fbpx Press "Enter" to skip to content

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद अब भी शह और मात का खेल







  • भाजपा दोबारा दावा का नया विकल्प
  • शिवसेना के अंदर फूट की स्थिति में होगा हमला
  • कांग्रेस और एनसीपी को अब भी शिवसेना पर भरोसा नहीं
  • शिवसेना भी भाजपा के अंदर सेंध लगाने की कोशिशों में
रासबिहारी

नईदिल्लीः महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद भी पर्दे के पीछे का खेल

बिल्कुल समाप्त नहीं हुआ है। सभी दल अंदर ही अंदर अपनी गोटी लाल करने की

कोशिशों में जुटे हैं। अलबत्ता अब सारा खेल पर्दे के पीछे चला गया है। इसमें भाजपा को

सबसे अधिक उम्मीद शिवसेना में संभावित फूट को लेकर है। पार्टी के कई नेताओं ने

दिल्ली तक यह सूचना भिजवायी है कि विवाद जारी रहने की स्थिति में शिवसेना के कई

विधायक भाजपा के पाले में आ सकते हैं। शायद इसी फूट का एहसास करते हुए शिवसेना

ने अंतिम समय में अपने विधायकों को एक रिसॉर्ट में एकत्रित कर रखा था।

दूसरी तरफ शिकार किये जाने के भय से कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को राजस्थान

भेज दिया था। इस मामले में एनसीपी मजबूती के साथ अपनी जमीन पर ही खड़ी रही।

अंदरखाने में एनसीपी और कांग्रेस सिर्फ शिवसेना के तेवरों को भांपने का प्रयास कर रही

हैं। दोनों दलों के नेताओं को शिवसेना के अंत अंत तक अपनी बात पर टिके रहने का

भरोसा अब तक नहीं हो पाया है। सरकार के गठन के पूर्व समर्थन की शर्तों पर भी

शिवसेना की तरफ से कोई पहल नहीं होने की वजह से यह गाड़ी बीच में धीमी पड़ गयी

थी। दरअसल इस किस्म की बात-चीत के लिए अगुवा माने जाने वाले शिवसेना के नेता

संजय राउत के अचानक अस्वस्थ होने की वजह से यह काम रूका पड़ा है।

वैसे कांग्रेस के नेताओं ने इस मुद्दे पर नफा नुकसान का पूरा आकलन किया है।

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद सभी एक दूसरे को तौल रहे हैं

इस प्रस्ताव पर कांग्रेस के नेताओं का एक दल सबसे पहले शरद पवार से चर्चा करना

चाहता है। शरद पवार से इन मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट कर उनकी राय जान लेने के बाद ही

कांग्रेस अपने पत्ते खोलना चाहती है। साथ ही कांग्रेस को अपनी राष्ट्रीय छवि को

शिवसेना के साथ जाने से नुकसान का अंदाजा भी करना है। पार्टी का एक धड़ा वहां इस

किस्म के गठबंधन से पार्टी को होने वाले नुकसान के बारे में पहले ही आलाकमान को

बता चुका है।

कांग्रेस पहले से ही अपने गठबंधन की बड़ी पार्टी के कद्दावर नेता शरद पवार की सहमति

के बिना आगे नहीं बढ़ना चाहती। इसके पीछे महाराष्ट्र के बहाने पूरे देश में यूपीए

गठबंधन की मजबूती को नया बल प्रदान करने की रणनीति भी काम कर रही है। वैसे इस

राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला लागू होते ही कांग्रेस के विधायक वापस लौट आये हैं।

इन विधायकों से मल्लिकार्जुन खडगे खुद संपर्क साधकर चल रहे हैं। इस घटनाक्रम के

बाद यह स्पष्ट है कि कांग्रेस को अब भी भाजपा के शिकार का भय है। इसके पहले भी कई

अवसरों पर भाजपा ने अन्य दलों के विधायकों को तोड़कर कांग्रेस के लिए बड़ी परेशानी

खड़ी कर दी थी। इस बार महाराष्ट्र में शरद पवार की पहली चाल की वजह से भाजपा इस

राजनीतिक दंगल का पहला दौर हार गयी है। उसके बाद पार्टी के अन्य दिग्गज संभलकर

फिर से घेराबंदी करने में जुट गये हैं। उन्हें उम्मीद है कि शिवसेना के अलावा भी अन्य

दलों के विधायकों को निकट भविष्य में अपने पाले में करने में सफलता मिलने पर

भाजपा को वहां सरकार के गठन के लायक संख्या बल हासिल हो जाएगा।

उसके लिए निर्दलीय एवं अन्य विधायकों को मिलाकर 29 विधायकों का समर्थन हासिल

करना कठिन काम नहीं होगा।

विधानसभा में दलगत स्थिति इस प्रकार है

पार्टी
2019
2014
भाजपा
105
122
शिवसेना
56
63
एनसीपी
54
41
कांग्रेस
44
42
अन्य
16
13
निर्दलीय
13
07


Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

One Comment

Leave a Reply