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अनेक जानवर भी प्राकृतिक तौर पर करते हैं सोशल डिस्टेंसिंग

  • संक्रमण से बचाव के लिए उनका पुराना तरीका

  • टेक्सास विश्वविद्यालय कर रहा है शोध

  • कोलुबस प्रजाति के बंदरों पर अध्ययन

  • मधुमक्खियों की जानकारी पहले से ही है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अनेक जानवर प्राकृतिक तौर पर आपस में एक दूसरे से दूरी बनाकर रखते हैं।

यह माना जा सकता है कि उनमें सोशल डिस्टेंसिंग एक प्रचलित प्रथा है। इसके जरिए वे

एक दूसरे पर हुए वायरस के हमले से समूह को बचाते हैं। बंदरों पर इस विषय पर सबसे

अधिक गहराई से शोध हुआ है। इसी तरह मधुमक्खियों की जीवन पद्धति में भी इस

सोशल डिस्टेंसिंग का पहले से ही पता है। इस बारे मे टेक्सास विश्वविद्यालय (सान

एंटोनियो) के सहायक प्रोफसर इवा विकबर्ग करती हैं कि जानवरों में वायरस का संक्रमण

होने पर वे प्राकृतिक तौर पर जंगल के अंदर कैसे इससे बचाव करते हैं, इसका अध्ययन भी

हमें कोरोना से बचाव के बारे में नई जानकारी दे सकता है। इतना स्पष्ट हो चुका है कि झूंड

में रहने वाले अनेक जानवर इस पर पूरा ध्यान देते हैं। दल के किसी एक प्राणी पर वायरस

अथवा किसी सुक्षाणु का हमला होने की स्थिति में पूरे दल को इसकी जानकारी हो जाती

है। वह पीड़ित प्राणी भी खुद को इस समूह से दूर रखता है। इस दौरान झूंड के अन्य प्राणी

कैसे उसका बचाव करते हैं और पूरे समूह को बचाते हैं, इस पर शोध जारी है।

45 मादा बंदरों के दल पर हुआ है शोध

बंदरों पर वैज्ञानिकों ने यह शोध 45 मादा बंदरों पर का गया है। घाना के दो गांवों में अलग

अलग प्रजाति के बंदरों पर हुए इस शोध के निष्कर्ष भी निकला गये हैं। इससे जुड़े

वैज्ञानिकों ने पाया है कि अलग अलग प्रजाति के बंदरों में आतंरिक संरचना अलग होने की

वजह से उनका आचरण भी अलग होता है। इसकी खास वजह उनकी आंतरिक संरचना में

माइक्रोबॉयोम्स का होना है। समूह में रहने वाले प्राणियों में एक से दूसरे तक संक्रमण

पहुंचता रहता है। इस दौरान उनका आचरण और भोजन पद्धति पर अब शोधकर्ता ध्यान

रख रहे हैं। ताकि यह देखा जा सके कि किस किस्म के संक्रमण के दौरान बंदर कौन सा

पत्ता खाते हैं और उन पत्तों का उसके शरीर के अंदर क्या प्रभाव पड़ता है। इसी तरह

अपने समूह के किसी एक बंदर के वायरस प्रभावित होने की स्थिति में उससे दूरी बनाकर

रहने के बाद भी अन्य बंदर बचाव के लिए कौन सी भोजन पद्धति अपनाते हैं।

वर्तमान में पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए लोगों को एक दूसरे से दूरी

बनाकर रहने की सलाह बार बार दी जा रही है। इसका सीधा मकसद एक व्यक्ति के

संक्रमित होने की स्थिति से उस संक्रमण का दूसरे तक पहुंचने से रोकना है। एक दूसरे के

काफी करीब आने से ही यह संक्रमण फैलता है, इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि पहले ही हो

चुकी है।

अनेक जानवर संक्रमित होते ही खुद दूर हो जाते हैं

दूसरी तरफ यह पहले से पता है कि अनेक जानवर भी ऐसी परिस्थिति आने पर दूरी

बनाकर चलते हैं। जिस पर वायरस का हमला हुआ है वह खुद ही झूंड से थोड़ी दूरी पर रहने

और चलने लगता है। दूसरी तरफ झूंड के अन्य सदस्यों को भी उसके वायरस अथवा

संक्रमण प्रभावित होने की जानकारी मिलने के बाद वे भी इस दूरी को बनाकर चलते हैं।

कोरोना महामारी के प्रकाश में आने के पहले ही मधुमक्खियों पर हुए शोध में यह पता

चला था कि किसी एक मधुमक्खी के संक्रमित होने की स्थिति में वह अपने दल को

जानकारी देकर दूरी बनाकर रहता है। इस दूरी के बाद भी झूंड के अन्य सदस्य बारी बारी

से उनपर नजर रखते हैं। जरूरत पर दूरी बनाकर उसे भोजन तक उपलब्ध करा देते हैं।

कोलुबस प्रजाति के बंदरों पर हुए इस नये शोध के बाद जंगली जानवरों के जरिए कोरोना

से बचाव के तरीके तलाशे जा रहे हैं। क्योंकि यह भी माना जा रहा है कि पैंगोलीन जैसे जीव

से ही यह वायरस इंसानों तक भोजन के जरिए पहुंचा है। वैसी स्थिति में पैंगोलीन के अंदर

कौन सा प्रतिरोधक है अथवा जंगल के अन्य जानवर पैंगोलीन में वायरस होने के बाद भी

कैसे बचे रहते हैं, इसे समझने की कोशिश हो रही है।

सुश्री विकबर्ग मानती हैं कि प्राणियों में यह स्थिति पहले से ही विद्यमान रही है। साथ ही

उन पर वायरस का संक्रमण भी प्राचीन काल से होता आया है। ऐसी स्थिति में जंगली

जानवर ही इससे बचाव कैसे करते हुए अब तक आ पहुंचे हैं, इस गुत्थी को सुलझाना

होगा। इसके माध्यम से वर्तमान की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती कोविड 19 से बचाव का

कोई स्थायी और प्राकृतिक रास्ता भी निकल सकता है।


 

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