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सूर्य का मद्धिम होना हम पर भी असर डालेगा

  • पूरे सौर मंडल पर पड़ता है इसका बुरा प्रभाव

  • बेमौसम बारिश और बर्फबारी का इतिहास है

  • सैटेलाइट सेवा को भी बाधित कर सकता है

  • लंबे समय तक कम रोशनी देगा दिवाकर

रांचीः सूर्य का मद्धिम होने की प्रक्रिया जारी है। वर्तमान में दुनिया जिस कोरोना के संकट

के दौर से गुजरते हुए लॉक डाउन को अच्छी तरह जान चुकी है, सूर्य की भी अभी

लॉकडाउन जैसी स्थिति है। यानी वहां औसतन गतिविधियां अभी बहुत कम हो गयी हैं।

सूर्य में इस गतिविधियों के कम होने की वजह से वहां की गर्मी और रोशनी भी कम हुई है।

इसी वजह से पृथ्वी सहित इस पूरे सौर मंडल पर उसका असर पड़ना भी एक वैज्ञानिक

सत्य है। वैज्ञानिक परिभाषा में इसे सोलर साइकिल 25 भी कहते हैं। इस काल में सूर्य की

गतिविधियां इतनी कम हो जाती हैं कि पृथ्वी का मौसम बदलने लगता है। सामान्य तौर

पर इसकी वजह से पृथ्वी पर सूरज की कम रोशनी की वजह से तापमान नीचे गिरता है

और कई अवसरों पर यह अधिक शीत पैदा करने की स्थिति ला देता है।

सूर्य का मद्धिम होना कोई पहली बार नहीं

सूर्य के मद्धिम होना कोई पहली बार नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति पहले भी आती रही है। पूर्व

के अनुभवों का इतिहास यही कहता है कि इस काल में उन इलाकों में भी बर्फबारी हुई है,

जो गरमी के इलाके समझे जाते थे। साथ ही तापमान कम होने की वजह से बेमौसम

बारिश का इतिहास भी है। साथ ही इसी कारण भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी

घटनाओं का पूर्व इतिहास भी हमारे इतिहास के पन्नों में दर्ज है। सूर्य के मद्धिम होने के

बारे में नासा और नेशनल ओसनिक एंड एटमोसफियरिक एडमिंस्ट्रेशन ने दावा किया है

कि इस बदलाव की वजह से धरती पर भी इंसानी जीवन पर इसका ढेर सारा प्रभाव पड़ने

जा रहा है। साथ ही शोधकर्ता यह भी मान रहे हैं कि सूर्य की गरमी कम होने की वजह से

अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर रहने वाले एस्ट्रोनाट्स के जीवन

पर भी इसका प्रभाव पड़ने जा रहा है। खगोल वैज्ञानिक इसी वजह से सूर्य पर कम

तापमान की वजह से बनने वाले काले गड्डों पर भी नजर गड़ाये हुए हैं। साथ ही सूर्य से

लगातार सौरमंडल की तरफ निकलने वाली सूर्य किरणों और प्लाज्मा की गतिविधियों को

भी नापा जा रहा है। सूर्य में गरमी पैदा होने की असली वजह वहां निरंतर होने वाला

विस्फोट है, इसलिए उन विस्फोटों पर भी इस सूरज के लॉक डाउन का क्या कुछ असर पड़ा

है, उसे देखा जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया के बारे में वैज्ञानिक निष्कर्ष है कि एक खास

अवधि के बाद सूर्य के अंदर ऐसा होता आया है। इसके तहत सूर्य के दोनों ध्रुव आपस में

स्थान बदलने लगते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के ठीक मध्यावधि में यह स्थिति अत्यंत प्रवल

हो जाती है।

आम तौर पर हर ग्यारह वर्ष बाद नया सूर्य चक्र

आम तौर पर हर ग्यारह वर्षों के बाद एक नया सोलर साइकिल प्रारंभ होता है। इस दौरान

अनेक किस्म के उथल पुथल होते हैं। सूर्य के अंदर होने वाले हर उथल पुथल का इस पूरे

सौरमंडल पर असर पड़ता है। कई बार सूर्य की किरणों के विकिरण का स्तर पर बदल जाने

की वजह से हमारी धरती पर ज्वालामुखी विस्फोट और भूंकप आने की प्रक्रिया तेज हो

जाती है। इस बारे में लगातार शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया है कि दरअसल इस

नये सूर्य के मद्धिम होने की प्रक्रिया दिसंबर 2019 में ही प्रारंभ हो गयी थी। उसे सही तरीके

से समझने में काफी समय लगा। अब स्थिति यह है कि सूर्य की मद्धिम पड़ती गतिविधियों

की वजह से उसका चुंबकीय क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। इस बदलाव का असर पृथ्वी के

वायुमंडल के ऊपरी सतह पर पड़ना स्वाभाविक है। इस बदलाव से पृथ्वी के बाहर अंतरिक्ष

में घूम रहे सैटेलाइट भी इसकी चपेट में आयेंगे। इसके अलावा कई अन्य उपकरण जो

अंतरिक्ष से सूचनाएं भेज रहे हैं, उनपर भी इस परिवर्तन का प्रभाव पड़ेगा। वैज्ञानिक इस

दुष्काल जैसी स्थिति में भी यह जानकर प्रसन्न हैं कि पूर्व में जब सूर्य पर लॉकडाउन लगा

था तो उस समय का विज्ञान इतना उन्नत नहीं था। इस बार आधुनिक उपकरणों तथा कई

श्रेष्ठ स्तर पर खगोल दूरबीनों की मदद से इसके बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करना

संभव होगा। दूसरी तरफ सूर्य की तरफ जा रहे खास यान पार्कर सोलर प्रोव सहित अन्य

अंतरिक्ष यान भी अपने उपकरणों की मदद से इसके बारे में आंकड़ा एकत्रित करने में

काफी मदद करेंगे।


 

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