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प्रमुख समाजशास्त्रियों ने रोजगार योजना पर हेमंत सरकार को दिये सुझाव

  • गांव के साथ साथ शहरी मजदूरों पर भी ध्यान दे सरकार

  • सात मुद्दों की तरफ राज्य सरकार को जानकारी दी

  • शहरी इलाके में भी सौ दिन रोजगार हरेक को मिले

  • सारे काम पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न किये जाएं

संवाददाता

रांचीः प्रमुख समाजशास्त्रियों के एक स्वयंसेवी संगठन ने हेमंत सोरेन की सरकार को सात

महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। इस एनजीओ में अरुणा रॉय, अन्ने राजा, जेम्स हेरेंज, ज्यां द्रेज,

निखिल देय, जयंती घोष, अनंदिता अधिकारी, रक्षिता स्वामी, अमित भोंसले, राजेंद्र

नारायण और नचिकेता उडुपा शामिल हैं। हेमंत सरकार को यह सुझाव उनकी तरफ से ही

दिया गया है। यह सभी को पता है कि लॉक डाउन के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से

झारखंड सहित अन्य राज्यों के स्थायी निवासी मजदूर अपने अपने गांव लौट आये हैं। अब

सभी राज्य सरकारों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ऐसे कामगारों को रोजगार उपलब्ध

कराने की है। बरसात के मौसम में खेती में व्यस्त होने वाले मजदूर खेती की अवधि

समाप्त होने के बाद फिर से बिना काम के हो जाएंगे। आम तौर पर हर बार मॉनसून के

दौरान ऐसे मजदूरों का बहुत बड़ा हिस्सा अपने गांव की खेती करने लौट आया करता था।

इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि बाहर से लौटने वाले मजदूरों के हाथ खाली हैं। खुद

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस बाबत लगातार अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं और

तमाम तरह के उपाय करने में जुटे हैं। वापस लौटे प्रवासी मजदूरों को झारखंड में ही

रोजगार देने के लिए सरकार की तरफ से एक योजना चलायी गयी है। नाम है मुख्यमंत्री

श्रमिक योजना। योजना के तहत शहरी इलाकों में मनरेगा के तर्ज पर श्रमिकों को रोजगार

दिया जायेगा। एक साल में 100 दिनों की रोजगार गारंटी ये योजना देती है। प्राइमरी स्तर

पर योजना की शुरूआत हो चुकी है। इसी योजना को लेकर पेग नाम के एनजीओ ने

सरकार को सात तरह के सुझाव दिये हैं।

प्रमुख समाजशास्त्रियों की एनजीओ है पेग

इस पेग एनजीओ ने सरकार से कहा है कि शहरी क्षेत्र में 100 दिन रोजगार का हक वहां के

सभी मजदूरों को मिलना चाहिए। जिनके नाम मनरेगा में हैं, उन्हें भी इस योजना का लाभ

मिलना चाहिए। अगर मनरेगा में इनरोल लोगों को इस योजना से बाहर रखेंगे तो कई

जरूरतमंद मजदूरों को योजना का लाभ नहीं मिल पायेगा। इस योजना में मजदूरी शहरी

क्षेत्र में मिलनेवाली मजदूरी से कम नहीं होना चाहिए। साथ ही मजदूरी को समय-समय

पर रिवाइज्ड भी किया जाना चाहिए। मजदूरों को मजदूरी मिनिमम वेज एक्ट (1948),

सुप्रीम कोर्ट का संजित रॉय बनाम राजस्थान का जजमेंट (1983) और मनरेगा की तरह

पेमेंट आॅफ वेजेज एक्ट (1936) के तहत होनी चाहिए। संविधान के 74वें संशोधन के

मुताबिक इस योजना के तहत अर्बन लोकल बॉडिज को पूरी ताकत देनी चाहिए। इन्हीं के

जिम्मे योजना की पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिए। मजदूरों की सूची बनाने में वार्ड सभा के

साथ-साथ यूएलबी की भूमिका रहनी चाहिए। मनरेगा के ग्राम रोजगार सहायक के तर्ज

पर वार्ड स्तर पर यूएलबी को भी भूमिका दी जानी चाहिए। ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए

जिसमें पढ़े-लिखे और स्किल्ड लोगों को काम दिया जा सके।

कुशल और अकुशल दोनों तरह के कामों का अवसर बने

इसमें सड़क, फुटपाथ और ब्रिज बनाना और मरम्मती का काम, शहर में पार्क से लेकर

जल संचयन तक के काम योजना के तहत होने चाहिए। निगम, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र

के कार्यालयों में काम। बच्चे और दिव्यांगों की देखरेख का काम। प्राइवेट ठेकेदारों की

भूमिका: योजना में निजी ठेकेदारों की भूमिका जितनी कम से कम हो वो बेहतर है।

ठेकेदारों की जगह यूएलबी की भूमिका पर जोर दिया जाना चाहिए। योजना में पारदर्शिता

और दायित्व तय होना चाहिए। ऐसा करने के लिए योजना की सारी जानकारियां पब्लिक

डोमेन में होनी चाहिए। साथ ही योजना का सामाजिक अंकेक्षण भी नियमित तौर पर होना

चाहिए। मनरेगा के सारे नियम और कानून मुख्यमंत्री श्रमिक योजना में भी शामिल होने

चाहिए।


 

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