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महागंठबंधन की स्थिति सुधरी लेकिन बढ़त में नीतीश कुमार

  • राजग में पहली बार भाजपा को मिली बढ़त

  • कोरना गाइड लाइन के तहत धीमी गिनती

  • शुरु से ही जारी है उलट फेर का सिलसिला

  • कांग्रेस को अधिक सीट देने का नुकसान

राष्ट्रीय खबर

पटनाः महागंठबंधन के बेहतर प्रदर्शन के बाद भी एक्जिट पोल के अनुमान चुनाव नतीजों

से मेल नहीं खा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव का परिदृश्य साफ नहीं हो पाया है।

दरअसल प्रारंभ से ही वोटों की गिनती धीमी गति से चलने की वह से चुनाव परिणाम भी

देर से आ रहे हैं। इस बीच मतों की बढ़त में उतार चढ़ाव का दौर भी जारी है। लेकिन अब

तक के परिणाम और बढ़त के आधार पर ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अंततः

नीतीश के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के हाथ ही बाजी रहेगी। अलबत्ता यह

अवश्य दिख रहा है कि जदयू के मुकाबले इस बार भाजपा यहां बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

इसकी एक वजह चिराग पासवान के नेतृत्व में लोजपा का नीतीश कुमार और उनकी पार्टी

का विरोध भी है। इस बार के चुनाव परिणामों में वोटों का अंतर इतना कम है कि अब तक

कई बार उलटफेर हो चुके हैं। लिहाजा मतों की गणना के पूर्व जारी एक्जिट पोल के 

अनुमान भी अब त सही साबित नहीं हो पाये हैं। इसके बाद भी इतना माना जा सकता है

कि महागंठबंधन ने भी अपनी स्थिति में जबर्दस्त सुधार किया है। वैसे चुनाव आयोग ने

इस बारे में पहले ही हिदायत दे रखी है कि कोरोना गाइड लाइन को ध्यान में रखते हुए

मतों की गिनती में कोई जल्दबाजी नहीं की जाए।

महागंठबंधन को नीतीश के साथ साथ मोदी से भी जूझना पड़ा

लगातार पंद्रह वर्षों तक बिहार पर शासन करने वाले नीतीश कुमार के बारे में भाजपा

नेतृत्व ने पहले ही स्पष्ट कर रखा है कि बिहार में राजग का चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा

जा रहा है। इसलिए अंदरखाने की सुगबुगाहट के बाद भी इस स्थिति में कोई सुधार होगा,

इसकी उम्मीद नहीं है। लेकिन पहली बार जदयू के मुकाबले भाजपा के अधिक सीट जीतने

की वजह से नीतीश कुमार भी अगली सरकार में दबाव में रहेंगे, यह भी तय हो गया है।

तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागंठबंधन ने भी जबर्दस्त प्रदर्शन किया है, इस पर किसी

को शक नहीं है। कई सीटों के परिणामों के आधार पर यह भी माना जा सकता है। इस

विरोधी खेमा के जबर्दस्त चुनाव प्रचार की वजह से ही खुद नरेंद्र मोदी को भी बिहार के

मोर्चे पर सीधे उतरना पड़ा था। इस चुनाव में यह संकेत भी स्पष्ट हो रहे हैं कि कई स्थानों

पर जातिगत गोलबंदी के विरोध में भी गोलबंदी हुई है। खास कर सीमांचल इलाके में

भाजपा को मिली सफलता इसके प्रमाण हैं। कुछ लोग मानते हैं कि नीतीश कुमार की

शराबबंदी का फैसला भी महिला वोटरों को राजग के पक्ष में रखने में महत्वपूर्ण विषय रहा

है। दूसरी तरफ तेजस्वी द्वारा कांग्रेस को इस बार के चुनाव में 70 सीट देने का फैसला

फिर से आलोचनाओं के घेरे में आया है। कांग्रेस का इस बार का प्रदर्शन उम्मीद से काफी

पीछे रहा है।

विजेता का फैसला स्पष्ट नहीं लेकिन पलड़ा राजग के पक्ष में

विजेता का स्पष्ट फैसला अब तक नहीं होने के बाद भी मतदान का पलड़ा फिलहाल तो

राजग के पक्ष में ही है। यह अलग बात है कि पूर्ण बहुमत वाली उसकी बढ़त अभी कम हो

चुकी है। इसी वजह से यह चुनाव अब भी कांटे की टक्कर जैसी स्थिति में है। राजद के

प्रत्याशी अब भी टक्कर में होने के बाद भी यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कांग्रेस का प्रदर्शन

भी महागंठबंधन की कम सीटों का एक बहुत बड़ा कारण बन रहा है।

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