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पिछले तीस महीनों से अंतरिक्ष में काम कर रहा है लाइट सेल




सूर्य की रोशनी से संचालित हो रहा है अभियान
अत्यंत पतले सौर पैनल ही इसे ऊर्जा दे रहे हैं
अगले एक वर्ष तक सकुशल जारी रहने की उम्मीद
अंतरिक्ष अभियानों को संचालित करने का प्रयोग जारी है
राष्ट्रीय खबर

रांचीः पिछले तीस महीनों से अंतरिक्ष में यह लाइट सेल काम कर रहा है। इसे भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए सूर्य की रोशनी से ईंधन हासिल करने के मकसद से ही छोड़ा गया था।




इस परीक्षण की प्रारंभिक जिम्मेदारियां सफल रही है। इसके जरिए यह देखा जा रहा है कि सिर्फ सौर ऊर्जा की मदद से किसी अंतरिक्ष यान को किसी खास लक्ष्य तक पहुंचाना संभव है अथवा नहीं।

वीडियो में समझिये क्या है यह अभियान

वर्तमान में अंतरिक्ष अभियान में काम आने वाले यानों के ईंधन की वजह से यानों की वजन और आकार बहुत बड़ा हो जाता है। इसके बाद भी सौर जगत के प्रकाश वर्षों की दूरी वर्तमान तकनीक से संभव नहीं है।

वर्तमान में नासा द्वारा छोड़ा गया पार्कर सोलर प्रोव इस कड़ी में सबसे दूर और फिलहाल सबसे तेज चलने वाला अंतरिक्ष यान है जो सूर्य पर शोध के लिए छोड़ा गया है।

वैसे सौर ऊर्जा के सहारे अंतरिक्ष अभियान की परिकल्पना काफी पुरानी है लेकिन जून 2019 मे पहली बार लाइट सेल को छोड़ा गया था वह पिछले तीस महीनों से ठीक ठाक काम कर रहा है।

इस सौर पैनल के माध्यम से यह भी परखा जा रहा है कि क्या ऐसे सौर पैनल किसी यान को किसी खास धुरी पर आगे बढ़ाने का काम भी कर सकते हैं अथवा नहीं।

उससे प्राप्त हो रहे आंकड़ों के आधार पर यह पता चल रहा है कि पिछले तीस महीनों से यह सौर पैनल बिल्कुल वैसा ही काम कर रहा है, जिसके लिए उसे डिजाइन किया गया था।

इस यंत्र को स्पेस एक्स के फॉल्कन रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में पहुंचाया गया था। उसके बाद से वह स्वतंत्र रुप से संचालित हो रहा है।

पिछले तीस महीनों से वह यंत्र आंकड़ा भेज रहा है

अंतरिक्ष में छोड़े जाने के एक महीने बाद एक घनाकर छोटे से सैटेलाइट ने अपने सौर पंखों को खोला था। यह सौर पैनल अत्यंत पतले लेकिन 32 वर्गी मीटर के इलाके तक फैल सकते थे।




सौर पैनलों को खास तकनीक पर बनाया गया था, जो अंतरिक्ष में सही तरीके से काम कर रहे। इन सौर पैनलों के खुल जाने के बाद परीक्षण का असली दौर प्रारंभ हुआ था। पहले ही दौर में यह अपनी पहली जिम्मेदारी पूरी करने में सफल रहा।

इन सौर पैनलों से प्राप्त ऊर्जा के आधार पर यह सैटेलाइट अपनी धुरी से ऊपर उठने में कामयाब रहा। वैसे बता दें कि आकार में यह सैटेलाइट किसी बड़े पावरोटी के जितना ही है।

फिर भी यह अपनी स्थापित धुरी से सिर्फ सूर्य किरणों से प्राप्त ऊर्जा के सहारे ऊपर उठ गया है। इसी वजह से वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि सैद्धांतिक तौर पर सही प्रमाणित यह तकनीक व्यवहार में भी सही तरीके से काम कर किसी अंतरिक्ष यान को खास दिशा और धुरी पर ले जाने में सक्षम है।

इसके लिए यान को अतिरिक्त ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। यह यान अपने साथ लगे सौर पैनलों से ही यह ऊर्जा प्राप्त कर आगे बढ़ सकेगा।

इस अभियान को संचालित करने वाले प्लेनेटरी सोसायटी के सीईओ बिल नाई ने कहा कि अगर बड़े सैटेलाइटों के लिए भी यह काम होने लगा तो यान का आकार कम होगा क्योंकि उसमें अतिरिक्त ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। सौर पैनलों से यह यान अपनी ईंधन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेगा।

भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए ऐसा परीक्षण

वर्तमान में तीस माह पहले छोड़ा गया यह सैटेलाइट सौर ऊर्जा की बदौलत पृथ्वी से करीब 687 किलोमीटर की दूरी पर चला गया है।

तीस महीने के दौरान अब सूर्य में अधिक सक्रियता दिख रही है। इसकी वजह से सौर पैनल भी अतिरिक्त ऊर्जा हासिल कर यान को और ऊपर ले जाने में सफल हो रहे हैं।

दरअसल इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि सौर मंडल में मौजूद फोटोन यद्यपि आकार रहित होते हैं लेकिन उनमें ऊर्जा होती है। इसी ऊर्जा को प्राप्त कर पूरे सौर जगत की सैर की जा सकती है। सौर पैनल यही काम सूर्य की रोशनी से कर पा रहे हैं।

इस अनुसंधान से जुड़े शोधकर्ता मानते हैं कि तीस माह पूर्व छोड़ा गया यह अभियान अभी कमसे कम एक वर्ष तक और जारी रह सकता है। इसके बीच ही वह अपने कैमरों की मदद से तस्वीरें भी भेजता जा रहा है।



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