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महाराष्ट्र की राजनीति किसी रहस्य फिल्म से कम नहीं







महाराष्ट्र की राजनीति शायद रैमसे ब्रदर्स की फिल्मों से भी ज्यादा आकर्षित बनती चली जा रही है।

इसमें किस मोड़ पर क्या होगा, इसका आकलन कर पाना कठिन हो रहा है।

लगातार इस राजनीतिक परिदृश्य की परिस्थितियां बदल रही हैं।

लिहाजा यह समझ पाना कठिन होता जा रहा है कि अगले पल में यहां क्या कुछ होने वाला है।

महाराष्ट्र में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में साफ हो गया था कि राजग गठबंधन बड़े आराम से बहुमत का आंकड़ा पाने जा रही है।

इस पर भाजपा विरोधियों को भले ही आपत्ति हो लेकिन आम जनता का बहुमत अपनी कसौटी पर भी इस सूचना को परख लेने के बाद संतुष्ट था।

चुनाव परिणाम भी लगभग वैसे ही आये।

सिर्फ यह स्पष्ट हुआ कि भाजपा और शिवसेना के मुकाबले एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन ने थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया है।

उनक सीटें बढ़ीं लेकिन तब भी यही स्पष्ट था कि भाजपा और शिवसेना मिलकर ही सरकार बनाने जा रही हैं।

पहले से ही यह घोषणा भाजपा की तरफ से कर दी गयी थी कि उनकी तरफ से देवेंद्र फडणवीस ही

मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे।

सब कुछ निपट जाने के बाद अचानक इस फिल्म में रोमांचक मोड़ तब आया जब शिवसेना

पचास-पचास के फार्मूले पर अड़ने लगी।

प्रारंभ में तो यह सामान्य किस्म का राजनीतिक हथकंडा माना गया था,

जिसकी मांग कर मंत्रिमंडल में अधिक महत्व हासिल करना ही असली मकसक होता है।

एक कहावत है कि अगर पिस्तौल का लाईसेंस चाहिए तो तोप के लिए आवेदन दिया जाना चाहिए।

शिवसेना की मांग को भी कुछ इसी तरीके का समझा गया था।

लेकिन दो दिन के बाद ही माहौल बिगड़ता हुआ नजर आने लगा।

दरअसल शिवसेना के राज्य सभा सांसद संजय राउत और एनसीपी नेता शरद पवार की

मुलाकात के बाद ही अंदरखाने में कुछ और ही खिचड़ी पकने का संदेह हुआ था।

महाराष्ट्र की राजनीति में अलग खिचड़ी का संकेत मिला था

इससे राजनीतिक फिल्म की कहानी में मोड़ आ गया।

यानी दूसरे शब्दों में कहें को राजनीति की इस फिल्म में आगे क्या होगा, यह तय कर पाना कठिन हो गया।

तब तक ऐसा महसूस हो रहा था कि सिर्फ सौदेबाजी के लिए शिवसेना ने संजय राउत को शरद पवार के पास भेजा है।

इसका मकसद भाजपा को दबाव में लाना भर है।

लेकिन जैसे जैसे दन बीते दोनों के रिश्तों में कटूता आती गयी और यह विवाद सार्वजनिक भी होता चला गया।

शिवसेना ने अपनी तरफ से आधा समय के लिए अपने मुख्यमंत्री का नाम आगे बढ़ाया।

भाजपा के इंकार करने के बाद दोनों की दोस्ती में दरार पड़ता हुआ नजर आया।

जबकि खुद देवेंद्र फडणवीस का यह कहना कि दोनों के बीच 50-50 के फार्मूले पर ऐसी कोई बात भी नहीं हुई थी।

फडणवीस के इस बयान के बाद अचानक और अप्रत्याशित तौर पर दो सहयोगियों के बीच खुला युद्ध का एलान हो गया।

इस वजह से महाराष्ट्र की राजनीति अचानक से शरद पवार के नियंत्रण में चली गयी।

इसके पहले तक खुद शरद पवार यही कह रहे थे कि उन्हें जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है।

इसलिए वह और चुनाव में उसके गठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस के विधायक विपक्ष में ही रहेंगे।

अचानक से शिवसेना और भाजपा के रिश्ते तल्ख क्या हुए, पूरा खेल ही मराठा क्षत्रप शरद पवार के नियंत्रण में आ गया।

इस दौरान शरद पवार ने एक सुलझे हुए नेता की तरह अपने गठबंधन के सहयोगी कांग्रेस से हर फैसले के पहले विचार किया।

जिसका नतीजा हुआ कि तीन दलों की बैठक के एक दिन पहले सरकार बनाने की जिम्मेदारी

जब उन्होंने भाजपा और शिवसेना पर टाली तो सारी प्रतिकूल परिस्थितियां उनके अनुकूल होती चली गयी।

तीनों दलों ने मिलकर तय किया कि उद्धव मुख्यमंत्री बनेंगे

तीनों दलों ने मिलकर यह तय किया कि शिवसेना के नेतृत्व में सरकार बनेगी, जिसके मुखिया उद्धव ठाकरे होंगे।

इस एलान के बाद लगा था कि फिल्म अब अंतिम सीन तक पहुंच चुकी है।

लेकिन रात के अंधेरे में अमित शाह का दांव ऐसा लगा कि सारी परिस्थितियां ही बदल गयी।

लोग सुबह के समाचारपत्रो में जब उद्धव ठाकरे को इस तालमेल के तहत मुख्यमंत्री बनाये जाने की खबर पढ़ रहे थे तो टीवी पर देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी के अजीत पवार के शपथ ग्रहण समारो ही खबरें चलने लगी।

लेकिन उसके बाद भी फिल्म की कहानी में अगला ट्विस्ट शरद पवार ने दिया।

उन्होंने अपने दल के विधायकों की आनन फानन में बैठक बुलायी।

इस बैठक में ही स्पष्ट हो गया कि विधायकों के अधिकांश अब भी शरद पवार के ही विश्वासपात्र हैं।

ऐसे में प्रस्ताव पारित कर अजीत पवार को पार्टी के विधायक दल के नेता पद से हटा दिया गया।

इससे कहानी में फिर से नया मोड़ आ चुका है।

सर्वोच्च न्यायालय मे सुनवाई के बाद अंतिम फैसला तो सदन के अंदर ही होना है।

इसलिए माना जा सकता है कि सदन में बहुमत सिद्ध होने तक यह खेल रोचक बना रहेगा।



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