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टिड्डी संकट के बारे में वैज्ञानिक नजरिए से पाकिस्तान को तौलिए

  • पाकिस्तान ने भारत की मदद लेने के किया था इंकार

  • सभी जानते हैं कि यह प्राणी छह महीने में बढ़ते हैं

  • किसान अभी से ही खेती की तैयारी करते हैं

  • हर बार बीस गुणा बढ़ते हैं ये जीव

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः टिड्डी संकट भी देश के लिए कोरोना के साथ साथ एक नई परेशानी का सबब बन

का है। धीरे धीरे यह कीट पूरे देश में फैल रहा है। यह एक गंभीर चिंतन का विषय है। पूरे

देश की क्या कहें पूरी दुनिया का ध्यान अभी कोरोना वायरस की तरफ है। इसलिए हम इस

वैश्विक संकट के काल में अपनी परेशानियों की वजह से शायद उन चीजों पर ध्यान नहीं दे

पा रहे हैं, जो किसी दूसरे किस्म की आशंकाओं को जन्म देती है।

वीडियो के जरिए समझिये इस असली टिड्डी संकट को

कोरोना को अलग कर सोचें तो अभी देश की सबसे नई चुनौती देश में पाकिस्तान के रास्ते

से हुए टिड्डी का हमला है। राजस्थान की सीमा से आगे बढ़ते हुए यह टिड्डी अब देश के

अन्य भागों की तरफ फैल रहे हैं। सरकार की तरफ से जो इंतजाम किये जा सकते हैं, उसके

साथ साथ खास तौर पर किसानों और अन्य लोगों को इसके प्रति ध्यान देने और टिड्डियों

के दल को भगाने में सक्रिय भूमिका निभाने की बार बार अपील की जा रही है। इसी वजह

से इस टिड्डी संकट को अब दूसरे नजरिए से भी देखने की जरूरत है।

इस विषय पर एक रोचक फिक्शन फिल्म भी बनी थी

इस टिड्डी पर एक फिल्म भी बनी थी। इस फिल्म में एक लड़की टिड्डियों पर नियंत्रण

करना जानती थी। उस पर हमला करने वालों के खिलाफ वह टिड्डियों को हमला करने का

आदेश देती है। चंद मिनटों में सारे दुश्मन धराशायी होते हैं, बाकी भाग जाते हैं। सब कुछ

सामान्य होने के बाद वही लड़की इशारों ही इशारों में टिड्डियों को चले जाने का संकेत देती

है। यह संकेत पाते ही सारी टिड्डियां फिर से वापस चली जाती हैं और आसमान पर छाया

अंधेरा समाप्त होकर धूप निकल आती है।

यह निश्चित तौर पर एक काल्पनिक फिल्म थी लेकिन सिर्फ इस एक फिल्म की चर्चा से

वह बात सामने नहीं आती, जो इस लघु फिल्म के असली तथ्य को सामने लाती हो।

दुनिया में कई युद्ध इसकी बदौलत जीते गये हैं

इतिहास इस बात की गवाही देता है कि प्राचीन काल में अनेक युद्ध इसी टिड्डी के बल पर

जीते गये हैं। संक्षेप में कहें तो अपने जंगल के इलाकों में टिड्डी दल के होने की सूचना के

साथ साथ जब किसी दूसरे देश अथवा राजा का हमला होता था, जो टिड्डी की जानकारी

रखने वाला देश पीछे हटता चला जाता था। उसके पीछे हटते जाने की वजह से

आक्रमणकारी सेना आगे बढ़ती जाती थी। इस सैन्य दल के आगे बढ़ने के क्रम में वे अपने

लिए रसद का इंतजाम भी करते जाते थे। काफी दूर निकल जाने के बाद किसी घुड़सवार

को भेजकर उस जंगल में आग लगाने की सूचना दी जाती है, जहां टिड्डी बैठे होते हैं। आग

लगाने में इस बात का ख्याल रखा जाता था कि किस ओर से आग लगानी है ताकि टिड्डी

दल उस रास्ते पर आगे बढ़े, जहां आक्रमणकारी सेना की सप्लाई लाइन है। जब इन

टिड्डियों का हमला होता था तो करोड़ों की संख्या में टिड्डी अपने रास्ते में पड़ने वाले सब

कुछ चट कर जाते थे। नतीजा होता था कि हमला करने वाली सेना के रसद खत्म हो जाते

थे। दूसरी तरफ इसी मौके की ताक में लगातार पीछे हटने वाली सेना तब जाकर हमला

करती थी। रसद और अपनी सप्लाई लाइन टिड्डी के हाथों गवां चुकी सेना के हार जाने के

अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता था। यह ऐतिहासिक तथ्य है, जिसे लैटिन अमेरिका

और अफ्रीका के इलाकों में अनेकों बार दोहराया गया है।

हम इतिहास इसीलिए पढ़ते हैं ताकि भूतकाल की घटनाओं से सबक लेते हुए हम भविष्य

की तैयारियां कर सकें। इसलिए टिड्डी दल के आने और पूरे देश के लिए नये संकट के तौर

पर मंडराने के घटनाक्रम को भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।

टिड्डी संकट को भारत तक पहुंचान में कौन जिम्मेदारयुद्ध जैसी तैयारी के हालात भारत और पाकिस्तान सीमा पर

