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कोरोना की लड़ाई को राजनीतिक मत बनाइये,योद्धा बयानबाजी से क्षुब्ध भी हैं

कोरोना की लड़ाई में लगे योद्धा यानी स्वास्थ्य कर्मी और पुलिस वाले नेताओं की

बयानबाजी से हैरान होने के साथ साथ क्षुब्ध भी हैं। हाल के कुछ दिनों में इस मुद्दे पर जिस

तरीके से राजनीति हावी हो रही है, उससे असली लड़ाई लड़ने वाले हताश हैं। दरअसल

नेताओं की बयानबाजी से प्रारंभ हुआ यह कुचक्र अब कोरोना के ईलाज एवं विधि व्यवस्था

संभालने में जुटे तमाम लोगों का उत्साह कम कर रहा है। इसके बीच ही गरीबों को दो वक्त

की रोटी का सही तरीके से इंतजाम नहीं होने का मुद्दा भी गंभीर चुनौती बन रहा है। कोरोना

की लड़ाई को अचानक किसी दूसरे मोर्चे की तरफ धकेलने का कोई फायदा फिलहाल तो

नहीं होने वाला है, शायद इस बात का आकलन राजनीति से जुड़े लोग नहीं कर पाये हैं।

आम आदमी का फोकस सिर्फ और सिर्फ बीमारी से बचाव और दो वक्त की रोटी पर है।

इसके अलावा जो कुछ भी कहा सुना जा रहा है, वह आम भारतीय शायद सुनकर भी नहीं

समझ पा रहा है। यह भारतीय राजनीति की बहुत बड़ी बीमारी है कि वह हर मुद्दे पर थोड़ी

देर तक सब्र करने के बाद राजनीतिक लाभ उठाने के तरकीबों पर विचार करने में व्यस्त

हो जाती है। इस बार भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। अन्य इलाकों की चर्चा छोड़ भी दें तो अभी

झारखंड में कोरोना की तैयारियों और हो रहे काम पर बहस के बदले इन तमाम जरूरतों

को पूरा करने के लिए धन कहां से आयेगा उस पर ध्यान देने की जरूरत थी। लेकिन वहां

भी राजनीति की पैठ हो गयी।

परस्पर आरोप का खेल यहां भी गलत मौके पर

भाजपा वाले लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि राज्य सरकार केंद्र द्वारा दिये गये पैसों

का सही इस्तेमाल नहीं कर रही है। दूसरी तरफ राज्य सरकार में शामिल दल यह सवाल

उठा रहे हैं कि केंद्र सरकार ने झारखंड को कोरोना के मद में पैसा क्यों नहीं दिया। जाहिर

सी बात है कि यह केंद्र और राज्य के बीच आवंटित धन का मुद्दा है। यह कोई चोरी छिपे

होने वाला ब्लैक मनी का भुगतान नहीं है। इसलिए दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो

जाएगा कि दोनों पक्षों में से कौन सा पक्ष सही और कौन सा पक्ष गलत बोल रहा है। सोशल

मीडिया के विस्तार की वजह से आम जनता भी इसके सच तो आसानी से समझ सकती

है। ऐसे में निरर्थक मुद्दों पर आरोप प्रत्योरोप लगाने में व्यस्त लोगों को यह उत्तर जनता

को देना चाहिए कि वह अपने स्तर पर क्या कुछ कर रहे हैं, ताकि लोगों का भला हो सके।

भाजपा वालों को परेशानी है कि यहां उनकी सरकार नहीं है और बार बार राज्य सरकार

अब अपने बकाये पैसे का मुद्दा उठाने लगी है। पूर्व में जब भाजपा की सरकार थी तो रघुवर

दास के शासनकाल में कभी भी यह मुद्दा नहीं उठा कि केंद्र ने अनेक मदों में झारखंड को

अपने हिस्से का पैसा नहीं दिया है। अब दस्तावेजी तौर पर यह स्पष्ट हो चुका है कि वाकई

झारखंड को केंद्र से अनेक मदों में पैसा पाना है।

कोरोना की लड़ाई में नेता यह सोचें कि पैसा कहां से आयेगा

लिहाजा भाजपा के नेताओं और खास तौर पर सांसदों को इस बात पर ध्यान केंद्रित करना

चाहिए कि केंद्र से यह बकाया मिले ताकि राज्य में कोरोना के अलावा भी अन्य विकास

कार्य प्रारंभ किये जा सकें। दूसरी तरफ राज्य में सरकार में शामिल कांग्रेस की तरफ से

राहत कार्य चलाये जाने के अलावा बयानबाजी में फिर से वही गलती दोहरायी जा रही है

जो भाजपा के लोग कर रहे हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले

नेता यह भूल रहे हैं कि फिलहाल जनता की प्राथमिकता उनके बयानोंको सुनने समझने

की नहीं है। आम जनता को इस लॉक डाउन से आर्थिक तौर पर कमजोर हो चुका है। छोटे

कारोबारियों के पास नये सिरे से काम को चालू करने और माल जुटाने लायक स्थिति नहीं

है। सरकार ने बैकों की मदद से सभी को मदद करने की बात कही थी। जनधन खाते में पैसे

भी आये हैं। लेकिन इस पैसे से देश की आर्थिक पहिये चालू नहीं हो सकते, इसे सरकार भी

अच्छी तरह जानती है। जो पैसे जनधन खाते में आये हैं, वे भी दो वक्त की रोटी की जुगाड़

में खर्च हो रहे हैं. ऐसे में बयानबाजी में जुटे नेताओँ को इस बात पर विचार करना चाहिए

कि काम प्रारंभ करने के लिए पैसा कहां से आयेगा। यह स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य दोनों

ही सरकारों के पास धन की कमी है। आने वाले दिनों में राजस्व संग्रह की स्थिति में कोई

उल्लेखनीय सुधार भी नहीं होना है। ऐसे में बयानवीरों को अपनी जुबान चलाने के बदले

सरकार और जनता को पैसा कहां से मिले, इस पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

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