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जनता कर्फ्यू में अधिकांश लोग रहे घरों में कैद

  • सुबह से ही सड़कों पर पसरा था सन्नाटा

  • रविवार होने से लोगों ने की थी पूर्व तैयारी

  • चंद उपद्रवियों ने नियम का माखौल उड़ाया

  • पांच प्रतिशत लोगों को डंडे के अनुशासन की जरूरत

संवाददाता

रांचीः जनता कर्फ्यू में लोगों की गंभीरता का परीक्षण भी हो गया। इसकी गंभीरता को

रांची की अधिकांश जनता ने न सिर्फ समझा बल्कि उसका सही तरीके से पालन भी

किया। इस एक पहले से कोरोना के प्रसार को रोकने की दिशा में एक बड़ी पहल हुई।

लेकिन इस दौरान भी कुछ ऐसे तत्व भी सड़कों पर मंडराते नजर आये, जिन्हें सड़क पर

आने अथवा आपस में बैठकर गप हांकने की कोई जरूरत नहीं थी। ऐसे लोगों को शायद

डंडा पड़ने के बाद ही इसकी गंभीरता आने वाले दिनों में समझ में आ जाएगी।

जनता कर्फ्यू का पालन होगा, इसका एहसास तो कल शाम के बाजार से ही हो गया था।

लोग रविवार का दिन होने की वजह से शनिवार की शाम ही घर की जरूरतों का सारा

सामान खरीदते नजर आये थे। इस वजह से आज सुबह से ही शहर की तमाम सड़कों पर

भीड़ नजर नहीं आयी। वैसे भी रविवार का दिन होने की वजह से रांची सड़कें अपेक्षाकृत

वीरान हुआ करती है। लेकिन आज का रविवार कुछ खास अहमियत रखता है, यह रांची

की जनता के आत्मानुशासन से ही साबित हो गया।

शहर के चंद संकरी गलियों को छोड़ दें तो शेष पर भीड़ लगभग नदारत रही। इन तमाम

इलाकों में पुलिस के गश्ती वाहन नजर आये। बड़ा तालाब के पास कहीं से लौटे लोगों के

एक समूह को इसी वजह से पुलिस ने रोका। दरअसल वे भी किसी महानगर से भगाये

जाने के बाद अपने गांव वापस लौटना चाहते थे।

जनता कर्फ्यू में लोगों को आत्म नियंत्रण ही करना था

अब तक घोषित तौर पर कोरोना का एक भी रोगी नहीं पाये जाने के बाद भी रांची की

जनता इस बात की गंभीरता को समझ पायी है, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

वरना इससे पहले सांप्रदायिक हिंसा के दौरान लगने वाले कर्फ्यू के दौरान भी लोगों में

ऐसा अनुशासन कम ही देखने को मिला था। कुछेक इलाकों में अपने घरों की कैद से

भागकर निकले बच्चे सुनसान सड़कों पर क्रिकेट खेलते भी नजर आये। अपने घर के

बाहर दैनंदिन काम काज करती महिलाएं भी नजर आयी। लेकिन जिस कोरोना चक्र को

रोकने के लिए इस जनता कर्फ्यू की अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी, वह मकसद

काफी हद तक पूरा होता नजर आया।

इसके ठीक उलट डंडे का भय नहीं होने की वजह से चंद ऐसे लोग भी सड़कों पर मंडराते

दिखे, जो सिर्फ शहर में तमाशा देखने निकले थे। दरअसल इसके सड़कों पर मंडराने की

कोई जरूरत नहीं थी। कुछेक इलाकों में अपने पास के शराब के ठेकों पर भी नियमित

आने वाले एकत्रित थे। चूंकि ऐसे ठेके मुख्य सड़क पर नहीं होते, इसलिए वहां भीड़ होने

का पता भी बहुत कम लोगों को चल पाया।

अपनी अपनी जरूरत के मुताबिक लोग यदा कदा सड़कों पर निकले लेकिन अपना काम

पूरा कर सीधे घर लौट आये। इससे स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में अगर और

अधिक दिन के इस स्थिति की फिर से नौबत आयी तो रांची शहर इसके लिए मानसिक

तौर पर तैयार है।

भिखारियों के लिए कष्ट का दिन

आम दिनों में लोगों के मांगकर अपना जीवन बसर करने वालों को इस स्थिति से

अवश्य काफी परेशानी हुई। लेकिन अच्छी बात यह है कि शहर के कई इलाकों में ऐसे

असहाय लोगों के लिए भी भोजन का पर्याप्त प्रबंध लोगों द्वारा निजी स्तरों पर किया

गया था। सड़कों पर कई बार बीमारियों को लेकर तेज रफ्तार से गुजरते एंबुलेंस भी

नजर आये। लेकिन रांची ने इन तमाम बातों को मिलाकर यह साबित कर दिया कि

आवश्यकता पड़ने पर वे एक अनुशासित जीवन जीने के लिए मानसिक और शारीरिक

तौर पर पूरी तरह तैयार हैं


 

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