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लॉकडाउन से वाकई कम हो गयी धरती पर इंसानी हलचल

  • पृथ्वी के अंदर पड़ने वाला बोझ बहुत कम हुआ है

  • इससे पहले कभी भी ऐसी विकट परिस्थिति नहीं बनी

  • भूकंप के आंकडों को दर्ज और विश्लेषित किया जा रहा

  • वैज्ञानिक महसूस कर रहे हैं कि इस कंपनी की कमी को

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः लॉकडाउन से व्यापारिक तौर पर भले ही हमलोगों का बहुत नुकसान हुआ हो

लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इसकी वजह से उत्पन्न परिस्थितियों ने फायदा भी दिया है।

अन्य मुद्दों की चर्चा बाद में करें तब भी यह पाया गया है कि धरती पर जितने किस्म की

इंसानी हलचल से परेशानी थी, वह वाकई कम हो चुकी है। पृथ्वी का स्पंदन कम हुआ है

और उसका सीधा निष्कर्ष यह भी है कि पहले की वह सारी हलचल इंसानी गतिविधियों की

वजह से थी। मानवों पर लगी रोक की वजह से इस बदलाव से पृथ्वी को खुद को संभालने

का वक्त भी मिला है।

पिछले गुरुवार को इस बारे में एक रिपोर्ट जारी की गयी है। इस रिपोर्ट में पृथ्वी के गर्भ में

होने वाली हलचलों में लॉकडाउन की वजह से आयी कमी के बारे में बताया गया है। 

कोरोना की वजह से जो लॉकडाउन लगा, वैसी परिस्थिति इस दुनिया में इससे पहले कभी

नहीं आयी थी। अचानक से सारी गतिविधियों के ठहर जाने के विकास और आर्थिक चोट

तो पहुंची है लेकिन इसके बीच ही पृथ्वी पर शोर का दबाव भी कम हुआ है और यह साबित

हो रहा है कि यह सारी हलचलें सिर्फ इंसानी गतिविधियों की वजह से ही थी।

लॉकडाउन से हुए बदलाव के आंकड़े भी जारी

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने इसके आंकड़ों को भी सार्वजनिक किया है। साथ ही इन

आंकड़ों का विश्लेषण भी किया गया है। जिसका निष्कर्ष है कि इंसानी गतिविधियों की

वजह से पृथ्वी के गर्भ में जो कुछ हलचल पैदा होती थी, वह पिछले मार्च महीने से लेकर

मई महीने तक करीब पचास प्रतिशत तक कम हो चुकी है। इसके कारणों को भी वैज्ञानिकों

ने परिभाषित किया है। पृथ्वी पर ऐसी हलचल में कमी की वजह औद्योगिक गतिविधियों

का रुक जाना, हवाई जहाजों का बहुत कम उड़ना तथा सड़कों पर होने वाले कोलाहल की

उल्लेखनीय कमी ही है। साथ ही लोगों के भीड़ लगने तथा समुद्र अथवा पहाड़ी इलाकों में

पर्यटकों की भीड़ से उत्पन्न होने वाला आंतरिक शोर भी अब कम हो गया है।

कोरोना संकट की वजह से सामान्य दिनचर्या में जो विराम लगा है, उसने धरती के गर्भ में

लगातार होने वाले हलचल को कम करने का मौका दिया है। आम तौर पर पृथ्वी पर भूकंप

पर नजर रखने वाले उपकरणों से भी स्पंदन में आयी इस कमी के आंकड़ों को दर्ज किया

है। दरअसल इंसानों के चलने से जमीन के अंदर भी जो प्रभाव पड़ता है, उसका सामूहिक

प्रभाव पृथ्वी की सेसमिक गतिविधियों पर पड़ता है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि

लगातार एक लाख लोगों के चलने रहने का भी एक प्रभाव होता है। आम दिनों में

महानगरों में यह कोलाहाल बहुत अधिक हुआ करता था। साथ ही सड़कों पर वाहनों का

दबाव भी इस शोर को और बढ़ा देता था। ऊपर से ट्रेनों और भारी वाहनों से भी यह

कोलाहाल पृथ्वी के अंदर तक पहुंचता था।

भूकंप को बेहतर तरीके से अभी समझा जा रहा है

पिछले कुछ दशकों में इस कोलाहाल में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी भी दर्ज की जा रही है। यह

पहला अवसर है जबकि उसमें पचास प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गयी है। इन

आंकड़ों पर गौर करने के साथ साथ उन्हें विश्लेषित करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया है कि

इस ध्वनि प्रदूषण में कमी आने का आंकड़ा जनवरी से दर्ज किया जाने लगा था। इस

दौरान चीन में कोरोना का प्रभाव तेजी से फैला था। बाद में यही स्थिति यूरोप और बाद में

पूरी पृथ्वी तक फैलता ही चला गया। मार्च और अप्रैल के महीन में पूरी पृथ्वी मे लगभग

एक जैसी स्थिति बन गयी थी। बेल्जियम की रॉयल वेधशाला और उसके सहयोगी

अनुसंधान केंद्रों ने इन आंकड़ों को परिभाषित किया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस बारे में

उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक धरती के गर्भ में होने वाली हलचलों पर इंसानी

प्रभाव के लिहाज से यह सबसे शांत समय है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक स्टीफन हिक्स ने

इस बार में अपनी राय जाहिर की है। वह इंपीरियल कॉलज लंदन के अर्थ साइंस के शोध

वैज्ञानिक हैं।

इस बदलाव की वजह से वैज्ञानिकों को अनेक वैसे भूकंप के आंकड़ों को भी दर्ज करने का

अवसर मिला है, जो पहले पृथ्वी पर इंसानी गतिविधियों से उत्पन्न कोलाहाल की वजह से

दबे रह जाते थे। भारत में भी इस दौरान लगातार भूकंप के आंकड़े दर्ज किये जा सके हैं।

लिहाजा वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इंसानी कोलाहल कम हो तो भूंकपों के बारे में और भी

बेहतर जानकारी मिल सकती है।


 

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