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मनातू  गांव के सैकड़ों परिवार बांस  के सामान बेचकर कर रहे जीवनपार्जन

  • मोहसीन आलम

ओरमांझी: मनातू गांव सरकार की मदद के बिना भी आगे बढ़ने के संघर्ष की एक कहानी

है। सरकार भले ही लोगों को रोजगार देने की बात कहती  है लेकिन ग्रामीण कथनी और

करनी में बहुत अंतर देखने को मिलता है। झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों का हाल कोरोना काल

मे बद से बदतर हो गयी है। इसी बिगड़ती परिस्थितियों के बीच ओरमांझी प्रखंड के पांचा

पंचायत अंतर्गत  विस्थापित गांव मनातू  के सैकड़ों परिवार की जिंदगी बांस की टोकरी पर

टिकी हुई है। बांस खरीद कर उनसे टोकरी, हाथ पंखा, खचिया, सूप डाली और शादी के

सामान बनाकर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। इन सामानों को बेचने के लिए बाजार की

व्यवस्था नहीं होने के कारण गांव-गांव घूम घूम कर यह लोग सामान बेचते हैं। बांस से

बनाएं सामान बेचकर ही अपना गुजर-बसर करते हैं। सरकार और प्रशासन से दूर रहने

वाले इन भूमिहीन गरीब लोगों का नाम बीपीएल सूची में अभी तक कुछ- कुछ का नहीं

जोड़ा गया है। लॉकडाउन के कारण शादी विवाह बंद हो जाने के कारण बांस की टोकरी

बनाने वाली ग्रामीण महिलाओं एवं पुरुषों को काफी समस्या उत्पन्न हो गई है। उन्होंने

बताया कि बांस की कीमत अधिक हो जाने के कारण रोजगार में भी इसका व्यापक असर

पड़ रहा है। बांस तो ऊंची कीमत पर खरीद कर लाने के बावजूद बाजार में टोकरी सूप,दउरा

मोनी आदि बांस के सामान का कीमत बाजार में सही तरीका से नहीं मिलने के कारण घर

चलाने में बहुत सारी समस्या उत्पन्न हो रही है। स्थानीय प्रतिनिधि और सरकार के द्वारा

किसी भी प्रकार का कोई भी सहायता नहीं मिलती है। अगर सरकार के द्वारा किसी प्रकार

की सहायता राशि मिलेगी, तो इस रोजगार से कई लोगों को बेहतर रोजगार मिल सकता

है और क्षेत्र में कोई भी बेरोजगार महिला नहीं रहेगी।

मनातू गांव की स्थिति में सुधार के लिए सरकारी मदद जरूरी

ओरमांझी पूर्वी की जिला परिषद सदस्य सरिता देवी ने कहा कि अगर सरकार की ओर से

कुछ राशि सहयोग के रूप में मुहैया कराने से आत्मनिर्भर बन सकते हैं। ओरमांझी प्रखंड

के अति पिछड़ा विस्थापित गांव है। यहां के लोग गरीबी से लगातार जूझ रहे हैं। बांस की

समान बना कर अपना जीवन यापन करने को मजबूर है। इस पर हेमंत सरकार से मांग

करते हैं कि इन लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएं एवं रोजगार से जोड़ा जाए।


 

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