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कर्जमाफी का सवाल तो जनता के लिए भी जरूरी

कर्जमाफी का सवाल कांग्रेस ने केंद्र सरकार के खिलाफ फिर उठाया है। दरअसल इस कर्जमाफी

पर पहले भी संसद में प्रश्न उठाये गये थे तो केंद्र सरकार की तरफ से कांग्रेस को बहुत

तीखा लेकिन अप्रत्यक्ष उत्तर दिया गया था। अब कांग्रेस का दावा है कि खुद भारतीय

रिजर्व बैंक ने यह स्वीकार किया है कि हां वाकई कर्ज माफी दी गयी है। इस माफी में लाभ

पाने वालों ने वे तीनों लोग शामिल हैं, जिनके बारे में भाजपा के नेता पता नहीं क्या क्या

दावे करते आये हैं। इसलिए सरकार और राजनीति से परे हटकर यह जनता का सवाल भी

है कि आखिर जनता का पैसा इस तरीके से लूटाने का अधिकार क्या सरकार को है।

पारदर्शिता का बार बार दावा करने वाली सरकार यह किस रास्ते पर चल रही है, इसका

उत्तर भी हर बात पर सवाल उठाने वाले भाजपा नेताओं से सार्वजनिक तौर पर पूछा जाना

चाहिए। वरना अक्सर ही अपने विरोधी पर सवाल उठाने वाले जब अपने ऊपर सवाल

उठने की बारी आती है तो खरगोश की तरफ मिट्टी में मुंह छिपाने का काम करते नजर

आते हैं। उदाहरण के तौर पर हाल के एक घटना को लिया जा सकता है। इसमें गोड्डा

सांसद निशिकांत दुबे ने प्रावधानों का उल्लंघन कर देवघर के कोरोना मरीज की तस्वीर

अपने फेसबुक पर शेयर कर दी। उस दौरान भाजपा के नेता सिर्फ राज्य सरकार के

खिलाफ घर पर उपवास और अन्य विज्ञप्ति के हमले कर रहे थे। किसी ने यह नहीं कहा

कि वाकई सांसद ने फेसबुक पर मरीज की तस्वीर शेयर कर गलती की है।

भारतीय राजनीति में सिर्फ दूसरों पर आरोप

यह भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि शीर्ष पर बैठे लोग पारदर्शिता का बात तो करते हैं

लेकिन जब अपनी ऊपर बात आती है तो उन्हें यही पारदर्शिता बुरी लगने लगती है।

झारखंड की ही बात करें तो लगातार कोरोना के हमलों के बीच सरकार की नाकामी का

आरोप लगाने वाली भाजपा इस बात पर कोई बयान नहीं दे रही है कि पिछले पांच साल की

डबल इंजन की सरकार ने राज्य में स्वास्थ्य सेवाओ के विकास पर क्या कुछ किया है।

अगर यह दावा किया जाएगा तो सिर्फ निर्माण से संबंधित दावे होंगे, यह बताया जाएगा

कि इतने मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने की प्रक्रिया पूर्व की सरकार में प्रारंभ की

गयी थी। लेकिन जिस तरीके से झारखंड में टेंडर के घोटाले एक एक कर सामने आ रहे हैं,

उससे यह भविष्य में समझा जा सकेगा कि इन निर्माण कार्यों को प्राथमिकता देने का

असली राज क्या था। कुछ इसी तरह बिजली के मद में भी गड़बड़ी का खुलासा खुद इस

लॉक डाउन ने ही कर दिया है। सब कारोबार बंद होने की वजह से जब बिजली का लोड ही

घटकर अधिकतम बीस प्रतिशत रह गया है तो उन सब स्टेशनों पर होने वाली बिजली की

खपत के आंकड़े सामने आ चुके हैं, जिन्हें अत्यधिक क्षमता के लिए बनाया गया था। तीन

मेगावाट की जरूरत के लिए 125 मेगावाट के सब स्टेशन के निर्माण का औचित्य अगर

टेंडर की कमाई नहीं थी तो यह भी स्पष्ट है कि मांग के संबंध में या तो सर्वेक्षण नहीं किया

गया था अथवा सर्वेक्षण के आंकड़े उपलब्ध होने के बाद भी बड़े सब स्टेशन बनाने के नाम

पर अधिक रकम खर्च कर दी गयी। नतीजा है कि झारखंड को वास्तव में इनका कोई लाभ

नहीं मिल पा रहा है।

कर्जमाफी का सवाल जरूरी क्योंकि भगो़ड़ों को लाभ मिला

इसलिए अब जबकि कर्जमाफी का सवाल सामने आया है तो सबसे पहले भाजपा से ही

जनता को यह पूछ लेना चाहिए कि नीरव मोदी, मेहुल चौकसे और विजय माल्या पर इतने

सारे आरोप लगाने के बाद आखिर उनके भी कर्ज क्यों माफ किये गये। यह सवाल इसलिए

भी वाजिब है क्योंकि माफ करने का फैसला लेने वालों ने इसे अपनी जेब से नहीं दिया है।

यह तो दरअसल देश की जनता का पैसा है। कोरोना संकट के दौरान जब पूरे देश की

जनता आर्थिक तंगी के भीषण दौर से गुजर रही है तो विदेशों में ऐश की जिंदगी जी रहे

लोगों के प्रति यह सहानुभूति क्या दर्शाती है। सवाल उन अन्य व्यापारिक घरानों का भी है,

जिनकी चर्चा कर्जमाफी के इस फैसले में शामिल हैं। 68 हजार करोड़ से अधिक की

कर्जमाफी कोई छोटी मोटी बात तो नहीं थी। साथ ही बार बार इसी मुद्दे पर कांग्रेस पर

आरोप लगाने वाली पार्टी ने ऐसा जनविरोधी फैसला आखिर कैसे लिया। जनता अगर यह

सवाल कर देगी तो निश्चित तौर पर देश के भीतर सवाल करने की वह परंपरा फिर से

जिंदा हो उठेगी, जो अभी मृतप्रायः हैं क्योंकि अब सवाल पूछने को भी सत्तारूढ़ सरकार ने

राष्ट्रद्रोह की कतार में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सवाल पूछने से ही भारतीय

लोकतंत्र मजबूत होगा। लिहाजा कर्जमाफी का सवाल उठाने का समय आ चुका है।


 

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