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लोकायुक्त के बाहरी एजेंसी की जांच से सहमे हैं कई लोग

संवाददाता

रांचीः लोकायुक्त के बाहरी एजेंसियों से शिकायतों की जांच कराने का फैसला सरकार के

अंदर और बाहर बेचैनी पैदा करने वाला साबित हो रहा है। पहले लोकायुक्त ने अपने यहां

आये मामलों की जांच के लिए आगे की कार्रवाई के लिए उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के

पास भेज दिया था। वहां यह आदेश पहुंचते ही राज्य सरकार की तरफ से एसीबी को यह

निर्देश जारी किया गया कि बिना सरकार की स्वीकृति के किसी भी मामले में अभियुक्त

अफसरों पर मामला दर्ज नहीं किया जाए। इससे साफ हो गया था कि सरकार भ्रष्टाचार के

वैसे मामलों में तेजी से आगे नहीं बढ़ना चाहती, जिनमें राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो

सकती हो। लेकिन इस फैसले के तुरंत बाद अपना काम आगे बढ़ाते हुए लोकायुक्त

कार्यालय ने इन्हीं मामलों की जांच बाहरी एजेंसियों से कराने का एलान कर सभी की जान

सांसत में डाल दी है। यह बात सभी की जानकारी में है कि लोकायुक्त के यहां बड़े अफसरों

के अनेक संवेदनशील मामले पहले से ही शिकायत के तौर पर दर्ज हैं। इनमें से कई

अफसर ऐसे भी हैं, जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं और कुछ के बारे में सबको पता है कि वे पूर्व

की रघुवर दास सरकार के खास लोग थे। लेकिन हेमंत सोरेन की सरकार इस मामले में भी

फूंक फूंक कर कदम रखना चाहती है। जानकार मानते हैं कि दरअसल हेमंत सोरेन अपने

माथे पर यह आरोप नहीं लेना चाहते कि उनकी सरकार बदले की भावना से कार्रवाई कर

रही है। फिर भी लोकायुक्त द्वारा बाहरी एजेंसियों से ही मामलों की जांच कराने के फैसले

से वर्तमान सरकार को भी असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

लोकायुक्त के दायरे में कई संवेदनशील मामले

ठेका, पट्टा, बड़े टेंडर और विभागीय नीतिगत फैसलों से संबंधित कई अत्यंत संवेदनशील

मामलों की शिकायत पहले ही लोकायुक्त के यहां की गयी थी। समझा जाता है कि

प्रथमदृष्टया इन मामलों की गंभीरता को समझ लेने के बाद ही उन्हें जांच के साथ

प्राथमिकी दर्ज करने के लिए एसीबी को भेजा गया था। वैसे बाहरी एजेंसियों को झारखंड

की भौगोलिक सीमा में जांच के मामले में कानूनी अड़चन भी पैदा हो सकते हैं। लेकिन

परिणाम चाहे कुछ भी हो, इस बाहरी एजेंसी से जांच की चर्चा से कई चेहरों पर हवाइयां

उड़ने लगी है


 

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