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सूर्य पर भी अब पड़ गया लॉक डाउन का साया

  • नजर नहीं आ रहे हैं सूर्य के सन स्पॉट

  • प्रकाश कम होने से घटेगा तापमान भी

  • दुनिया में प्राकृतिक आपदा का खतरा बढ़ा

  • पुराने रिकार्ड में प्राकृतिक आपदाओं के तथ्य

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सूर्य पर भी अब लॉक डाउन का साया पड़ चुका है। यह कोई नई बात नहीं है।

इसके पहले भी सूर्य पर ऐसे प्रभाव पड़ चुके हैं।लेकिन उसका असली खामियजा पृथ्वी को

भुगतना पड़ता है। दुनिया में भूकंप सहित अन्य प्राकृति आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।

इसकी वजह अब सूर्य के भी लॉक डाउन में जाना है।

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सूर्य की सतह पर होने वाली गतिविधियों के कम होने की वजह से वहां यह लॉक डाउन

जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो रही है। वर्तमान आंकड़े यही दर्शा रहे हैं कि पृथ्वी के कोरोना

वायरस के लॉक डाउन की तरह सूर्य में भी उथल पुथल मे कमी आने जा रही है। इससे

निश्चित तौर पर सूर्य काफी मद्धिम पड़ जाएगा। इससे पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल में

बदलाव की वजह से भूकंप सहित अन्य प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति उत्पन्न होगी।

वैज्ञानिक वहां के तमाम घटनाक्रमों की तरफ लगातार नजर लगाये हुए हैं ताकि वहां

घटित होने वाली घटनाओं की जानकारी जल्द से जल्द मिल सके। इस नजरदारी का खास

मकसद पृथ्वी पर पड़ने वाले किसी बड़े कुप्रभाव का पहले से पता लगाना भी है। पहले

जानकारी मिल जाने से लोगों को इस बारे में सतर्क कर पाना संभव होगा। इससे जान

माल के नुकसान को कम किया जा सकता है।

सूर्य पर भी लॉक डाउन यानी विस्फोटो में कमी होना

जो तथ्य सामने आये हैं उसके मुताबिक सूर्य में निरंतर आणविक विस्फोटों की वजह से ही

उथल पुथल की स्थिति बनी रहती है। इससे भीषण ऊर्जा का विकिरण होता है। इसी वजह

से सूर्य की गरमी से ही पृथ्वी पर जीवन पनपता है। पृथ्वी में जीवन के लायक घटित होने

वाली अनेक वैज्ञानिक घटनाओं की पीछे इसी सूर्य की रोशनी का प्रमुख हाथ होता है। अब

यही उथल पुथल अगर कम हुई तो निश्चित तौर पर सूर्य से पृथ्वी तक आने वाली प्रकाश

किरणों की ताकत भी कम हो जाएगी।

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इसका पृथ्वी के ऊपर वायुमंडल के साथ साथ गुरुत्वाकर्षण पर भी असर पड़ना तय है।

इतना तो तय है कि वहां से ऊर्जा का विकिरण कम होने की वजह से प्रकाश की मात्रा भी

कम हो जाएगी। इससे पृथ्वी पर सामान्य तौर पर अनेक प्राकृतिक गतिविधियों के

प्रभावित होने से कोई इंकार भी नही कर सकता है। इन सभी संभावनाओं को जोड़कर और

खासकर पेड़ पौधों के फोटो संश्लेषण की प्रक्रिया पर भी इसका असर पड़ना है जबकि खेतों

में भी सूर्य किरणों से नाइट्रोजन की मात्रा में बदलाव होना तय है।

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सूर्य पर लगातार निगरानी करने वाले वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस उथल पुथल के कम

होते जाने की वजह से अभी से ही वहां के गहरे गड्डों का नजर आना लगभग बंद हो गया

है। पहले से इसी गहरे गड्डों को जरिए सूर्य की स्थिति का आकलन किया जाता था।

वहां बनने वाले सारे सन स्पॉट लगभग गायब हो गये

इन्हें वैज्ञानिक परिभाषा में सन स्पॉट कहा जाता है। वर्तमान पद्धति में इसके बदले सोलर

फ्लक्स का इस्तेमाल होता है। इस शोध से जुड़े खगोल वैज्ञानिक डॉ टोनी फिलिप्स ने

स्पष्ट किया कि इन सन स्पॉटों के नजर नहीं आने का अर्थ यह भी है कि सूर्य की चुंबकीय

शक्ति भी कमजोर हुई है। इसकी वजह से सौरमंडल की अन्य किरणों का इस सौर मंडल

पर प्रवेश आसान हो गया है। यह सौर किरणें पृथ्वी के लिए नुकसानदायक हैं, यह तथ्य

पहले से ही प्रमाणित वैज्ञानिक सत्य है। पृथ्वी के बाहर मौजूद खगोल यंत्रों, सैटेलाइटों

तथा अंतरिक्ष यात्रियों पर इसका कुप्रभाव पड़ना स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है। लेकिन इन

सौर किरणों से पृथ्वी पर फिर से क्या कुछ नकारात्मक असर होता है, उसका आकलन अब

तक नहीं हो पाया है। वैसे सूर्य की ऐसी परिस्थिति पहले भी आयी है, यह वैज्ञानिक रिकार्ड

में दर्ज है।

लगातार चालीस वर्षों तक लॉक डाउन का रहा था असर

वैज्ञानिक रिकार्ड के मुताबिक वर्ष 1790 से लेकर वर्ष 1830 तक सूर्य की ऐसी स्थिति पहले

भी हुई थी। इसकी वजह से दुनिया में काफी उथल पुथल भी हुए थे। दरअसल इसी वजह से

पृथ्वी पर कड़ाके की ठंड के अलावा खेती के नुकसान के आंकड़े मौजूद हैं। साथ ही इतिहास

यह बताता है कि इसी दौर में पृथ्वी को कई बड़े भूकंपों के नुकसान से भी गुजरना पड़ा था।

वैज्ञानिक रिकार्ड में उस पुराने दौर को डाल्टन मिनिमम की संज्ञा दी गयी है। वैसे इस

दौरान ज्वालामुखी विस्फोट की घटनाएं भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। उस वक्त पृथ्वी

का तापमान दो डिग्री तक घट गया था। लगातार बीस वर्षों तक तापमान में इस कमी की

वजह से पूरी दुनिया में अकाल जैसी परिस्थिति उत्पन्न हुई थी। इनमें से एक वर्ष 1816

ऐसा भी था, जिसे बिना गर्मी का वर्ष कहा गया है। यह ऐसा वर्ष है जब दुनिया के अनेक

इलाकों में गर्मी के मौसम में भी बर्फवारी हुई थी। इससे भी तबाही आ गयी थी क्योंकि

लोग गर्मी के मौसम में इस किस्म की बर्फवारी के लिए तैयार नहीं थे। नासा के वैज्ञानिक

मानते हैं कि सूर्य की इस दशा की वजह से फिर से इन सारी घटनाओँ की पुनरावृत्ति हो

सकती है।

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