पाकिस्तान में ईरान के रास्ते जब टिड्डी दल पहुंचा तो भारत की तरफ से उन्हें वहीं

समाप्त करने के लिए कीटनाशक उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन

पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि उसके पास चीन के

दिये हुए एक लाख बत्तख हैं। जिससे यह काम वह कर सकेगा। वाकई चीन से एक लाख

बत्तख आये। लेकिन अब के घटनाक्रम यह साबित कर देते हैं कि पाकिस्तान का यह

आश्वासन झूठा साबित हुआ है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों के इतिहास से हम इस

पूरे घटनाक्रम पर विचार कर सकते हैं। वैज्ञानिक कसौटी पर इस पूरे घटनाक्रम को परखने

की कोशिश से हमें नई रोशनी मिलती दिख जाती है।

मादा टिड्डी को अपने अंडों को बाहर लाने के लिए सही जगह और मौसम की तलाश रहती

है। किसी नमी और गर्मी वाले जगह पर वह एक साथ 50 से 100 तक अंडे देती है। वह एक

बार में चार ऐसे समूहों में अंडे देती है। कई बार इसके अपवाद भी दर्ज किये गये हैं। अंडा

देने के बाद वह अपने ही शरीर के एक चिपचिपा पदार्थ से उसे मिट्टी के अंदर ढंक देती है।

यह चिपचिपा पदार्थ उन अंडों की हिफाजत करता है और उन्हें नमी भी प्रदान करता है।

इस अवस्था में रहने के बाद दो सप्ताह के बाद अंडों से बच्चों का निकलने का क्रम प्रारंभ

होता है।

एक दिन में अपने वजन के बराबर खाता है यह जीव

वैज्ञानिक रिकार्ड में यह दस से 65 दिन का होता है। इसके बाद बच्चों के पूर्ण विकसित

होने में तीस से चालीस दिन लगते हैं। वहां से तीन सप्ताह के बाद ऐसे बच्चे पूरी तरह

वयस्क हो जाते हैं और खुद ही वंश वृद्धि कर सकते हैं। यह क्रम नौ महीने तक का चल

सकता है। यानी टिड्डी के अंडे से पूर्ण वयस्क टिड्डी बनने तक करीब साढ़े पांच माह का

वक्त लगता है। अब वर्तमान तिथि से अगर पीछे की तरफ देखें तो इन साढ़े पांच महीनों

का वक्त दिसंबर का माह था। इस दौरान दुनिया में कोरोना का आतंक नहीं फैला था।

दुनिया के कई हिस्सों में अचानक से टिड्डी की तादाद बढ़ने की खबरें जरूर आ रही थी।

इनमें पाकिस्तान के अलावा अफ्रीका के देश भी शामिल थे।

अंडों से बाहर आने के बाद जब बच्चे बड़े होने लगते हं तो वे उड़ नहीं सकते। इस दौरान वह

उछल उछलकर आगे बढ़ते हैं। रिकार्ड में यह बात दर्ज है कि इस किस्म के बच्चों की

कतारबद्ध फौज की लंबाई दस किलोमीटर तक हो सकती है। उड़ने में सक्षम नहीं होने के

बाद भी उछलते हुए आगे बढ़ते बच्चे जिस इलाके से आगे बढ़ते हैं, वहां कुछ बचा नहीं रह

सकता।

अब भारतीय नजरिये से देखें तो मई के मध्य से ही किसान आने वाली बरसात को देखते

हुए खेतों को तैयार करना प्रारंभ कर देते हैं। अब इसी दौर के बीच टिड्डी का हमला होने से

खेतों में लगी फसल के साथ साथ आस पास की हरियाली पूरी तरह समाप्त हो रही है। तो

क्या पाकिस्तान ने बड़ी सोच समझकर अपने यहां टिड्डियों की आबादी को भारत की

मदद से खत्म करने का काम ही नहीं किया। सिर्फ चीन से मिले एक लाख बत्तखों की

मदद से वह अपने इलाके को सुरक्षित करता रहा।

एक झूंड के बच्चे अगली पीढ़ी बीस गुणा बड़ा बनाते हैं

टिड्डियों के जीवन चक्र की जानकारी रखने वाले वैज्ञानिक पहले ही बता चुके हैं कि अभी

अगर टिड्डी दल की कुल संख्या एक करोड़ है तो अगली पीढ़ी इसे कमसे कम बीस करोड़

बना देगी। जी हां मैं मानता हूं कि यह भी एक किस्म का छाया युद्ध ही है, जिसमें भारतीय

अर्थव्यवस्था को टिड्डी के हमले से फिर से नष्ट करने की साजिश रची जा रही है।

भारतीय सीमा में आने वाले टिड्डी बच्चे से बड़े हो रहे हैं। पूर्ण विकसित होन के बाद वे

करीब दस सप्ताह तक जीवित रहते हैं। इस दौरान अंडे देने के क्रम में वे अपने भोजन के

लिए इलाकों की सारी हरियाली को चट करते जाते हैं। अब यह आप सोचिये कि जो मैं कह

रहा हैं वह वैज्ञानिक कसौटी पर सही है अथवा नहीं।


 

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