कोलकाता प्रकरण की परत दर परत खुलती राजनीति

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कोलकाता के पुलिस आयुक्त को सीबीआइ के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया गया है।

जाहिर है कि इसका पालन होगा।

लेकिन उसके पहले के तमाम घटनाक्रमों को परत दर परत समझने की भी जरूरत है।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के धरना पर बैठ जाने की वजह से

जो सूचनाएं अंदर ही अंदर दबी रह गयीं, वे अब एक एक कर बाहर आ रही हैं।

पश्चिम बंगाल में जब पहली बार सारडा चिट फंड घोटाला सामने आया था,

उसी वक्त तृणमूल कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं का नाम भी इसमें जुड़ा था।

इनमें से कुछ गिरफ्तार हुए, अस्पताल गये और अब भी न्यायिक हिरासत में हैं।

लेकिन हाल के घटनाक्रमों के दौरान केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने

किसी लाल डायरी और पेन ड्राइव का उल्लेख किया।

इस उल्लेख के सामने आते ही मुख्य अभियुक्त सुदीप सेन का पहले का बयान

सामने आ गया, जिसमें यह बताया गया था कि

किस चैनल के मालिक को सारडा से कितने की आर्थिक मदद की गयी।

सीबीआइ के समक्ष सुदीप के बयान का हवाला देते हुए ममता बनर्जी ने

असम के कद्दावर मंत्री हेमंत विश्व शर्मा पर गोला दाग दिया।

असर यह हुआ कि आनन फानन में हेमंत विश्वशर्मा को यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि

इस मामले से उनका कोई लेना देना नहीं है।

लेकिन इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि

आम जनता का पैसा इस सारदा घोटाला के नाम से दूसरों की जेब में गया है।

इसलिए इस पैसे की वसूली अथवा बरामदगी के लिए सीबीआइ ने

अब तक कौन से कदम उठाये हैं, यह समझने की जरूरत है।

सवाल सिर्फ एक कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार द्वारा सीबीआइ को जांच में सहयोग करने का तो कतई नहीं है।

इस बारे में अनेक ऐसे तथ्य हैं जो यह संकेत देते  हैं कि

दरअसल इस मुद्दे पर सीबीआइ किसी अदृश्य इशारे पर काम कर रही है।

इसी वजह से पर्दे के पीछे के तथ्यों की जब जांच प्रारंभ होती है

तो नई नई जानकारियां सामने आने लगी हैं।

पहली जानकारी यह है कि पूर्व में सीबीआइ के प्रभारी निदेशक रहे

नागेश्वर राव की पुत्री की एक कंपनी पर राजीव कुमार ने ही छापा मारा था।

इसके दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं।

दूसरी बात है कि कोलकाता के पुलिस कमिशनर एडीजी रैंक के अफसर हैं

और उनके कथित पूछताछ के लिए एक डीएसपी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में

40 अधिकारियों का दल उनके आवास पर रविवार को गया था।

इनमें से कुछ को कोलकाता पुलिस के अधिकारियों ने धक्का देकर वहां से बाहर निकाला है।

इससे तय हो गया है कि अब पूरे देश में सीबीआइ को अपनी कार्रवाई में स्थानीय पुलिस के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इसकी नींव पड़ चुकी है।

सारडा घोटाला के साथ सीबीआइ के पूर्व प्रभारी निदेशक श्री राव को कोई रिश्ता हैं भी अथवा नहीं, इसे भी प्रमाणित किया जाना है।

अलबत्ता रविवार के दिन को ही कार्रवाई के लिए क्यों चुना गया, यह तो सीबीआइ को स्पष्ट करना चाहिए।

पूर्व में सीबीआइ की तरफ से सोशल मीडिया में अदृश्य चेहरे यह दावा करते फिर रहे थे कि अदालत के निर्देश पर सीबीआइ ने यह कार्रवाई की है।

लेकिन अगर ऐसी बात होती तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी इसका उल्लेख होता।

अदालत ने इस बारे में सिर्फ इतना कहा है कि राजीव कुमार को सीबीआइ के समक्ष उपस्थित होना है और उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता  है।

लेकिन यह तय है कि उनकी पुत्री की कंपनी में जांच हुई थी और खुद कोलकाता के वर्तमान पुलिस कमिशनर ने यह जांच की थी।

अब इस बात पर भी गौर कर लें कि एक तरफ एक केंद्रीय मंत्री किसी लाल डायरी और पेन ड्राइव का उल्लेख करते हैं

तो दूसरी तरफ मामले का मुख्य अभियुक्त यह स्पष्ट करता है कि उसके पास कोई लाल डायरी अथवा पेन ड्राइव नहीं था।

इसका एक ही निष्कर्ष निकलता है कि अगर वाकई कोई लाल डायरी और पेन ड्राइव है

तो उसमें पैसे के लेनदेन का हिसाब होगा और उसमें कुछ नाम भी होंगे।

इस पेन ड्राइव और लाल डायरी की सूचना केंद्रीय मंत्री तक कैसे पहुंची,

इसे तो खुद श्री जावडेकर ही स्पष्ट कर सकते हैं।

इन तमाम घटनाक्रमों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि

इस पूरे घोटाले में राजनीतिक सहभागिता रही है और वर्तमान विवाद के

दोनों ही पक्ष यानी तृणमूल और भाजपा में इससे लाभ पाने वाले लोग शामिल हैं।

बदले माहौल में बिना किसी भेद भाव के इन तमाम घोटालेबाजों को

एक सिरे से दंडित करने की कार्रवाई होनी चाहिए

क्योंकि हाल के दिनों में वाकई सीबीआइ अपने आंतरिक विवादों की वजह से

अपनी प्रतिष्ठा धूमिल कर चुकी है।

जिसे वापस पाना भी उसकी अपनी जिम्मेदारी बनती है।

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