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महाराष्ट्र की बगावत की आग झारखंड तक आ पहुंची







संवाददाता

रांचीः महाराष्ट्र की बगावत की आग निश्चित तौर पर झारखंड में भी अपना असर

छोड़ रही है। वहां की घटनाओं के बाद अब झारखंड में भी अपेक्षाकृत छोटे दल आजसू ने

भाजपा को औकात बताने का साहस दिखाया। काफी देर विचार विमर्श के बाद पार्टी के

प्रवक्ता द्वारा आजसू के प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी गयी। इसमें कई सीटों पर

भाजपा के साथ सीधी लड़ाई होने का एलान ही है। लेकिन इतना समझा जा सकता है कि

आजसू अध्यक्ष अपनी तरफ से अब भी बात-चीत का दरवाजा खुला रखना चाहते हैं। इसी

वजह से अब तक खुद उन्होंने पार्टी की तरफ से इस सीधी लड़ाई का एलान नहीं किया है।

महाराष्ट्र में जिस तरीके से परिणामों की घोषणा होने के तुरंत बाद शिवसेना ने भी 50-50

के फार्मूले की रट लगा ली थी, वैसी गलती सुदेश ने नहीं की है। लिहाजा यह माना जा

सकता है कि इस समीकरण में सुदेश राजनीतिक तौर पर अधिक परिपक्व साबित हुए हैं।

लेकिन उनकी असली परेशानी अभी बाहर से नहीं पार्टी के अंदर की है।

भाजपा से रिश्ता की डोर तोड़ना नहीं चाहते हैं सुदेश महतो

जहां पार्टी के नेता और समर्थक भाजपा से दो दो हाथ करने को तैयार नजर आ रहे हैं।

इस असंतोष की आग को नियंत्रित करना फिलहाल सुदेश महतो के लिए बहुत बड़ी

चुनौती बन चुकी है। वैसे महाराष्ट्र की इस बगावत के बाद इतना भी तय है कि अन्य

राज्यों में भी छोटे दल अब मौका ताड़कर भाजपा को आंख दिखाने से परहेज नहीं करेंगे।

कुछ ऐसी ही स्थिति अभी से करीब बीस वर्ष पूर्व कांग्रेस के साथ भी घटी थी। कांग्रेस ने

खुद को विशाल पेड़ समझते हुए इन छोटे दलों को नजरअंदाज कर दिया था। नतीजा है

कि अब अधिकांश राज्यो में उसे क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनकर चलना पड़ रहा है।

महाराष्ट्र की बगावत के बाद क्षेत्रीय दलों के तेवर बदले

पार्टी ने अपने स्तर पर अपने प्रादेशिक नेतृत्व को पनपने का मौका नहीं देकर यह स्थिति

खुद पैदा कर ली थी। लिहाजा राज्य के नेतृत्व के सवाल पर क्षेत्रीय दलों के नेता इतनी

तेजी से इस राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर पहुंचे कि कांग्रेस का प्रादेशिक नेतृत्व

इसके मुकाबले ठहर ही नहीं पाया। उदाहरण के तौर पर हम उड़ीसा, पश्चिम बंगाल,

बिहार, उत्तर प्रदेश को देख सकते हैं जहां के चुनाव भारतीय राजनीति को आज भी

प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं। इन राज्यों से कांग्रेस को अब लोकसभा में भी बढ़त

नहीं मिल पाती है।

ऐसी बगावत की आग कांग्रेस के जमाने में भी लगती रही है

इसलिए इस बात को समझा जाना चाहिए कि महाराष्ट्र की बगावत की आग कोई नई

बात नहीं है। सिर्फ यह भाजपा के साथ पहली बार हो रहा है। वैसे इससे पहले उत्तर प्रदेश

में भी हम बसपा और भाजपा के अलग होने की घटनाओं को देख चुके हैं। भारतीय

राजनीति में राजनीतिक समीकरणों के बदलने का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता

है। वैसे पूर्व अनुभवों के आधार पर सिर्फ यह माना जाता है कि चुनाव करीब आने के वक्त

इसमें थोड़ी तेजी अवश्य आती है। जाहिर है कि अब महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में शिवसेना

जैसा पुराना सहयोगी जब सत्ता के लोभ में भाजपा का साथ छोड़ सकता है तो अन्य दल

भी राजनीतिक सत्ता में अपनी हिस्सेदारी की मांग पर आने अपनी आवाज बुलंद करने

वाले हैं। इससे भाजपा को अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के कुनबे को बांधकर रखना

पहले के मुकाबले कठिन चुनौती बन चुकी है। महाराष्ट्र में दूसरी संभावना जो उभर रही है

वह क्षेत्रीय दलों के लिए भी एक सबक है। यह गठबंधन की भावी रणनीति के लिए सभी

दलों को एक सबक है शिवसेना के साथ बात-चीत के बाद भी राज्यपाल द्वारा उन्हें समय

नहीं दिया जाना और एनसीपी को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करना इस सबक का

सबसे अहम हिस्सा है।

आने वाले दिनों में यह गठबंधन की राजनीति का सबक बनेगी

जिस तेजी से शिवसेना ने सरकार बनाने का दावा किया था, उससे अधिक तेजी से

एनसीपी नेता शरद पवार ने उनपर लगाम लगाने का काम किया है। वह प्रारंभ से ही जिस

लीक पर चल रहे थे, उसका वास्तविक अनुभव अब भाजपा और शिवसेना को एक साथ

हो रहा है। कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की उनकी दलील राजनीतिक शतरंज की

इस बिसात पर प्याद की चाल को भी वजीर की चाल बनाती चली जा रही है।

जाहिर है कि आने वाले दिनों में देश के अन्य हिस्सों में सक्रिय क्षेत्रीय दलों को भी इससे

वास्तविक सबक मिले और भारत की भावी राजनीति में गठबंधन तय करने की शर्तों की

नींव महाराष्ट्र की बगावत के बाद प्रारंभ हो। स्पष्ट है कि अब भाजपा हो या कांग्रेस दोनों

ही चुनावी गठबंधन के वक्त देख समझकर शर्त तय करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। दूसरी

तरफ क्षेत्रीय दल भी अब बड़े दलों के साथ होने के मुद्दे पर ठोंक बजाकर ही कोई फैसला

लेंगे। चुनाव लड़ना और सरकार चलाना दोनों अलग अलग बातें हैं। कर्नाटक के बाद

महाराष्ट्र के बगावत से भारतीय राजनीति को कमसे कम यह सबक तो मिल ही चुका है।



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