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आजाद भारत में फिर से महाजनी प्रथा लागू नहीं होने देंगेः सुप्रियो भट्टाचार्य

रांचीः आजाद भारत में दोबारा से महाजनी प्रथा लागू नहीं होने दिया जाएगा। आज

झामुमो केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देशानुसार झामुमो राँची जिलाध्यक्ष मुस्ताक आलम के

नेतृत्व में किसान विरोधी केंद्र सरकार की कृषि विधेयक, 2020 के विरोध में जिला

मुख्यालय में घेराव – प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम का संचालन जिला सचिव डॉ हेमलाल

कुमार मेहता हेमू ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित झामुमो के

केन्द्रीय महासचिव सह प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते

हुए कहा कि केन्द्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों को झामुमो कभी लागू नहीं होने

देगा। यह पार्टी ही आन्दोलन का उपज है। आजाद भारत में फिर से महाजनी प्रथा लागू

नहीं होने दिया जाएगा। धरना – प्रदर्शन के बाद सुप्रियो भट्टाचार्य के नेतृत्व में भारत के

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नाम राँची के उपायुक्त छवि रंजन को एक ज्ञापन सौंपा

गया। प्रतिनिधि मंडल में मुशताक आलम, डा महुआ माजी, समनुर मंसुरी, जिला सचिव

डॉ हेमलाल कुमार मेहता एवं अश्विनी शर्मा शामिल थे। ज्ञापन के द्वारा मांग किया गया

कि विगत दिनों भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा “आवश्यक वस्तु (संशोधन)

विधेयक, 2020″, “कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक

2020″ एवं “मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा

बिल, 2020″ (कृषि विधेयक 2020) संसद से बिना बहस के जबरन पारित करवाया गया।

कृषि विधेयक पूर्व में किसानों एवं आम जानों के हित को देखते हुए लागू किये गए थे।

आजाद भारत में केंद्र सरकार पूंजीपतियों के गुलाम जैसी

परन्तु वर्तमान संसोधन विधेयक के पारित होने के पश्चात इसका सीधा लाभ पूंजीपतियों

एवं बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को मिलना तय हो गया है, देश के बाजारों में काला बाज़ारी

करने की खुली छूट दे दी गई है, इसके साथ ही भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का

किसान एवं मजदूर विरोधी चरित्र उजागर हो गया है। केंद्र सरकार, देश के गरीब किसान-

मजदूर एवं आम जनों के खिलाफ षडयंत्र रच कर देश की ‘हरित क्रांति’ को हराने की

साजिश कर रही है। बहुमत के आधार पर निरंकुश मोदी सरकार ने कृषि विधेयक, 2020

को संसद में बगैर किसी चर्चा व विचार विमर्श के जबरन पारित कर लिया है। यहां तक कि

राज्यसभा में संसदीय प्रणाली व प्रजातंत्र को तार-तार कर ये काले कानून पारित किए

गए। अनाज मंडी-सब्जी मंडी को खत्म करने से ‘कृषि उपज खरीद व्यवस्था’ पूरी तरह

नष्ट हो जाएगी। ऐसे में किसानों को न तो ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) मिलेगा और

न ही बाजार भाव के अनुसार फसल की कीमत। किसान की फसल को दलाल औने-पौने

दामों पर खरीदकर दूसरे प्रांतों की मंडियों में मुनाफा कमा ऊंचे दामों में बेच देते हैं। अगर

पूरे देश की कृषि उपज मंडी व्यवस्था ही खत्म हो गई, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान

किसान-खेत मजदूर को होगा और सबसे बड़ा फायदा मुट्ठीभर पूंजीपति वर्ग को। मंडी

प्रणाली नष्ट होते ही सीधा प्रहार स्वाभाविक तौर से किसान पर ही होगा। मंडियां खत्म

होते ही अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों-करोड़ों मजदूरों, आढ़तियों, मुनीम,

ढुलाईदारों, ट्रांसपोर्टरों आदि की रोजी रोटी और आजीविका अपने आप खत्म हो जाएगी।

मंडी में पूर्व निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) किसान की फसल के मूल्य

निर्धारण का बेंचमार्क है। यही एक मात्र उपाय है, जिससे किसान की उपज का मूल्य

निर्धारण हो पाता है।

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