, 1989 में लोकतंत्र समर्थकों पर चीनी सेना की कार्रवाई में कम से कम

10,000 आम लोग मारे गए थे। ताज़ा जारी किए गए एक ब्रिटिश ख़ुफिया राजनयिक

दस्तावेज़ में नरसंहार के ब्यौरे दिए गए हैं।

ईमानदारी से अब तो बता दो कितने मारे थे

चीन में तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत एलन डोनाल्ड ने लंदन भेजे गए एक टेलीग्राम में कहा

था, कम से कम 10,000 आम नागरिक मारे गए। घटना के 28 साल से भी ज़्यादा समय

बाद यह दस्तावेज़ सार्वजनिक किया गया। नरसंहार के एक दिन बाद पांच जून, 1989 को

बताई गई संख्या उस समय आम तौर पर बताई गई संख्या से करीब 10 गुना ज़्यादा है।

जून, 1989 के अंत में चीनी सरकार ने कहा था कि क्रांति विरोधी दंगों के दमन में 200

असैन्य मारे गए और दर्जनों पुलिस एवं सेनाकर्मी घायल हो गए। नरसंहार के करीब तीन




दशक बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार इस विषय पर किसी भी तरह के बहस, उल्लेख

वगैरह की मंज़ूरी नहीं देती। पाठ्यपुस्तकों एवं मीडिया में घटना के उल्लेख की मंज़ूरी नहीं

है और इंटरनेट पर इससे जुड़ी सूचना प्रतिबंधित है। विरोध प्रदर्शन अप्रैल 1989 में चीन

की कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव और उदार सुधारवादी हू याओबांग की मौत के बाद

शुरू हुए थे। छात्रों ने उन्हीं की याद में एक मार्च आयोजित किया था। थियानमेन चौक पर

तीन और चार जून, 1989 को सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरू हुए। चीन की पीपल्स

लिबरेशन आर्मी ने प्रदर्शन का निर्दयतापूर्ण दमन करते हुए नरसंहार किया। चीनी सेना ने

बंदूकों और टैंकों के ज़रिये शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे नि:शस्त्र नागरिकों का दमन किया।

इधर बीजिंग में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया था। बाकी देशों को मौत का अफसोस होता

है। इसी वजह से संदेह की सूई आपकी तरफ ही है।

कोरोना को लेकर भी लोग आपको ही कोस रहे हैं

अब आपकी हरकतों ने मुझे फिर से पुरानी फिल्म की गीत की याद दिला दी है। यह इक

मुसाफिर एक हसीना फिल्म का गीत है। इसे लिखा था एस एच बिहारी ने और संगीत में

ढाला था ओपी नैय्यर ने। इस गीत को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने मिलकर गाया

था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी

मेरी ज़िन्दगी में हुज़ूर आप आए

कदम चूम लूँ या ये आँखें बिछा दूँ

करूँ क्या ये मेरी समझ में न आए

बहुत शुक्रिया।।।

करूँ पेश तुमको नज़राना दिल का

नज़राना दिल का

के बन जाए कोई अफ़साना दिल का

खुदा जाने ऐसी सुहानी घड़ी फिर

खुदा जाने ऐसी सुहानी घड़ी फिर

मेरी ज़िन्दगी में पलट के न आए

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी

मेरी ज़िन्दगी में हुज़ूर आप आए

खुशी तो बहुत है, मगर ये भी ग़म है

के ये साथ अपना कदम दो कदम है

मगर ये मुसाफ़िर दुआ माँगता है

मगर ये मुसाफ़िर दुआ माँगता है

खुदा आपसे किसी दिन मिलाए

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी

मेरी ज़िन्दगी में हुज़ूर आप आए

मुझे डर है मुझमें ग़ुरूर आ न जाए

लगूँ झूमने मैं सुरूर आ न जाए

कहीं दिल ये मेरा ये तारीफ़ सुनकर

कहीं दिल ये मेरा ये तारीफ़ सुनकर

तुम्हारा बने और मुझे भूल जाए

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी

मेरी ज़िन्दगी में हुज़ूर आप आए

शायद आप अभी भी 1962 के नशे में जी रहे हैं। हर बार भारत की तरफ से शांति की पहल

को भी आपने बेवकूफी समझ रखा है। इस बार गाड़ी शायद फंस गयी है। मानता हूं कि युद्ध

बुरी बात है लेकिन बार बार पीछे हटना भी समझदारी नहीं। तकलीफ होगी तो एकतरफा

थोड़े ना होगी। आपको भी तो अब के आटा दाल के भाव का पता चलना चाहिए। हो सकता

है कि आपके देश की दिशा और दशा भी इससे बदल ही जाए। पूरे में नहीं तो सही किसी

खास इलाके में ही दो दो हाथ कर लेते हैं।

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